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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

दशमोऽध्यायः ९३
पार्ष्णिर्यस्य स्थिता भूमौ^१ पादमग्रतलन्तथा ।
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः स पादोऽञ्चित उच्यते ॥ ५१ ॥
एड़ी भूमि पर टिकी हो, पंजा ऊपर उठा हुवा तथा उंगलियां सिकुड़ी
हुई ( झुकी हुई ) रहे तो 'अंचित' पाद कहलाता है ।
पादाग्रस्थितसञ्चारे वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
^२एष पादाहते कार्यो नाना भ्रमरकेषु च ॥ ५२ ॥
पंजों के बल खड़े होकर चलने, किसी ओर घूमने और लौटने
( वर्तितोद्वर्तिते ), पैर से पीटने तथा अमरी-चारी के प्रदर्शन में इस
अञ्चित पाद की योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
उत्क्षिप्तता यस्य पार्ष्णिः स्यादङ्गुल्यः कुञ्चितास्तथा ।
तथाकुञ्चितमध्यश्च स पादः कुञ्चितः स्मृतः ॥ ५३ ॥
जिसमें एड़ी ऊपर उठाई हुई, उंगलियां सिकुड़ी हुई तथा पैर का
आधा भाग ( मध्यभाग ) नमा हुआ रहे तो 'कुंचित' पाद कहलाता
है ॥ ५३ ॥
उदात्तगमने चैव वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
^३अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
शिष्टजन की चाल ( उदात्तगमन ), सीधी ओर घूमने, लौटने और
अतिक्रान्ताचारी के प्रदर्शन में इस कुञ्चित पाद की योजना करनी
चाहिए ॥ ५४ ॥
[ ^५उत्क्षिप्तता तु भवेत् पार्ष्णिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः^६ ।
वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः ॥
^७नृत्ते नूपुरकरणेच प्रयोगस्तस्य की^८र्तितः । ]
[ प्रक्षिप्त—यदि ( दाहिने पैर की ) एड़ी उठी हुई, पंजा अंगूठे के बल
पर टिका हुआ तथा बायां पैर स्वाभाविक दशा में खड़ा रखा जाए तो
'सूची' पाद कहलाता है ।
इस पाद की नृत्त तथा नूपुर धारण में योजना करनी चाहिए । ]


१. भूमावूर्ध्वमग्रतलं तथा—ख० । २. स पादस्त्वञ्चितः स्मृतः—ग० ।
३. अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत्—ख० ।
४. पद्यार्धमेतत्—ख०--पुस्तके नास्ति ।
५. उत्क्षिप्तं तु—ग० । ६. संस्थिता—ग० ।
७ नृत्तेऽन्तःपुरकरणे—ख० । ८. कीर्त्यते—ग० ।

९४ नाट्यशास्त्रम्
पादजङ्घोरुकरणं समं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।
पादस्य करणं¹ सर्वं जङ्घोरुकृतमिष्यते ॥ ५५ ॥
नाट्यप्रयोक्ता पाद, जंघा तथा ऊरू की गतियों को एक साथ ही
प्रयुक्त करें क्योंकि पैरों की गति के प्रदर्शन करने में जंघा तथा ऊरू की
गतियां भी सम्मिलित रहती ही हैं ॥ ५५ ॥
यथा पादः प्रवर्तेत तथैवोरुः प्रवर्त्तते ।
तयोः² समानकरणात् पादचारीं प्रयोजयेत् ॥ ५६ ॥
क्योंकि पैर जिधर घूमता है पिंडली भी उसी ओर जाएगी, (तथा जंघा
भी) इसी कारण इन (दोनों) की (समान) गति से 'पादचारी' बनती है ॥
इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं लक्षणं कर्म चैव हि ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि चारीव्यायामलक्षणम् ॥ ५७ ॥
यह मैंने विभिन्न अङ्गों का अभिनय बतलाया । अब मैं (विभिन्न)
चारियों के भेद एवं लक्षण (अगले अध्याय में) बतलाऊंगा ॥ ५७ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे शारीरा³भिनयो नाम दशमोऽध्यायः ।
॥ भरतनाट्य शास्त्र का शारीराभिनय नामक दसवां अध्याय समाप्त ॥
१. करणं ग०—। २. अनयोः—ग० ।
३. अङ्गिकाभिनयो नाम नवमोऽध्यायः—क०; ख० ।

एकादशोऽध्यायः
चारी विधान
१चारी—
एवं पादस्य जङ्घाया ऊरोः¹ कट्यास्तथैव च ।
समान²करणे चेष्टा चारीति परिकीर्तिता ॥ १ ॥
( हाथ ) पैर, जंघा, ऊरू तथा कटि ( आदि ) अङ्गों की एक साथ
( निर्दिष्ट पद्धति से ) चलनात्मक चेष्टा 'चारी' कहलाती है ॥ १ ॥
विधा³नोपगताश्चार्यो व्यायच्छे४न्ते परस्परम् ।
यस्मादङ्गसमायुक्तास्तस्माद् व्यायाम उच्यते ॥ २ ॥
टिप्पणी—१ 'चारी' शब्द का आशय वर्तमान 'चाल' शब्द से है तथा
उसे ही 'चारी' शब्द से यहां निर्दिष्ट किया गया है यही सामान्यतः कहा जा
सकता है । कथकलि में 'सारी' तथा मणिपुरी नृत्य में होने वाली 'चाली' इसी
शब्द का अपभ्रंश या वर्तमान प्रचलित नाम है जिसे अंग्रेजी में Step कहते हैं ।
इसे 'चारी' शब्द द्वारा प्रकट कर सकते हैं ।
नाट्यशास्त्र में भौमीचारी तथा आकाशीकी-चारी के ३२ प्रकार बतलाए
गए हैं । संगीतरत्नाकर में देशीचारी के अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये हैं जो
नाट्यशास्त्र के परवर्ती आचार्यों-(कोहल तथा अन्य परवर्ती आचार्यों) द्वारा
निरूपित की गई । इनमें ३५ भौमी तथा २९ आकाशीकी चारी है ।
संगीत-रत्नाकर के व्याख्याकार चतुर कल्लिनाथ ने ( अपनी व्याख्या में )
कोहल का मत उद्धृत करते हुए २५ मधुपाचारी को बतलाया जो अपने 'कुट्टन'
विधान के द्वारा चारी-समूह में स्वतंत्र महत्त्व रखती है । आचार्य कोहल ने
नृत्याचार्यों की आवश्यकतानुसार चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी मान्यता
दी है । इस प्रकार चारी के भेदों के विषय मे प्राचीन एवं मध्यवर्ती नाट्याचार्यों
में पर्याप्त मतभेद परिलक्षित होता है । चारी के विषय में संक्षेप में इतना ही
पर्याप्त है । विशेषजिज्ञासुजन-संगीतरत्नाकर [७।९२०-१०२६, भरतार्णव
अध्याय ८।४९३-५।४३, के अतिरिक्त अभिनयदर्पण तथा संगीतराज का चारी-
वर्णन भी देखें ।
१. ऊर्वोः—ख-ग० । २. समानकरणाच्चेष्टा—ख-ग० ।
३. विधानोभयतश्चार्यो—ख-ग० । ४. व्यायच्छन्ति—ख-ग० ।

