नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ नाट्यशास्त्रम्
नूपुरपादिका—एक 'अंचित' पैर को ऊपर उठाकर दूसरे पैर के पीछे
रखे तथा अग्रतलसंचर स्थितिवाले पैर को जल्दी से पृथ्वी पर पटके तो
'नूपुरपादिका' चारी कहलाती है ॥ ३५ ॥
कुंचितं पादमुत्क्षिप्य पाश्र्वात् पार्श्वन्तु दोलयेत् ।
पातयेदञ्चितञ्चैव दोलपादा प्रकीर्तिता ॥ ३६ ॥
दोलपादा—यदि 'कुंचित' पाद को ऊपर उठाकर एक ओर से दूसरी
बाजू तक हिलाए तथा 'अंचित' दशा में रख कर पृथ्वी पर पटक दे तो
'दोलपादा' चारी कहलाती है ॥ ३६ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य आक्षिप्य त्वञ्चितं न्यसेत् ।
जङ्घा स्वस्तिकसंयुक्ता चाक्षिप्ता नाम सा स्मृता ॥ ३७ ॥
आक्षिप्ता—यदि 'कुञ्चित' पैर को उठाकर जल्दी से 'अंचित' दशा
में पृथ्वी पर रख दे तथा जंघाओं को स्वस्तिक करे तो 'आक्षिप्ता' चारी
कहलाती है ॥ ३७ ॥
स्वस्तिकस्याग्रतः पादः कुञ्चितश्च प्रसारितः ।
निपतेदञ्चिताविद्धमाविद्धा नाम सा स्मृता ॥ ३८ ॥
आविद्धा—यदि जंघाओं के स्वस्तिक में एक पैर आगे की ओर फैलाने
समय 'कुञ्चित' रखे तथा उसे 'अंचित' पाद बना कर पृथ्वी पर जल्दी से
पटके तो 'आविद्धा' चारी जानो ॥ ३८ ॥
पादमाविद्धमावेष्ट्य समुत्प्लुत्य निपातयेत् ।
परिवृत्य द्वितीयश्च सोद्वृत्ता चार्युदाहृता ॥ ३९ ॥
उद्वृत्ता—यदि 'आविद्ध' चारी की दशा में कुञ्चित पैर को (दूसरी
जंघा से) लपेट ले तथा फिर दूसरे को इसी प्रकार बदल कर रखे और
ऊपर उठाकर पृथ्वी पर पटके तो 'उद्वृत्ता' चारी होती है ॥ ३९ ॥
पृष्ठतो वलितं पादं शिरोधृष्टं प्रसारयेत् ।
सर्वतो मण्डलाविद्धं विद्युद्भ्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ४० ॥
विद्युद्भ्रान्ता—यदि पीछे की ओर घुमाकर (एक) पैर को मस्तक से
१. पार्श्वं पार्श्वं तु—ख-ग० । २. तु सा स्मृता—ग० ।
३. व्याक्षिप्य—ख० । ४. चाञ्चितं—ग० ।
५. उत्क्षिप्ता—ग० । ६. कुञ्चितस्तु—ग० ।
७. समुत्क्षिप्य—ख-ग० ।