नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ नाट्यशास्त्रम्
पादजङ्घोरुकरणं समं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।
पादस्य करणं¹ सर्वं जङ्घोरुकृतमिष्यते ॥ ५५ ॥
नाट्यप्रयोक्ता पाद, जंघा तथा ऊरू की गतियों को एक साथ ही
प्रयुक्त करें क्योंकि पैरों की गति के प्रदर्शन करने में जंघा तथा ऊरू की
गतियां भी सम्मिलित रहती ही हैं ॥ ५५ ॥
यथा पादः प्रवर्तेत तथैवोरुः प्रवर्त्तते ।
तयोः² समानकरणात् पादचारीं प्रयोजयेत् ॥ ५६ ॥
क्योंकि पैर जिधर घूमता है पिंडली भी उसी ओर जाएगी, (तथा जंघा
भी) इसी कारण इन (दोनों) की (समान) गति से 'पादचारी' बनती है ॥
इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं लक्षणं कर्म चैव हि ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि चारीव्यायामलक्षणम् ॥ ५७ ॥
यह मैंने विभिन्न अङ्गों का अभिनय बतलाया । अब मैं (विभिन्न)
चारियों के भेद एवं लक्षण (अगले अध्याय में) बतलाऊंगा ॥ ५७ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे शारीरा³भिनयो नाम दशमोऽध्यायः ।
॥ भरतनाट्य शास्त्र का शारीराभिनय नामक दसवां अध्याय समाप्त ॥
१. करणं ग०—। २. अनयोः—ग० ।
३. अङ्गिकाभिनयो नाम नवमोऽध्यायः—क०; ख० ।