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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

१०६ नाट्यशास्त्रम्
योजना—इस स्थान के द्वारा उत्तम तथा मध्यम प्रकृति के पात्रों का
उनके विभिन कार्यों से सम्बद्ध सामान्य-(स्वाभाविक-) वार्तालाप प्रदर्शित
किया जाता है ॥ ५४ ॥
चक्रस्य मोक्षणे चैव धारणे धनुषस्तथा ।
धैर्याोदात्ताङ्गलीलासु तथा क्रोधे प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥
इसकी चक्र फेंकने, धनुष धारण करने, धैर्य दान, लीलायुक्त शारीरिक
गति (अंगलीला) तथा क्रोध में योजना करनी चाहिए ॥ ५५ ॥
इदमेव विपर्यस्तं प्रणयक्रोध इष्यते ।
उपालम्भकृते चैव प्रणयोद्वेगयोस्तथा ॥ ५६ ॥
शङ्कासूयौग्रताचिन्तामतिस्मृतिषु चैव हि ।
दैन्ये चपलतायाञ्च गर्वोभीष्टेषु शक्तिषु ॥ ५७ ॥
शृङ्गाराद्भुतबीभत्स-वीरप्राधान्ययोजितम् ।
इस स्थान के पलट कर (विपरीत दिशाओं में) प्रदर्शन के द्वारा प्रणय-
क्रोध, प्रणयोपालम्भ, प्रणयोद्वेग तथा इसी प्रकार शंका, असूया, उग्रता,
चिन्ता, मति, स्मृति, दैन्य, चपलता तथा गर्व जैसे संचारीभाव, अभीष्ट बल
प्रदर्शन के भाव तथा शृङ्गार, अद्भुत और वीर रस की प्रधानता बतलायी
जाती है ॥ ५६-५८ ॥
समपादे समौ पादौ तालमात्रान्तरस्थितौ ॥ ५८ ॥
स्वभावसौष्ठवोपेतौ ब्रह्मा चात्राधिदैवतम् ।
समपादस्थान—यदि दोनों पैर एक ताल के अन्तर से अपनी स्वाभाविक
मुद्रा में समान स्थित हों तथा स्वाभाविक सौष्ठव लिए हुए हों तो
'समपाद स्थान' होता है । इसके अधिकारी देव ब्रह्माजी हैं ॥ ५८-५९ ॥
अनेन कार्यं स्थानेन विप्रमङ्गलधारणम् ॥ ५९ ॥
रूपणं पक्षिणाञ्चैव वरं कौतुकमेव च ।
खस्थानां स्यन्दनस्थानां विमानस्थायिनामपि ॥ ६० ॥
लिङ्गस्थानां व्रतस्थानां स्थानमेतत्तु कारयेत् ।
योजना—इस स्थान से ब्राह्मणों के मंगल आशीष ग्रहण, (दिव्य) पुरुष,
१. मोक्षणं—ग० । २. धैर्येदानाङ्गलीलासु—ग० ।
३. प्रकर्षाधिबलस्तथा—ख-ग० । ४. चपलतायोगे—ग० ।
५. मन्त्राधिक्येषु—ख० । ६. योषितम्—ग० । ७. कारणम्—ग० ।