९६ नाट्यशास्त्रम्
क्योंकि यह विधान से युक्त (होकर) अङ्गों (अवयवों, हस्त, पैर
इत्यादि) को परस्पर सम्बद्ध करती हैं, इसीलिये 'चारी' व्यायाम (भी)
कहलाती है ॥ २ ॥
एकपादप्रचारो यः सा चारीत्यभिसंज्ञिता ।
द्विपादक्रमणं यत्तु करणं नाम तद्भवेत् ॥ ३ ॥
करणानां समायोगः खण्ड इत्यभिधीयते ।
खण्डैस्त्रिभिश्चतुर्भिर्वा संयुक्तैर्मण्डलं भवेत् ॥ ४ ॥
एक पैर के द्वारा भरा जाने वाला डग 'चारी' १(संचारी) तथा दोनों
पैरों से होने वाली गति 'करण' कहलाती है। (तीन) करणों का योग
'खण्ड' तथा तीन या चार खंडों के मिलने पर एक 'मण्डल' बनता है ॥
चारी—उपयोगिता
चारीभिः प्रसृतं नृत्तं चारीभिश्चेष्टितं तथा ।
चारीभिः शस्त्रमोक्षश्च चार्यो युद्धे च कीर्तिताः ॥ ५ ॥
चारी से नृत्त व्याप्त है, चारी से ही हलचल (गति आदि) की जाती
है तथा शस्त्रों का फेंकना और युद्ध करना भी चारी के द्वारा ही प्रस्तुत
होता है ॥ ५ ॥
यदेतत् प्रस्तुतं नाट्यं तच्चारीष्वेव संस्थितम् ।
न हि चार्या विना किञ्चिन्नाट्येऽङ्गं सम्प्रवर्तते ॥ ६ ॥
'नाट्य' के रूप में जो भी (वर्णित) है वह सब चारी में ही समाविष्ट
जानो; क्योंकि कोई भी नाट्य का विभाग चारी के बिना नहीं होता।
(रहता) ॥ ६ ॥
तस्माच्चारीविधानस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ।
या यस्मिंस्तु यथा योज्या नृत्ते युद्धे गतौ तथा ॥ ७ ॥
टिप्पणी—१ चारी-चारी के संचारी करण, खण्ड तथा मण्डल का आज
कहीं प्रयोग नहीं होता, इस विषय में अन्य नृत्य-नाट्य ग्रन्थों में भी केवल
उल्लेखात्मक विवरण ही उपलब्ध है।
१. समायोगात्—ग० । २. खण्डमि—ग० ।
३. प्रस्तुतं—ख, ग० । ४. संज्ञितम्—ग० ।
५. नाट्ये ह्यङ्गं प्रवर्तते—ग० । ६. प्रयोक्तव्या—ख-ग ।

एकादशोऽध्यायः ९७
अतएव अब मैं उन (सभी) के लक्षण, विधान (आदि) को
बतलाऊँगा जिनकी नृत्य, गति तथा युद्ध में योजना की जाती है ॥ ७॥
भौमी चारी तथा आकाशिकी चारी—
समपादा स्थितावर्ता शकटास्या तथैव च ।
अध्यर्धिका चाषगतिर्विच्च्यवा च तथापरा ॥ ८ ॥
एलकाक्रीडिता बद्धा ऊरुद्वृत्ता तथाड्डिता ।
उत्स्पन्दिताथ जनिता स्पन्दिता चापस्पन्दिता ॥ ९ ॥
समोत्सारित-मत्तल्ली मत्तल्लीचेति³ षोडश ।
एता भौम्यस्मृताश्चार्यः,
ये सोलह भौमी चारी हैं—यथा :—(१) समपादा, (२) स्थितावर्ता,
(३) शकटास्या, (४) अध्यर्धिका, (५) चाषगति, (६) विच्च्यवा,
(विच्युता), (७) एलकाक्रीडिता, (८) बद्धा, (९) ऊरूद्वृत्ता,
(१०) अड्डिता (अंगिता), (११) उत्स्पन्दिता (उत्स्यन्दिता),
(१२) जनिता, (१३) स्पन्दिता, (१४) अपस्पन्दिता, (१५)
समोत्सारित-मत्तल्ली तथा (१६) मत्तल्ली ॥ ८-१० ॥
शृणुताकाशिकीः पुनः ॥ १० ॥
अतिक्रान्ता ह्यपक्रान्ता पार्श्वक्रान्ता तथैव च ।
ऊर्ध्वजानुश्च सूची च तथा नूपुरपादिका ॥ ११ ॥
डोलापादा तथाक्षिप्ता आँविद्धोद्वृत्तसंज्ञिते।
विद्युद्भ्रान्ता ह्यलाता च भुजङ्गत्रासिता तथा ॥ १२ ॥
मृगप्लुता च दण्डा च भ्रमरी चेति षोडश ।
आकाशिक्यः स्मृता ह्येता लक्षणञ्च निबोधत ॥ १३ ॥
आकाशिकी चारी (भी) सोलह हैं। यथा :—(१) अतिक्रान्ता,
(२) अपक्रान्ता, (३) पार्श्वक्रान्ता, (४) ऊर्ध्वजानु, (५) सूची,
(६) नूपुरपादिका, (७) दोलपादा (डोलापादा), (८) आक्षिप्ता,
(९) आविद्धा, (१०) उद्वृत्ता, (११) विद्युद्भ्रान्ता (विद्युत्क्रान्ता),
(१२) अलाता, (१३) भुजंगत्रासिता, (१४) हरिणीप्लुता (मृग-
प्लुता) (१५) दण्डा (दण्डपादा), तथा (१६) भ्रमरी। अब मैं इनके
क्रमशः लक्षण बतलाता हूँ ॥ ११-१३ ॥
१. स्थिता वार्त्ता—ख-ग० । २. उत्स्यन्दितां—ख-ग० ।
३. चापि—ग० । ४. व्याविद्धोद्वृत्त सं—ख-ग० ।
७ ना० शा० द्वि०

