नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ नाट्यशास्त्रम्
भौमीचारी-लक्षण
पदैर्निरन्तरकृतैस्तथा समनखैरपि ।
समपादा तु सा चारी विज्ञेया स्थानसंश्रया ॥ १४ ॥
समपादा—दोनों पैरों को पास रखते हुए तथा नखों को बराबर
मिलाते हुए अपने स्थान पर स्थित रहने (या खड़े रहने) को 'समपादा'
चारी कहते हैं ॥ १४ ॥
भूमिघृष्टेन पादेन कृत्वाभ्यन्तरमण्डलम् ।
पुनरुत्सारयेदन्यं स्थितावर्ता तु सा स्मृता ॥ १५ ॥
स्थितावर्त्ता—यदि भूमि पर रगड़ते हुए एक (अग्रतलसंचर) पाद को
ऊपर उठाकर स्वस्तिक दशा बनाते हुए दूसरे पैर को अपने पास खींचे
तथा दोनों के पृथक् होने के पश्चात् यही गति पुनः आवृत्त की जाए तो
'स्थितावर्त्ता' चारी होती है ॥ १५ ॥
निषण्णाङ्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम् ।
उद्वाहितमुरः कृत्वा शकटास्यां प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥
शकटास्या—शरीर को सीधा रखते हुए एक चरण को 'अग्रतलसंचर'
दशा में सामने (की) ओर रखे तथा छाती को 'उद्वाहित' स्थिति में
रखे तो 'शकटास्या' चारी होती है ॥ १६ ॥
सव्यस्य पृष्ठतो वामश्चरणस्तु यदा भवेत् ।
तस्यापसर्पणञ्चैव ज्ञेया साध्यर्धिका बुधैः ॥ १७ ॥
अध्यर्धिका—यदि बाएं पैर की एड़ी (के पिछले भाग) पर दाहिना पैर
रखकर फिर उसे पीछे हटाया जाए (तथा यह डेढ़ताल के कालप्रमाण पर
हो) तो 'अध्यर्धिका' चारी जानो ॥ १७ ॥
पादः प्रसारितः सव्यः पुनश्चैवोपसर्पितः ।
वामः सव्यापसर्पी च चाषगत्यां विधीयते ॥ १८ ॥
चाषगति—यदि दाहिने पैर को (आगे) फैलाकर फिर पीछे की
ओर रख दिया जाए और बायां पैर उसी समय पीछे की ओर रखकर पुनः
आगे बढ़ाकर रख दे तो 'चाषगति' चारी जानों ॥ १८ ॥
१. स्मृता—ख-ग०। २. स्थिता वार्त्ता—ख-ग०।
३. शकटास्यं—ग०।