नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २५९
इक्कीसवाँ, चौबीसवाँ तथा अन्तिमवर्ण गुरू हो तो भुजंगविजृम्भित वृत्त
होता है ॥ ११६-११७ ॥
यथा—
रूपोपेतां$^१$ दैवैः$^२$ सृष्टां समदगजविलसितगतिं निरीक्ष्य तिलोत्तमां
प्रादक्षिण्यात्प्राप्तां$^३$ द्रष्टुं बहुवदनमचलनयनं$^४$ शिरः कृतवान् हरः$^५$ ।
दीर्घं$^६$ निश्वस्यान्तर्गूढं स्तनवदनजघनरुचिरां$^७$ निरीक्ष्य तथा पुनः
पृष्ठे$^८$ न्यस्तं देवेन्द्रेण प्रवरमणिकनकवलयं भुजङ्गविजृम्भितम् ॥ ११८॥
देवगण द्वारा निर्मित मत्तगजगामिनी उस परमसुन्दरी तिलोत्तमा
को देखते हुए—जो प्रदक्षिणा करने आई हुई थी—भगवान् शंकर ने अपने
सभी नेत्रों को उसी ओर लगा दिया और अपने सिरों को निश्चल कर दिया ।
पुनः भगवान् शिव ने अन्तकरण में अत्यन्त गूढ़ भाव से दीर्घ निश्वास
लेकर उसे फिर देखा—जिसका उरोज, मुँह तथा जघन भाग का सौन्दर्य
अवर्णनीय था । फिर उसे आशीष देने के लिए भगवान् शिव ने उसकी पीठ
पर श्रेष्ठ मणिखचित कनकवलयों वाला तथा सर्पों से अधिष्ठित अपना हाथ
रख दिया ॥ ११८ ॥
[ दण्डकं$^९$ नाम विज्ञेयमुत्कृतेरधिकाक्षरम् ।
वृत्तं मालादिकं तस्मान्नोक्तं चादौ गुहादिना ॥
उत्कृति के पाद से अधिक अक्षरों वाले पाद होने पर 'दण्डक' समझना
चाहिए । इसके माला आदि छन्द प्रभेद होते हैं जिन्हें आरंभ में ही गुह
आदि ने बतलाया । ]
[ यथा—मुदितजनपदाकुला स्फीतसस्याकरा
भूतधात्री भवन्तं समभ्यर्चति$^{१०}$
द्विरदकरविलुप्तहिन्तालतालीवनान्तां
नमस्यन्ति विन्ध्यादयः पर्वताः ।
१. रूपेणिन्द्यां—क० । २. देवैः स्पृष्टां—ख०; ग० ।
३. प्रादक्षिण्यं प्राप्तां—ख०; ग० ।
४. वदननयनसहितं तिरस्कृतवान् हरः—क०, शिरःशतवान् हरिः—ख० ।
५. मुदा—क० । ६. ब्रह्मा दीर्घं निःश्वस्यान्तः स्तनवदन—क० ।
७. कलितां—ख०; ग० । ८. कण्ठे न्यस्तं—क०; पृष्ठन्यस्तां—ग० ।
९. श्लोकावेतौ प्रक्षिप्तौ—दण्डकं नाम विज्ञेयं षड्विंशादधिकाक्षरम्—ख०, ग० ।
१०. समभ्यर्च्यते—क० ।