९८ नाट्यशास्त्रम्
भौमीचारी-लक्षण
पदैर्निरन्तरकृतैस्तथा समनखैरपि ।
समपादा तु सा चारी विज्ञेया स्थानसंश्रया ॥ १४ ॥
समपादा—दोनों पैरों को पास रखते हुए तथा नखों को बराबर
मिलाते हुए अपने स्थान पर स्थित रहने (या खड़े रहने) को 'समपादा'
चारी कहते हैं ॥ १४ ॥
भूमिघृष्टेन पादेन कृत्वाभ्यन्तरमण्डलम् ।
पुनरुत्सारयेदन्यं स्थितावर्ता तु सा स्मृता ॥ १५ ॥
स्थितावर्त्ता—यदि भूमि पर रगड़ते हुए एक (अग्रतलसंचर) पाद को
ऊपर उठाकर स्वस्तिक दशा बनाते हुए दूसरे पैर को अपने पास खींचे
तथा दोनों के पृथक् होने के पश्चात् यही गति पुनः आवृत्त की जाए तो
'स्थितावर्त्ता' चारी होती है ॥ १५ ॥
निषण्णाङ्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम् ।
उद्वाहितमुरः कृत्वा शकटास्यां प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥
शकटास्या—शरीर को सीधा रखते हुए एक चरण को 'अग्रतलसंचर'
दशा में सामने (की) ओर रखे तथा छाती को 'उद्वाहित' स्थिति में
रखे तो 'शकटास्या' चारी होती है ॥ १६ ॥
सव्यस्य पृष्ठतो वामश्चरणस्तु यदा भवेत् ।
तस्यापसर्पणञ्चैव ज्ञेया साध्यर्धिका बुधैः ॥ १७ ॥
अध्यर्धिका—यदि बाएं पैर की एड़ी (के पिछले भाग) पर दाहिना पैर
रखकर फिर उसे पीछे हटाया जाए (तथा यह डेढ़ताल के कालप्रमाण पर
हो) तो 'अध्यर्धिका' चारी जानो ॥ १७ ॥
पादः प्रसारितः सव्यः पुनश्चैवोपसर्पितः ।
वामः सव्यापसर्पी च चाषगत्यां विधीयते ॥ १८ ॥
चाषगति—यदि दाहिने पैर को (आगे) फैलाकर फिर पीछे की
ओर रख दिया जाए और बायां पैर उसी समय पीछे की ओर रखकर पुनः
आगे बढ़ाकर रख दे तो 'चाषगति' चारी जानों ॥ १८ ॥
१. स्मृता—ख-ग०। २. स्थिता वार्त्ता—ख-ग०।
३. शकटास्यं—ग०।

एकादशोऽध्यायः ९९
विच्यं¹वात् समपादाया विच्यवां सम्प्रयोजयेत् ।
निकुट्टयंस्तं²स्तलाग्रेण पादस्य धरणीतलम् ॥ १९ ॥
विच्यवा—यदि समपादा चारी के दोनों पैरों को अलग हटा कर (उनके)
पञ्जों को पृथ्वी पर (ताल देते हुए) पटकें तो 'विच्यवा' चारी जानों ॥१९॥
तलसञ्चरपादाभ्यामुत्प्लुत्य पतनन्तु यत् ।
पर्यायशै³श्च क्रियते एडकाक्रीडिता तु सा ॥ २० ॥
एलकाक्रीडिता—यदि तलसंचर पादों से उछाल लेकर पृथ्वी पर क्रमशः
गिरता रहे तो 'एलकाक्रीडिता' चारी जानो ॥ २० ॥
अन्योन्य जङ्घासंवेधात् कृत्वा तु स्वस्तिकं ततः ।
ऊरूभ्यां वलनं यस्मात् सा बद्धा चार्युदाहृता ॥ २१ ॥
बद्धा—दोनों जंघाओं को 'स्वस्तिक' बनाकर पिंडलियों को धीरे-धीरे
हिलाने पर 'बद्धा' चारी हो जाती है ॥ २१ ॥
तलसञ्चरपादस्य पाष्णिर्बाह्योन्मुखी यदा ।
जङ्घाञ्चिता तथोद्वृत्ता ऊरूद्वृत्तेति सा स्मृता ॥ २२ ॥
ऊरूद्वृत्ता—यदि 'तलसंचरपाद' में पञ्जा आगे रख दिया जाए और
एक पिंडली थोड़ी नमाकर जंघा को ऊपर उठाले तो 'ऊरूद्वृत्ता' चारी
होती है ॥ २२ ॥
अग्रतः पृष्ठतो⁴ वापि पादो⁵ऽग्रतलसञ्चरः ।
द्वितीयपादनिर्घृष्टो यस्यां स्यादड्डिता तु सा ॥ २३ ॥
अड्डिता—यदि एक 'अग्रतलसंचर' पैर को आगे या (और) पीछे
की ओर पृथ्वी को रगड़ता हुआ रखा जाए तो 'अड्डिता' चारी जानो ॥२३॥
शनैः पादो निवर्तेत बाह्येनाभ्यन्तरेण च ।
यद् रेचकानुसारेण सा चार्युत्स्पन्दितास्मृता ॥ २४ ॥
उत्स्पन्दिता—यदि 'रेचक' के अनुसार दोनों पैरों को क्रमशः एक
दूसरे के पीछे घुमाया जाए (जिससे कि वह आगे आए और पीछे चला
जाए) तो 'उत्स्पन्दिता' चारी होती है ॥ २४ ॥
मुष्टिहस्तश्च वक्षस्थः करोऽन्यश्च प्रवर्तितः ।
तलसञ्चरपादश्च जनिता चार्युदाहृता ॥ २५ ॥
१. वीच्यवाक् समपादायां—ख-ग० । २. स्तथाग्रेण—ख-ग० ।
३. पर्यायतश्च—ख-ग० । ४. पृष्ठतश्चापि—ख० ।
५. पादस्तु तलसञ्चरः—ख-ग० । ६. चार्युत्सन्दिता—ग० ।

१०० नाट्यशास्त्रम्
जनिता—यदि एक 'मुष्टि' हस्त छाती पर तथा दूसरा हाथ गोल
चक्कर लगाते हुए रखे और पैर 'अग्रतलसंचर' दशा में हो तो 'जनिता'
चारी हो जाती है ॥ २५ ॥
पञ्चतालान्तरं पादं प्रसार्य स्यन्दितां न्यसेत् ।
द्वितीयेन तु पादेन तथापस्यन्दितामपि ॥ २६ ॥
स्यन्दिता—यदि एक पैर को दूसरे पैर से पांच ताल के अन्तर से
सामने रखी जाए तो 'स्यन्दिता' चारी होती है ।
अप(अव)स्यन्दिता—स्यन्दिता-चारी के ठीक विपरीत (यदि दूसरे
पैर को पहले पैर के सामने पांच ताल के अन्तर से ) रखा जाए तो
'अवस्यन्दिता' चारी जानों ॥ २६ ॥
तलसञ्चर¹पादाभ्यां ²घूर्णमानोपसर्पणैः ।
समोत्सारितमत्तल्ली व्यायामे समुदा³हृता ॥ २७ ॥
समोत्सारित मत्तल्ली—यदि तलसंचर पादों से पीछे की ओर गोल
चक्कर लगाते हुए जाया जाए तो 'समोत्सारित-मत्तल्ली' चारी होती
है ॥ २७ ॥
उभाभ्यामपि पादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः ।
उद्वेष्टितापविद्धैश्च हस्तैर्मत्तल्युदाहृता ॥ २८ ॥
मत्तल्ली--यदि एक गोल चक्कर लगाकर पीछे जाया जाए तथा हस्त
उद्वेष्टित तथा पुनः अपविद्ध ( गतिहीन ) स्थिति में रखे तो 'मत्तल्ली' चारी
होती है ॥ २८ ॥
एता भौम्यः स्मृताश्चार्यो नियुद्धकरणाश्रयाः ।
आकाशिंकीनां चारीणां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २९ ॥
ये सभी भौमीचारी कहलाती हैं। इनका प्रयोग बाहुयुद्ध तथा करणों
के प्रदर्शन में किया जाता है। अब मैं आकाशिकी-चारी के लक्षण
बतलाता हूँ ॥ २९ ॥
आकाशिकी चारी लक्षण :—
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
उत्क्षिप्य पातयेच्चैनमतिक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३० ॥
१. सञ्चार—ग० । २. घूर्णमानापसर्पणैः—ख० ।
३. समुदाहृताः—ग० । ४. भौम्यः—ख-ग० ।
५. नियुक्तकरणं—ख-ग० । ६. आकाशकीनां—ग० ।

