नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः ९७
अतएव अब मैं उन (सभी) के लक्षण, विधान (आदि) को
बतलाऊँगा जिनकी नृत्य, गति तथा युद्ध में योजना की जाती है ॥ ७॥
भौमी चारी तथा आकाशिकी चारी—
समपादा स्थितावर्ता शकटास्या तथैव च ।
अध्यर्धिका चाषगतिर्विच्च्यवा च तथापरा ॥ ८ ॥
एलकाक्रीडिता बद्धा ऊरुद्वृत्ता तथाड्डिता ।
उत्स्पन्दिताथ जनिता स्पन्दिता चापस्पन्दिता ॥ ९ ॥
समोत्सारित-मत्तल्ली मत्तल्लीचेति³ षोडश ।
एता भौम्यस्मृताश्चार्यः,
ये सोलह भौमी चारी हैं—यथा :—(१) समपादा, (२) स्थितावर्ता,
(३) शकटास्या, (४) अध्यर्धिका, (५) चाषगति, (६) विच्च्यवा,
(विच्युता), (७) एलकाक्रीडिता, (८) बद्धा, (९) ऊरूद्वृत्ता,
(१०) अड्डिता (अंगिता), (११) उत्स्पन्दिता (उत्स्यन्दिता),
(१२) जनिता, (१३) स्पन्दिता, (१४) अपस्पन्दिता, (१५)
समोत्सारित-मत्तल्ली तथा (१६) मत्तल्ली ॥ ८-१० ॥
शृणुताकाशिकीः पुनः ॥ १० ॥
अतिक्रान्ता ह्यपक्रान्ता पार्श्वक्रान्ता तथैव च ।
ऊर्ध्वजानुश्च सूची च तथा नूपुरपादिका ॥ ११ ॥
डोलापादा तथाक्षिप्ता आँविद्धोद्वृत्तसंज्ञिते।
विद्युद्भ्रान्ता ह्यलाता च भुजङ्गत्रासिता तथा ॥ १२ ॥
मृगप्लुता च दण्डा च भ्रमरी चेति षोडश ।
आकाशिक्यः स्मृता ह्येता लक्षणञ्च निबोधत ॥ १३ ॥
आकाशिकी चारी (भी) सोलह हैं। यथा :—(१) अतिक्रान्ता,
(२) अपक्रान्ता, (३) पार्श्वक्रान्ता, (४) ऊर्ध्वजानु, (५) सूची,
(६) नूपुरपादिका, (७) दोलपादा (डोलापादा), (८) आक्षिप्ता,
(९) आविद्धा, (१०) उद्वृत्ता, (११) विद्युद्भ्रान्ता (विद्युत्क्रान्ता),
(१२) अलाता, (१३) भुजंगत्रासिता, (१४) हरिणीप्लुता (मृग-
प्लुता) (१५) दण्डा (दण्डपादा), तथा (१६) भ्रमरी। अब मैं इनके
क्रमशः लक्षण बतलाता हूँ ॥ ११-१३ ॥
१. स्थिता वार्त्ता—ख-ग० । २. उत्स्यन्दितां—ख-ग० ।
३. चापि—ग० । ४. व्याविद्धोद्वृत्त सं—ख-ग० ।
७ ना० शा० द्वि०