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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 352

षोडशोऽध्यायः २४१
आदौ षड्दशमश्चैव पादे यत्र लघून्यथ ।
शेषाणि तु गुरूणि स्युर्जगते 'पुटसंज्ञिता ॥ ६० ॥
पुटवृत्ता—यदि बारह अक्षरों के पाद में प्रथम छः तथा दसवां अक्षर
लघु तथा शेष गुरु हों तो 'पुटवृत्त' नामक वृत्त होता है ॥ ६० ॥
यथा—उपवनसलिलानां बालपद्मै-२
भ्रमरपरभृतानां कण्ठनादैः ३।
४मदनमदविलासैः कामिनीनां
५कथयति पुटवृत्तं पुष्पमासः ॥ ६१ ॥
यह चैत्रमास ( अपने ) कमल कोरकों के जो सरोवररूप वन में हैं—तथा
भौरों की गुंजार, कोयल की कूक और मदमत्त कामिनिजन के लीलापूर्ण
विलासों के द्वारा युगलभाव (पुटवृत्तं) की छवि की कहानी कह रहा है ॥६१॥
द्वितीयान्त्ये चतुर्थश्च नवमैकादशे गुरू ।
६विच्छेदोऽतिजगत्यान्तु चतुर्भिः सा प्रभावती ॥ ६२ ॥
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