एकादशोऽध्यायः १०१
अतिक्रान्ता—एक 'कुञ्चित' पैर को ऊपर उठाकर सामने फैलाए तथा
ऊपर उठाकर (फिर) नीचे पटके तो 'अतिक्रान्ता' चारी जानों ॥ ३० ॥
ऊरुभ्यां वलनं कृत्वा कुञ्चितं पादमुद्धरेत् ।
पार्श्वे विनिक्षिपेच्चैनमपक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३१ ॥
अपक्रान्ता—यदि दोनों ऊरुओं (पिंडलियों) के द्वारा 'वलन'
(घुमाव) किया को प्रदर्शित कर फिर एक कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर एक
बाजू में पटके तो 'अपक्रान्ता' चारी होती है ॥ ३१ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्वं सम्प्रसारयेत् ।
उद्वृत्तेन पादेन पार्श्वक्रान्ता विधीयते ॥ ३२ ॥
पार्श्वक्रान्ता—यदि पैर को 'कुञ्चित' दशा में ऊपर उठाकर जंघा से
ऊपर ले जाए तथा फिर उसी ऊपर उठे हुए पैर को एक बाजू की ओर
ले जाए तो 'पार्श्वक्रान्ता' चारी होती है ॥ ३२ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानु स्तनसमं न्यसेत् ।
द्वितीयश्च क्रमात्स्तब्धमूर्ध्वजानुः प्रकीर्तिता ॥ ३३ ॥
ऊर्ध्वजानु—यदि 'कुंचित' पैर को ऊपर उठाकर और (इसी पैर की)
जंघा को छाती के बराबर ऊँचा उठाकर रखा जाए, दूसरी जानु स्तब्ध रखे
तथा फिर इसी क्रम से दूसरे पैर को कुञ्चित दशा में ऊपर उठाए और
पहले को स्थिर रखे तो 'ऊर्ध्वजानु' चारी होती है ।
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्वं सम्प्रसारयेत् ।
पातयेच्चाग्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता ॥ ३४ ॥
सूची—यदि 'कुञ्चित' पैर को जंघा के ऊपर तक ले जाकर फैला दे
और फिर इसके पंजे के आगे वाले भाग को जमीन पर पटके तो 'सूची'
चारी जानो ॥ ३४ ॥
पृष्ठतो ह्यञ्चितं कृत्वा पादमग्रतलेन तु ।
द्रुतं निपातयेद् भूमौ चारी नूपुरपादिका ॥ ३५ ॥
१. च्चैव—ग० ।
२. जानु स्तनसमं न्यसेत्—क०, पार्श्वोत्थानगतिं न्यसेत्—ख०, पार्श्वोत्थानो-
द्वर्ति न्यसेत्--ग० ।
३. क्रमात् स्तब्ध--ख-ग० । ४. जानुरुर्ध्वं--ख० ।

१०२ नाट्यशास्त्रम्
नूपुरपादिका—एक 'अंचित' पैर को ऊपर उठाकर दूसरे पैर के पीछे
रखे तथा अग्रतलसंचर स्थितिवाले पैर को जल्दी से पृथ्वी पर पटके तो
'नूपुरपादिका' चारी कहलाती है ॥ ३५ ॥
कुंचितं पादमुत्क्षिप्य पाश्र्वात् पार्श्वन्तु दोलयेत् ।
पातयेदञ्चितञ्चैव दोलपादा प्रकीर्तिता ॥ ३६ ॥
दोलपादा—यदि 'कुंचित' पाद को ऊपर उठाकर एक ओर से दूसरी
बाजू तक हिलाए तथा 'अंचित' दशा में रख कर पृथ्वी पर पटक दे तो
'दोलपादा' चारी कहलाती है ॥ ३६ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य आक्षिप्य त्वञ्चितं न्यसेत् ।
जङ्घा स्वस्तिकसंयुक्ता चाक्षिप्ता नाम सा स्मृता ॥ ३७ ॥
आक्षिप्ता—यदि 'कुञ्चित' पैर को उठाकर जल्दी से 'अंचित' दशा
में पृथ्वी पर रख दे तथा जंघाओं को स्वस्तिक करे तो 'आक्षिप्ता' चारी
कहलाती है ॥ ३७ ॥
स्वस्तिकस्याग्रतः पादः कुञ्चितश्च प्रसारितः ।
निपतेदञ्चिताविद्धमाविद्धा नाम सा स्मृता ॥ ३८ ॥
आविद्धा—यदि जंघाओं के स्वस्तिक में एक पैर आगे की ओर फैलाने
समय 'कुञ्चित' रखे तथा उसे 'अंचित' पाद बना कर पृथ्वी पर जल्दी से
पटके तो 'आविद्धा' चारी जानो ॥ ३८ ॥
पादमाविद्धमावेष्ट्य समुत्प्लुत्य निपातयेत् ।
परिवृत्य द्वितीयश्च सोद्वृत्ता चार्युदाहृता ॥ ३९ ॥
उद्वृत्ता—यदि 'आविद्ध' चारी की दशा में कुञ्चित पैर को (दूसरी
जंघा से) लपेट ले तथा फिर दूसरे को इसी प्रकार बदल कर रखे और
ऊपर उठाकर पृथ्वी पर पटके तो 'उद्वृत्ता' चारी होती है ॥ ३९ ॥
पृष्ठतो वलितं पादं शिरोधृष्टं प्रसारयेत् ।
सर्वतो मण्डलाविद्धं विद्युद्भ्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ४० ॥
विद्युद्भ्रान्ता—यदि पीछे की ओर घुमाकर (एक) पैर को मस्तक से
१. पार्श्वं पार्श्वं तु—ख-ग० । २. तु सा स्मृता—ग० ।
३. व्याक्षिप्य—ख० । ४. चाञ्चितं—ग० ।
५. उत्क्षिप्ता—ग० । ६. कुञ्चितस्तु—ग० ।
७. समुत्क्षिप्य—ख-ग० ।

