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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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२५० नाट्यशास्त्रम्
भवन्ति यत्र दीर्घाणि शेषाणि च लघून्यथ ।
विलम्बितगतिः सा१ तु विज्ञेया नामतो यथा२ ॥ ९० ॥
विलम्बितगति—यदि सत्रह अक्षरों के पाद में दूसरा, छठा, आठवां,
बारहवां, चौदहवां तथा पन्द्रहवां अक्षर गुरु हो तो उसे "विलम्बितगति"
नामक वृत्त कहते हैं ॥ ८९-९० ॥
यथा—विघूर्णितविलोचना ३पृथुविकीर्णहारा पुनः
प्रलम्बरशना४ चलत्स्खलितपादमन्दक्रमा५ ।
६न मे प्रियमिदं जनस्य बहुमानरागेण य-७
न्मदेन८ विवशा विलम्बितगतिः कृता त्वं प्रिये ॥ ९१ ॥
हे प्रिये, तुम्हारी आँखें खुमारी के कारण घूम रही है, (स्वर्ण का)
बड़ा हार अपने स्थान से खिसक गया है। तुम्हारी करधनी शिथिल हो
जाने के कारण लटकने लगी है और तुम्हारे धीरे-धीरे रखे जाने वाले पग
लड़खड़ा रहे हैं। मैं इस तुम्हारी मन्दगति को खूब पसन्द कर रहा हूँ। जो
तुमने इस जन के प्रेम में मदहोश होकर (विवशा) आदर करने के लिये
धारण की है ॥ ९१ ॥
पञ्चादौ पञ्चदशकं ९द्वादशैकादशे गुरु१० ।
चतुर्दशं ११तथान्त्ये द्वे चित्रलेखा१२ धृतौ स्मृता ॥ ९२ ॥
१. विलम्बित गति का पिंगलोक्त नाम 'पृथ्वी' है।
१. तत्र—क० ।
२. लक्षणमिदं क—ग पुस्तकस्थं स्वेवम्—
यदा द्विरुदितौ हि पादमभिसंश्रितौ ज्भौ त्रिकौ
तथैव च पुनस्तयोर्निधनमाश्रितो यो लगौ । (य्लो सगौ—ग०)
तदाष्टिरिति पूर्विका यतिरपि स्वभावाद् यथा ।
विलम्बितगतिस्तथा निगदिता द्विजैर्नामतः ॥
३. प्रस्रुतहारमालाधरा—क०; पृथुविघूर्णहारा—ग० ।
४. वसना—क० ।
५. चलत्स्खलितगात्रपादक्रमा—क० । स्खलल्ललितपाद-मन्दक्रमा—ख० ।
६. न मे प्रियमसज्जनेति—क० । ७. ते—क० ।
८. मदेन तु विलम्बितागतिकृता कदाचित् प्रिये—क० ।
९. द्वादशं सानुगं गुरु—ख० । १०. धृतो—क० ।
११. तथा पञ्च—ख० । १२. चित्रमाला गुरूणि तु—क० ।