सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 367, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 367

२५६ नाट्यशास्त्रम्
१रिपुशतमु कशस्त्ररवभीतशङ्कितभटं२ भयाकुलदिशं
कृतमभिवीक्ष्य संयुगमुखे ३समर्पितगुणं त्वयाश्वललितम्४ ॥१०९॥
इस पूर्णरूप से सुसज्जित अपनी सेना को देखते हुए जो अनेक घोड़े,
हाथी, रथ तथा पैदलों से भरी हुई है, इसमें अनगिनत बाण, शक्ति, भाले,
परिघा तथा तलवारे फैली हुई हैं, शत्रुओं के द्वारा चलाये गये शस्त्रों के
भयंकर शब्दों से (कुछ) पैदल सैनिक सबके भय के कारण सहम रहे हैं
और दिशाएं भी भय से व्याप्त हो रही हैं। ऐसे समय आपने अपने घोड़े
को युद्ध में आगे डाल कर जो एक क्रीडा मात्र प्रदर्शित की (अश्वललितं)
प्रजाजन के द्वारा आज भी आपका वह गुण बड़ा लोकप्रिय हो रहा है ॥१०९॥
षडादावष्टमञ्चैव ह्येकादशचतुर्दशे ।
विंशं सप्तदशञ्चैव त्रयोविंशं तथैव च ॥ ११० ॥
एतानि च लघूनि स्युः शेषाण्यथ गुरुणि च ।
चतुर्विंशतिके५ पादे मेघमालेति सा यथा ॥ १११ ॥
मेघमाला—यदि चौबीस अक्षरों के पाद में आदि के छः वर्ण, आठवां,
ग्यारहवां, चौदहवां, सत्रहवां, बीसवां और तेईसवां अक्षर लघु हो तथा शेष
वर्ण गुरु हों तो 'मेघमाला' वृत्त होता है ॥ ११०-१११ ॥

            • ᴗ - - ᴗ - - ᴗ - - ᴗ - - ᴗ - - ᴗ -
              यथा—पवनजवसमाइता६ तीव्रगम्भीरनादा७ बलाकावलीमेखला
              क्षितिधरसदृशोच्चरूपा८ महानीलधूमाञ्जनाभाम्बुगर्भोद्भवा ।
              १. वसुगणमस्य भिन्नहतशत्रुनाशितशिरः प्रमथ्य तरसा-क० ।
              २. शस्त्ररवभिन्नशङ्कितभटं भयाकुलमिद- ख०; शङ्कित भटं भिन्नहतशत्रुनाशि
              भयाकुलमिदं—ग० ।
              ३. समीप्सितगुणं- ख०; ग० ।
              ४. तदश्वललितम्-ग० । ५. चतुर्विंशाक्षरे-क० ।
              ६. मेघमाला लक्षणं क-पुस्तके यथा-
              यदि खल चरणस्थितौ नो त्रिकौ कृत्तिकाख्यास्तथा राःपरं स्युः क्रमाद्
              भवति यदि यतिस्तथा सप्तभिः सप्तभिश्चिष्वतोऽन्या यतिः पञ्च विद्यात्तथा ।
              सततमभिनिविष्टदेहा तथा सङ्कृतौ सूरिभिः सर्वदा दृश्यते
              तत इह परिभाषिता शास्त्रविद्भिस्त्वियं मेघमाला यथा दण्डकः ॥
              ६. पवनबल-क; ख० । ७. तीव्रनादा बलाकावलीमेखलाशोभिता-ग० ।
              ८. सदृशोध्वंरूपा-क; ख० ।
              ९. महाधूमपुञ्जायमानाम्बुगर्भोद्भवा-ख० ।