एकादशोऽध्यायः १०३
रगड़ खाता हुआ फैलाए और चारों ओर एक गोल चक्कर ले ले तो
‘विद्युद्भ्रान्ता’ चारी होती है ॥४०॥
पृष्ठे प्रसारितः पादो वलितोऽभ्यन्तरीकृतः ।
पार्ष्णिप्रपतितश्चैव ह्यलाता सम्प्रकीर्तिता ॥ ४१ ॥
अलाता—यदि एक पैर को पीछे की ओर फैला दे तथा घुमाकर इसे
अन्दर रखते हुए दूसरे पैर के पंजे के पास पटके तो 'अलाता' चारी जानों ॥
कुंचितं पादमुत्क्षिप्य त्र्यश्रमूरूं विवर्तयेत् ।
कटीजानु-विवर्त्ताच्च भुजङ्गत्रासिता भवेत् ॥ ४२ ॥
भुजंगत्रासिता—यदि कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर पिंडली को गोल
चक्करदार घुमाव दे साथ में कटि तथा जंघा को भी एक गोल घुमाव दे तो
'भुजंगत्रासिता' चारी जानो ॥ ४२ ॥
अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा चोत्प्लुत्य५ विनिपातयेत् ।
जङ्घाञ्चितां परिक्षिप्ता सा ज्ञेया ७हरिणप्लुता ॥ ४३ ॥
हरिणप्लुता—यदि अतिक्रान्ताचारी में एक उछाल (उत्प्लुत्य) मार
कर पृथ्वी पर पैर टिका दे तथा जंघा को अंचित पाद युक्त करते हुए
आक्षिप्त दशा में पैर को नीचे पटके तो 'हरिणप्लुता' चारी होती है ॥४३॥
नूपुरं चरणङ्कृत्वा पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
क्षिप्तंमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता ॥ ४४ ॥
दण्डपादा—यदि नपुर (पादिका) चारी को प्रदर्शित कर एक पैर को फैला
कर (उसे शीघ्र) पीछे लौटाया जाए तो ‘दण्डपादा’ चारी कहलाती है ॥
अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा त्रिकन्तु परिवर्तयेत् ।
द्वितीयपादभ्रमणात्तलेन भ्रमरी स्मृता ॥ ४५ ॥
भ्रमरी—यदि अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित करते हुए एक पैर को ऊपर
उठाया जाए तथा पीठ को घुमाव दे दे (सारे शरीर को एक गोल चक्कर
देकर) और फिर दूसरे पैर को उसके नीचे भाग में घुमाव दे दे तो
'भ्रमरी' चारी कहलाती है ॥ ४५ ॥
१. पृष्ठतः सर्वतः पादो वलिताभ्यन्तरीकृतः—ख० ।
२. प्रपादितश्चैव—ग। ३. प्रवर्तयेत्—ग० ।
४. विवर्तेन—ग० । ५. समुत्प्लुत्य विपातयेत्—ग० ।
६. जङ्घाञ्चितोपरि क्षिप्ता—ख–ग० । ७. हरिणी—ख० ।
८. क्षिप्र—ग० । ९. च्वलने—ख० ।

१०४ नाट्यशास्त्रम्
आकाशिक्यः स्मृता ह्येता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
धनुर्वज्रा१सिसंश्राणां [प्रयोक्तव्या विमोक्षणे ॥ ४६ ॥
ये अङ्गों के ललित संचालन द्वारा होने वाली आकाशीकी चारी हैं ।
इनकी धनुष, वज्र, असि तथा अन्य शस्त्रों के चलाने में योजना करनी
चाहिए ॥ ४६ ॥
अग्रगौ पृष्ठगौ वापि ह्यनुगौ वापि योगतः ।
पादयोस्तु द्विजा हस्तौ कर्तव्यौ नाट्ययोक्तृभिः ॥ ४७ ॥
हे मुनियो, इन सभी प्रदर्शनों के अवसर पर पैरों की गति के अनुसार
हस्तों को आगे जानेवाले, पीछे जानेवाले तथा साथ साथ ( रहने वाले )
रखना चाहिए ॥ ४७ ॥
यतः पादस्ततो हस्तो यतो हस्तस्ततः त्रिकम् ।
पादस्य निर्गमं४ कृत्वा५ तथोपाङ्गानि योजयेत् ॥ ४८ ॥
क्योंकि जिधर पैर जाए वहीं हाथ भी ( उसका अनुसरण करते हुए )
बढ़े तथा जिधर हाथ जाए वहीं शेष शरीर भी घूमे । पाद की एक डग
भरने के उपरान्त उपांगों की योजना अभिनय में करनी चाहिए ॥ ४८ ॥
पादचार्यां यथा पादो धरणीमेव गच्छति ।
एवं हस्तं७ चरित्वा तु कटीदेशं समाश्रयेत् ॥ ४९ ॥
किसी भी 'चारी' के प्रदर्शन (करने) के पश्चात् जैसे पैर भूमि पर रखा
जाता है वैसे ही हस्त को अपने इष्ट प्रदर्शन के बाद गोल घुमाव लेकर
कटि पर रखना चाहिए ॥ ४९ ॥
एताश्चार्यो मया प्रोक्ता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
स्थानान्यसां प्रवक्ष्यामि सर्वशस्त्रविमोक्षणे ॥ ५० ॥
इस प्रकार मैंने ललित आंगिक क्रियाओं से होनेवाली ये चारी
बतलायी । अब मैं शस्त्रों को चलाने में योजित किये जाने वाले इनके
स्थानों को बतलाता हूँ ॥ ५० ॥
१. ब्रज्रादि—ख-ग० । २ समगौ—ग० ।
३. अनुगौ—ग० । ४. निर्गतिं—ख ।
५. ज्ञात्वा—ग० । ६. पादचार्या—ख-ग० ।
७. हस्तश्चरित्वा—क० । ८. स्थानानि सम्प्रवक्ष्यामि—ग ।

एकादशोऽध्यायः १०५
१स्थान— ( भेद तथा लक्षण )—
वैष्णवं समपादञ्च वैशाखं मण्डलन्तथा ।
प्रत्यालीढं तथालीढं स्थानान्येतानि षण्णृणाम् ॥ ५१ ॥
मनुष्यों के खड़े होने में अवस्था विशेष के निदर्शक ये स्थान छः
( होते ) हैं । यथा :—(१) वैष्णव, (२) समपाद, (३) वैशाख, (४) मंडल,
( ५ ) आलीढ़ तथा ( ६ ) प्रत्यालीढ़ ॥ ५१ ॥
वैष्णव-स्थान—
द्वौ तालावर्धतालञ्च पादयोरन्तरं भवेत् ।
तयोस्समुत्थितस्त्वेक१स्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥ ५२ ॥
किञ्चिदञ्चितजंघ२श्च सौष्ठवाङ्गपुरस्सर३म् ।
वैष्णवं स्थानमेतद्धि विष्णुर्४त्राधिदैवतम् ॥ ५३ ॥
यदि दोनों पैर अढ़ाई ताल२ के अन्तर से रखे जाएँ । इन ( पैरों ) में
एक पैर खड़ा ( समुत्थित ) और दूसरा पैर टेढ़ा और बाजू में स्थित रखे
जंघा थोड़ी झुकी हुई (या सिकुड़ी हुई—अंचित) हो (और एडी भी तिरछी
हो ) शरीर के सभी अवयव 'सौष्ठव' युक्त हों तो 'वैष्णवस्थान' कहलाता
है । विष्णु इस स्थान के अधिकारी देवता हैं ॥ ५२-५३ ॥
स्थानेनानेन कर्त्तव्यः संलापस्तु स्वभावजः ।
नानाकार्यान्तरोपे५ तैर्नृभिरुत्तममध्यमैः ॥ ५४ ॥
१. स्थान—नाट्य-शास्त्र में स्थानों के जो लक्षण दिये गए हैं वे अस्पष्ट हैं ।
इनकी सही स्थिति दक्षिण भारत के कलाकारों द्वारा भी अज्ञात होने के कारण
आजकल प्रयोग में नहीं आती । कथकलि में मुद्राओं के प्रदर्शन के अवसर पर
जिन स्थानों का उपयोग होता है वे भी ये ही स्थान होंगे ऐसा श्री कुंजुनायर
का अनुमान है । वे यह भी कहते हैं कि नाट्यशास्त्र से स्थानों का प्रयोग तथा
स्वरूप स्पष्टतः विदित नहीं होता ।
२. ताल = बारह अङ्गुल की दूरी । इस प्रकार २ १/२ ताल का अर्थ है तीस
अङ्गुल के अन्तर से । आगे भी ताल शब्द का दूरी के अर्थ में जहां भी प्रयोग हो
इसी प्रकार समझना चाहिए ।
१. त्र्यस्रपादस्थितो—ख० । २. जङ्घोऽसौ—ग० ।
३. समन्वितः—ग । ४. रेवाधि—ख । ५. न्तरापेतो—ग० ।

