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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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२४६ नाट्यशास्त्रम्
यथा—तोयधरैः सुधीरघनपटुपटहरवैः¹
सर्जकदम्बनीपकुटजकुसुमसुरभिः ।
कन्दलसेन्द्रगोपकरचितमवनितलं
वीक्ष्य करोत्यसौ वृषभगजविलसितकम्² ॥ ७७ ॥
पृथ्वी को भुईं-केलिया ( कन्दली ) तथा इन्द्रकीट ( इन्द्रगोप ) से
युक्त देखते हुए—जो कि सर्ज, कदम्ब, नीप एवं कुटज के सुमनों से सुवासित
है और जो घन की गंभीर ध्वनि से पटुता से बजाए गए गम्भीर मृदंग के
समान ( जो ) लगती है, प्रकट होने पर—क्रीडा करने वाले हाथी के समान
यह व्यक्ति ( भी ) चेष्टाएं ( विलास ) करने लगा है ॥ ७७ ॥
आद्यात् पराणि वै पञ्च द्वादशं सत्रयोदशम् ।
³अन्त्योपान्त्ये च दीर्घाणि ललितप्रवरं हि तत्⁴ ॥ ७८ ॥
प्रवरललिता—यदि सोलह अक्षरों के पाद में प्रारम्भ के ( दो से ) पांच,
बारहवां, तथा तेरहवां, प