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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 668 में से

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पृष्ठ 354

गुरूण्यसम्बोध नाम्ना ज्ञेया तु सा बुधैः ॥—क० ।-> wait, we checkedगुरूण्यसम्बोधा`.

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षोडशोऽध्यायः २४३
एते मेघा ¹गर्जितनादोज्ज्वलचिह्नाः
प्रावृट्कालं मत्तमयूरं² कथयन्ति ॥ ६७ ॥
ये बादल—जो कड़क और चमक के प्रकट चिन्हों से बिजली और इन्द्र
धनुष से युक्त होकर, वायु से संचालित और सफेद बगुलों की कतार से
शोभित होकर बरसात की सूचना मदमत्तमयूरों को दे रहे हैं ॥ ६७ ॥
आदौ द्वे च चतुर्थश्चाप्यष्टमैकादशे गुरु ।
अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्य्यां वसन्ततिलका यथा³ ॥ ६८ ॥
वसन्ततिलका—यदि चौदह अक्षरों के पाद में पहिले दो, चौथा,
आठवां, ग्यारहवां, तेरहवां, ( उपान्त्य ) तथा अन्तिम अक्षर गुरु हो तो
'वसन्ततिलका' वृत्त होता है ॥ ६८ ॥
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