१०६ नाट्यशास्त्रम्
योजना—इस स्थान के द्वारा उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के पात्रों का
उनके विभिन कार्यों से सम्बद्ध सामान्य-(स्वाभाविक-) वार्तालाप प्रदर्शित
किया जाता है ॥ ५४ ॥
चक्रस्य मोक्षणे चैव धारणे धनुषस्तथा ।
धैर्याोदात्ताङ्गलीलासु तथा क्रोधे प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥
इसकी चक्र फेंकने, धनुष धारण करने, धैर्य दान, लीलायुक्त शारीरिक
गति (अंगलीला) तथा क्रोध में योजना करनी चाहिए ॥ ५५ ॥
इदमेव विपर्यस्तं प्रणयक्रोध इष्यते ।
उपालम्भकृते चैव प्रणयोद्वेगयोस्तथा ॥ ५६ ॥
शङ्कासूयौग्रताचिन्तामतिस्मृतिषु चैव हि ।
दैन्ये चपलतायाञ्च गर्वोभीष्टेषु शक्तिषु ॥ ५७ ॥
शृङ्गाराद्भुतबीभत्स-वीरप्राधान्ययोजितम् ।
इस स्थान के पलट कर (विपरीत दिशाओं में) प्रदर्शन के द्वारा प्रणय-
क्रोध, प्रणयोपालम्भ, प्रणयोद्वेग तथा इसी प्रकार शंका, असूया, उग्रता,
चिन्ता, मति, स्मृति, दैन्य, चपलता तथा गर्व जैसे संचारीभाव, अभीष्ट बल
प्रदर्शन के भाव तथा शृङ्गार, अद्भुत और वीर रस की प्रधानता बतलायी
जाती है ॥ ५६-५८ ॥
समपादे समौ पादौ तालमात्रान्तरस्थितौ ॥ ५८ ॥
स्वभावसौष्ठवोपेतौ ब्रह्मा चात्राधिदैवतम् ।
समपादस्थान—यदि दोनों पैर एक ताल के अन्तर से अपनी स्वाभाविक
मुद्रा में समान स्थित हों तथा स्वाभाविक सौष्ठव लिए हुए हों तो
'समपाद स्थान' होता है । इसके अधिकारी देव ब्रह्माजी हैं ॥ ५८-५९ ॥
अनेन कार्यं स्थानेन विप्रमङ्गलधारणम् ॥ ५९ ॥
रूपणं पक्षिणाञ्चैव वरं कौतुकमेव च ।
खस्थानां स्यन्दनस्थानां विमानस्थायिनामपि ॥ ६० ॥
लिङ्गस्थानां व्रतस्थानां स्थानमेतत्तु कारयेत् ।
योजना—इस स्थान से ब्राह्मणों के मंगल आशीष ग्रहण, (दिव्य) पुरुष,
१. मोक्षणं—ग० । २. धैर्येदानाङ्गलीलासु—ग० ।
३. प्रकर्षाधिबलस्तथा—ख-ग० । ४. चपलतायोगे—ग० ।
५. मन्त्राधिक्येषु—ख० । ६. योषितम्—ग० । ७. कारणम्—ग० ।

एकादशोऽध्यायः १०७
तथा विमान में स्थित पुरुष, शैवसंन्यासी ( लिंगस्थ ) तथा व्रतस्थ पुरुष
को बतलाया जाता है ॥ ५९-६१ ॥
तालास्त्रयोऽर्धतालश्च पादयोरन्तरं भवेत् ॥ ६१ ॥
तालास्त्रीनर्धतालांश्च निषण्णोरुं प्रकल्पयेत् ।
त्र्यश्रौ पक्षेस्थितौ चैव तत्र पादौ प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥
वैशाखस्थानमेतद्धि स्कन्दश्चात्राधिदैवतम् ।
वैशाख स्थान—यदि दोनों पैर साढ़े तीन ताल के अन्तर से गतिहीन
(स्तब्ध) रखें और पैर तिरछे तथा एक दूसरे के सम्मुख बाजू को बतलाते
हुए रखे जाए तो 'वैशाखस्थान' होता है । इसके अधिदेवता कार्तिकेय हैं ॥
स्थानेनानेन कर्तव्यमश्वानां वाहनं बुधैः ॥ ६३ ॥
व्यायामो निर्गमश्चैव स्थूलपक्षिनिरूपणम् ।
शरासनसमुत्कर्षे व्यायामकृतमेव च ॥ ६४ ॥
रेचकेषु च कर्तव्यमिदमेव प्रयोक्तृभिः ।
योजना—इस स्थान से अश्वारोहण, व्यायाम, (एक स्थान विशेषसे)
बहिर्गमन (निर्गम), बड़े आकार वाले पक्षियों का निरूपण, धनुष का
खींचना या अभ्यास तथा पाद रेचकों का प्रदर्शन किया जाता है ॥६३-६५॥
मण्डलस्थान—
ऐन्द्रे तु मण्डले पादौ चतुस्तालान्तरस्थितौ ॥ ६५ ॥
त्र्यश्रौ पक्षस्थितौ चैव कटिजानू समौ तथा ।
धनुर्वज्राणि शस्त्राणि मण्डलेन प्रयोजयेत् ॥ ६६ ॥
वाहनं कुञ्जराणान्तु स्थूलपक्षिनिरूपणम् ।
मण्डलस्थान के अधिदेवता 'इन्द्र' देव हैं । इस स्थान में पैर चार
ताल के अन्तर से होते हैं, (वे) तिरछे तथा एक दूसरे के सम्मुख समान
अवस्था में रखे जाते हैं, कटि तथा घुटने अपने स्वाभाविक स्वरूप में
रहते हैं ॥ ६५-६६ ॥
योजना:—इस स्थान का प्रयोग धनुष तथा वज्र आदि शस्त्रों के चलाने,
हाथी पर सवार होने और स्थूल पक्षियों के बतलाने में किया जाता है ॥
१. वक्षः स्थितौ—ख-ग० । २. स्थलपक्ष—ख०-स्थूलपक्षि—ग० ।
३. शराणाञ्च समुत्क्षेपं—ग० । ४. ऐन्द्रन्तु मण्डलं—ग० ।
५. वक्षःस्थितौ—ख-ग० । ६. वज्रादिशस्त्राणां—ग० ।

