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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 668 में से

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पृष्ठ 212

एकादशोऽध्यायः १०१
अतिक्रान्ता—एक 'कुञ्चित' पैर को ऊपर उठाकर सामने फैलाए तथा
ऊपर उठाकर (फिर) नीचे पटके तो 'अतिक्रान्ता' चारी जानों ॥ ३० ॥
ऊरुभ्यां वलनं कृत्वा कुञ्चितं पादमुद्धरेत् ।
पार्श्वे विनिक्षिपेच्चैनमपक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३१ ॥
अपक्रान्ता—यदि दोनों ऊरुओं (पिंडलियों) के द्वारा 'वलन'
(घुमाव) किया को प्रदर्शित कर फिर एक कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर एक
बाजू में पटके तो 'अपक्रान्ता' चारी होती है ॥ ३१ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्वं सम्प्रसारयेत् ।
उद्वृत्तेन पादेन पार्श्वक्रान्ता विधीयते ॥ ३२ ॥
पार्श्वक्रान्ता—यदि पैर को 'कुञ्चित' दशा में ऊपर उठाकर जंघा से
ऊपर ले जाए तथा फिर उसी ऊपर उठे हुए पैर को एक बाजू की ओर
ले जाए तो 'पार्श्वक्रान्ता' चारी होती है ॥ ३२ ॥
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानु स्तनसमं न्यसेत् ।
द्वितीयश्च क्रमात्स्तब्धमूर्ध्वजानुः प्रकीर्तिता ॥ ३३ ॥
ऊर्ध्वजानु—यदि 'कुंचित' पैर को ऊपर उठाकर और (इसी पैर की)
जंघा को छाती के बराबर ऊँचा उठाकर रखा जाए, दूसरी जानु स्तब्ध रखे
तथा फिर इसी क्रम से दूसरे पैर को कुञ्चित दशा में ऊपर उठाए और
पहले को स्थिर रखे तो 'ऊर्ध्वजानु' चारी होती है ।
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य जानूर्ध्वं सम्प्रसारयेत् ।
पातयेच्चाग्रयोगेन सा सूची परिकीर्तिता ॥ ३४ ॥
सूची—यदि 'कुञ्चित' पैर को जंघा के ऊपर तक ले जाकर फैला दे
और फिर इसके पंजे के आगे वाले भाग को जमीन पर पटके तो 'सूची'
चारी जानो ॥ ३४ ॥
पृष्ठतो ह्यञ्चितं कृत्वा पादमग्रतलेन तु ।
द्रुतं निपातयेद् भूमौ चारी नूपुरपादिका ॥ ३५ ॥
१. च्चैव—ग० ।
२. जानु स्तनसमं न्यसेत्—क०, पार्श्वोत्थानगतिं न्यसेत्—ख०, पार्श्वोत्थानो-
द्वर्ति न्यसेत्--ग० ।
३. क्रमात् स्तब्ध--ख-ग० । ४. जानुरुर्ध्वं--ख० ।