नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें२४४ नाट्यशास्त्रम्
तीन अक्षर गुरू हों तथा पांच अक्षरों पर यति हो तो ‘असम्बाधा’ नामक
वृत्त होता है ॥ ७० ॥
यथा—मानी लोकज्ञः श्रुतबलकुलशीलाढ्यो
यस्मिन् १सम्मानं न सदृशमनु पश्येद्धि२ ।
गच्छेत्तं त्यक्त्वा तं ३द्रुतगतिरपरं देशं
कीर्णा नानार्थैरवनिरियमसम्बाधा ॥ ७१ ॥
वह आत्मसम्मान रखने वाला पुरुष—जो संसार को जानता हो
(लोकज्ञ), विद्वान्, बलवान्, कुलवान तथा चरित्रवान् हो। उसे जहां उचित
सम्मान प्राप्त न हो वहां नहीं रहना चाहिए। वह वहां से तुरन्त दूसरे
(उचित) प्रदेश के लिए प्रस्थान करे, क्योंकि अनेक अर्थों से पूर्ण पृथ्वी
उसके लिए कहीं भी बाधा न देगी ॥ ७१ ॥
४चत्वार्यादौ गुरूणि स्युर्दशमैकादशे तथा ।
अन्त्योपान्त्ये च शकर्याः पादे तु शरभा यथा ॥ ७२ ॥
शरभा—यदि चौदह अक्षरों के पाद में आदि के चार, दसवां, ग्यारहवां,
तेरहवाँ तथा चौदहवां वर्ण गुरू होतो ‘शरभा’ नामक वृत्त होता है ॥ ७२ ॥
यथा—एषा कान्ता व्रजति ललितं वेपमाना
५गुल्मैश्छन्नं वनमभिनवैः सम्प्रवृद्धम् ।
६हा हा कष्टं किमिदमिति नो वेद्मि मूढो
व्यक्तं ७कान्ते शरभललिता त्वं करोषि ॥ ७३ ॥
यह ललना ललितगति से झूमती हुई (वेपमाना) जा रही है उस
वन में जो विशाल पर्वतों तथा लतागुल्मों से आवेष्टित है । हाय, बड़े दुःख
की बात है कि मैं मूर्ख ही रहा और इतना भी न समझ पाया कि प्रिये तुम
क्रोध में आकर हाथी के बच्चे की चेष्टाएं (शरभललिता) करने पर उतारू
(हो गई) हो ॥ ७३ ॥
१. सामान्यं—क० ।
२ पश्येत—क० ।
३. द्रुतगति—ख०; ग० ।
४. आदौ चतुर्गुरूणि—क० ।
५. गुल्मच्छन्नं वनमुरुनगैः सम्प्रवृद्धम्—क० ।
६. आहो कष्टं किमिदमिति संविग्नचेष्टा—क० ।
७. क्रोधाच्छरभललितं कर्तुकामा, क्रोधाच्छरभललितं हर्तुकामा—क० ।