१०८ नाट्यशास्त्रम्
आलीढ-स्थान :-
अस्यैव दक्षिणं पादं पञ्चतालान् प्रसार्य तु ॥ ६७ ॥
ओलीढं स्थानकं कुर्याद् रुद्रश्चैवास्याधिदैवतम् ॥
यदि मण्डल स्थान में दाहिने पैर को (दूसरे पैर से) ऊपर फैलाया जाए
तो 'आलीढ स्थान' हो जाता है। इसके अधिदेवता रुद्र देव हैं। ६७-६८ ॥
अनेन कार्यं स्थानेन वीररौद्रकृतन्तु यत् ॥ ६८ ॥
उत्तरोत्तरसञ्जल्पो रोषामर्षकृतश्च यः ।
मल्लानाञ्चैव सम्फेटः शत्रूणाञ्च निरूपणम् ॥ ६९ ॥
तथाभिद्रवणञ्चैव शस्त्राणाञ्चैव मोक्षणम् ।
योजना—इस स्थान द्वारा वीर तथा रौद्र रस के अभिव्यञ्जक (सभी)
कार्य, क्रोध में अनुष्ठित प्रश्न तथा प्रत्युत्तर की (क्रमशः) वृद्धि, मल्लों के
रोषपूर्ण भाषण (स्फेंट), शत्रुओं का प्रदर्शन करना, शत्रुओं पर हमला तथा
शस्त्रों का प्रहार या फेंकना आदि प्रदर्शित किया जाता है ॥ ६८-७० ॥
प्रत्यालीढ स्थान :-
कुञ्चितं दक्षिणङ्कृत्वा वामपादं प्रसार्य च ॥ ७० ॥
आलीढपरिवर्तस्तु प्रत्यालीढमिति स्मृतम् ।
आलीढ स्थान से विपरीत अर्थात् दाहिने पैर को सिकुड़ाकर उस
(दाहिने) पैर से बाएं पैर का पांच ताल के अन्तर से ऊपर फैलाना
'प्रत्यालीढ स्थान' कहलाता है। (इसके भी अधिदेवता रुद्र हैं) ॥७०-७१॥
आलीढ संहितं शस्त्रं प्रत्यालीढेन मोक्षयेत् ॥ ७१ ॥
नानाशास्त्रविमोक्षो हि कार्योऽनेन प्रयोक्तृभिः ।
योजना—आलीढ स्थान से जिन शस्त्रों का सन्धान किया गया हो
उन्हें प्रत्यालीढ स्थान से चलाना चाहिए। अनेक शस्त्रों का चलाना भी इसी
स्थान के द्वारा अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है ॥ ७१-७२ ॥
न्याय-(लक्षण तथा योजना )—
न्यायाश्चैवात्र विज्ञेयाश्चत्वारः शस्त्रमोक्षणे ॥ ७२ ॥
भारतः सात्वतश्चैव वार्षगण्योऽथ कैशिकः ।
१. आलीढ़स्थानकं—ग० । २. श्चात्राधि—ख-ग० ।
३. सहितं-ग० । ४. श्चैव प्रयोक्तव्या—ख० ।

एकादशोऽध्यायः १०९
शस्त्रों के प्रयोग में चार न्याय का प्रयोग करना चाहिये । ये न्याय
हैं :—(१) भारत, (२) सात्वत, (३) वार्षगण्य तथा (४) कैशिक ॥७२-७३॥
भारते तु कटि१च्छेदं पादच्छेदं २तु सात्वते ॥ ७३ ॥
वक्षसो वार्षगण्ये तु शिरश्छेद्यन्तु कैशिके ।
भारतन्याय में शस्त्रों को कटिप्रदेश से, सात्वत में पैरों के बराबर से,
वार्षगण्य में वक्षस्थल से तथा कैशिक में मस्तक पर से चलाना चाहिए ॥
एभिः प्रयोक्तृभिर्न्यायैर्नानाचारीसमुत्थितैः ॥ ७४ ॥
प्र३विचाराः प्रयोक्तव्या नानाशस्त्र-विमोक्षणे ।
इस प्रकार विभिन्न चारी द्वारा निर्मित इन न्यायों से अनेक शस्त्रों को
चलाने के अवसर पर अभिनेताओं द्वारा रंगमंच पर विशिष्ट गतियों में
चलना चाहिए।
न्या४याश्रितैरङ्गहारैर्न्यायाच्चैव समुत्थितैः ॥ ७५ ॥
यस्माद्युद्धानि वर्तन्ते५ तस्मान्न्यायाः प्र६वर्तिताः ।
ये न्याय इसलिये कहलाते हैं क्योंकि ये रंगमंच पर युद्ध को उन
अंगहारों सहित नियमित करते हैं—जो इन्हीं (न्याय) से उत्पन्न होते हैं ॥
भारत :—
वामहस्ते७ विनिक्षिप्य खेटकं दक्षिणेन च ॥ ७६ ॥
शस्त्रमादाय हस्तेन प्रविचारमथाचरेत् ।
प्रसार्य च करौ सम्यक् पुनरा८क्षिप्य चैव हि ॥ ७७ ॥
खेटकं भ्रामयेत् पश्चात् पार्श्वात् पार्श्वमथापि च ।
शिरः परिगमश्चापि कार्यः शस्त्रेण योक्तृभिः ॥ ७८ ॥
कपोलांस्यान्तरे वापि शस्त्रस्योद् १०घट्टनं तथा ।
पुनश्च खड्गहस्तेन ललितो ११द्वेष्टितेन च ॥ ७९ ॥
खेटकेन च कर्तव्यः—शिरः-परिगमो बुधैः ।
एवं विचारः कर्तव्यो भारते शस्त्रमोक्षणे ॥ ८० ॥
१. कटीच्छेदं—ग०। २. पादच्छेदं—ख-ग ।
३. प्रविचार्यं प्रयोक्तव्यो—ग० । ४. न्यायं श्रितै—ग० ।
५. नीयन्ते—ख-ग० । ६. प्रकीर्तिताः—ग० ।
७. हस्तेन निक्षिप्य—ख-ग० । ८. पुनरावर्त्य—ख० ।
९. कपोलांसान्तरे—ख० । १०. शस्त्रस्योद्वेष्टनं तथा—ग० ।
११. ललितोद्द्वर्त्तितेन च—ख० ।

११० नाट्यशास्त्रम्
बायें हाथ में ढाल को सामने रखते हुए तथा दाहिने हाथ में तलवार
(शस्त्र) लेकर अभिनेता रंगमंच पर चले। फिर वह सामने की ओर हाथ
को पूरा फैला दे और पीछे की ओर खींच ले और तब ढाल को पीछे आगे
तथा दाये-बायें घुमाए, (और) फिर अपने मस्तक के चारों ओर तलवार
या शस्त्र को घुमावे (फिर) उसे कपोल प्रदेश के समीप गोल घुमावे और
फिर हाथ में तलवार तथा ढाल लेकर ललित क्रम से घुमाते हुए मस्तक के
चारों ओर एक चक्कर लगाले। (इस प्रकार) शस्त्रों के चलाने में 'भारत'
न्याय के प्रदर्शन के समय इसी विधि से मंच पर चलना (विचार) चाहिए ॥
सात्वत—
सात्वते तु प्रवक्ष्यामि प्रविचारं यथाविधि ।
स एवं प्रविचारस्तु शस्त्रखेटकयोः स्मृतः ॥ ८१ ॥
केवलं पृष्ठतः २शंखं कर्तव्यं खलु सात्वते ।
अब मैं सात्वतन्याय में होने वाली चाल को बतलाता हूँ। भारतन्याय
के समान सात्वत न्याय में भी शस्त्र और ढाल की चाल वही होगी केवल
इसमें शस्त्रों का घुमाना पीछे से होता है ॥ ८१-८२ ॥
वार्षगण्य—
गतिश्च वार्षगण्येऽपि सात्वतेन क्रमेण तु ॥ २८ ॥
३शस्त्रखेटकयोश्चापि भ्रमणं संविधीयते ।
४शिरःपरिगमस्तद्वच्छस्त्रस्येह भवेत्तथा ॥ ८३ ॥
उरस्युद्वेष्टनं कार्यं ५शस्त्रस्यांसेऽथवा पुनः ।
वार्षगण्य न्याय में भी सात्वत न्याय के क्रमानुसार ही गति (चाल)
रहती है। इसमें शस्त्र (तलवार) तथा ढाल को साथ साथ घुमाया जाता है
और इन शस्त्रों को मस्तक का एक चक्कर लगाते हुए घुमाते हैं और इसके
बाद शस्त्र छाती या कन्धे के सामने वाले स्थान पर घुमाये जाते हैं ॥८२-८३॥
कैशिक—
भारते प्रविचारो यः कर्त्तव्यस्स तु कैशिके ॥ ८४ ॥
७विभ्रमय्य तथा शस्त्रं केवलं मूर्ध्नि पातयेत् ।
१. एवं—ख—ग० । २. शस्त्रं—ग० । ३. खड्ग—ख० ।
४. शिरः परिगमादस्मिस्तस्य शस्त्रस्य केवलम्—ख० ग० ।
५. शस्त्रस्याङ्गेन वा पुनः—ग० ।
६. प्रविचारोऽयं—ग० । ७. विभ्रमश्च—ख० ।

एकादशोऽध्यायः १११
तलवार (शस्त्र) का छाती या कन्धों के पास घुमाना भारत न्याय
जैसा कैशिक न्याय में भी ठीक उसी तरह से रखना चाहिए। इसमें केवल
अन्त में शस्त्र को घुमाकर मस्तक के ऊपर ले जाया जाए ॥ ८४-८५ ॥
प्रविचाराः१ प्रयोक्तव्या ह्येवमेतेऽङ्गलीलया ॥ ८५ ॥
धनुर्वज्रो२ऽसिशस्त्राणां प्रयोक्तव्या विमोक्षणे ।
शरीर की लीला युक्त हलचलों के साथ इन न्यायों के द्वारा धनुष, वज्र,
तलवार आदि शस्त्रों को घुमाना (या चलाना) चाहिए ॥ ८५-८६ ॥
न भेद्यं नापि च च्छेद्यं न चापि रुधिरस्रुतिः ॥ ८६ ॥
रङ्गे३ प्रहरणे कार्यो न चापि व्यक्तघातनम् ।
४संज्ञामात्रेण कर्तव्यं शस्त्राणां मोक्षणं बुधैः ॥ ८७ ॥
अथवाभिनयोपेतं कुर्याच्छेदं विधानतः ।
रंगमंच पर प्रदर्शित होनेवाले (इन) युद्धों में भेदन, छेदन और रक्त
का बहना या यथार्थ प्रहार नहीं ब

११२ नाट्यशास्त्रम्
अचञ्चलमकुब्जञ्च संस्र¹ग्गात्रन्तथैव² च ॥ ९० ॥
नात्युच्चं चलपादञ्च³ सौष्ठवाङ्गं प्रयोजयेत् ।
शरीर को सीधे, न झुके हुए, यथेच्छ, न ऊँचे तने और न अधिक झुके
हुए रखकर अङ्गों का सौष्ठव प्रदर्शित करना चाहिए ॥ ९१ ॥
[ कटी कर्णसमा यत्र कूर्परांसं⁴शिरस्तथा ।
⁵समुन्नतमुरश्चैव सौष्ठवं नाम तद्भवेत् । ]
[ प्रक्षिप्त—जिसमें कटि प्रदेश तथा कान एक समान या सीधे हो, इसी
प्रकार कलाई, कन्धे तथा मस्तक भी रहे, छाती थोड़ी ऊँची तनी रहे तो
'सौष्ठव' समझना चाहिए । ]
अत्र नित्यं प्रयत्नो⁷ हि विधेयो मध्यमोत्तमैः ॥ ९१ ॥
नाट्यं नृत्तञ्च सर्वं हि सौष्ठवे सम्प्रतिष्ठितम् ।
मध्यम तथा उत्तम पात्रों द्वारा सौष्ठव को ( प्रयत्नपूर्वक ) ठीक प्रदर्शित
करने का उद्योग करना चाहिए क्योंकि नाट्य, नृत्त तथा नृत्य 'सौष्ठव' पर
ही आधारित हैं ।
चतुरस्र—
कटीनाभिचरौ⁸ हस्तौ वक्षश्चैव समुन्नतम् ॥ ९२ ॥
वैष्णवं स्थानमित्यङ्गं⁹ चतुरश्रमुदाहृतम् ॥
( यदि ) दोनों हाथ, कटि तथा नाभि घूमने वाले हों, छाती तनी हो
और वैष्णवस्थान हो तो 'अङ्गों' का यह सारा एक साथ होने वाला प्रदर्शन
'चतुरस्र' कहलाता है ॥ ९२-९३ ॥
करण—( के कार्य )
परिमार्जनं¹⁰ दानं सन्धानं मोक्षणन्तथा ॥ ९३ ॥
धनुषस्तु प्रयोक्तव्यं कर¹¹णन्तु चतुर्विधम् ।
१. चासन्नगात्रं—ग० । २. मथापि च । ३. चलपातं – ग० ।
४. कूर्परोंऽसस्थितः--ग० ।
५. सौष्ठवं लक्षणं प्रोक्तवत्तर्मनाक्रमयोजितम्--ग० ।
६. पद्यमिदं ग-पुस्तके नास्ति । ७. प्रपन्नो हि विधेये-ख० ।
८. खरौ--ग० । ९. त्यङ्गचतुरस्र-ख० ।
१०. संमार्जनं--ख० । ११. ग्रहणं क्रिया--ख ग० ।