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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

१०४ नाट्यशास्त्रम्
आकाशिक्यः स्मृता ह्येता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
धनुर्वज्रा१सिसंश्राणां [प्रयोक्तव्या विमोक्षणे ॥ ४६ ॥
ये अङ्गों के ललित संचालन द्वारा होने वाली आकाशीकी चारी हैं ।
इनकी धनुष, वज्र, असि तथा अन्य शस्त्रों के चलाने में योजना करनी
चाहिए ॥ ४६ ॥
अग्रगौ पृष्ठगौ वापि ह्यनुगौ वापि योगतः ।
पादयोस्तु द्विजा हस्तौ कर्तव्यौ नाट्ययोक्तृभिः ॥ ४७ ॥
हे मुनियो, इन सभी प्रदर्शनों के अवसर पर पैरों की गति के अनुसार
हस्तों को आगे जानेवाले, पीछे जानेवाले तथा साथ साथ ( रहने वाले )
रखना चाहिए ॥ ४७ ॥
यतः पादस्ततो हस्तो यतो हस्तस्ततः त्रिकम् ।
पादस्य निर्गमं४ कृत्वा५ तथोपाङ्गानि योजयेत् ॥ ४८ ॥
क्योंकि जिधर पैर जाए वहीं हाथ भी ( उसका अनुसरण करते हुए )
बढ़े तथा जिधर हाथ जाए वहीं शेष शरीर भी घूमे । पाद की एक डग
भरने के उपरान्त उपांगों की योजना अभिनय में करनी चाहिए ॥ ४८ ॥
पादचार्यां यथा पादो धरणीमेव गच्छति ।
एवं हस्तं७ चरित्वा तु कटीदेशं समाश्रयेत् ॥ ४९ ॥
किसी भी 'चारी' के प्रदर्शन (करने) के पश्चात् जैसे पैर भूमि पर रखा
जाता है वैसे ही हस्त को अपने इष्ट प्रदर्शन के बाद गोल घुमाव लेकर
कटि पर रखना चाहिए ॥ ४९ ॥
एताश्चार्यो मया प्रोक्ता ललिताङ्गक्रियात्मिकाः ।
स्थानान्यसां प्रवक्ष्यामि सर्वशस्त्रविमोक्षणे ॥ ५० ॥
इस प्रकार मैंने ललित आंगिक क्रियाओं से होनेवाली ये चारी
बतलायी । अब मैं शस्त्रों को चलाने में योजित किये जाने वाले इनके
स्थानों को बतलाता हूँ ॥ ५० ॥
१. ब्रज्रादि—ख-ग० । २ समगौ—ग० ।
३. अनुगौ—ग० । ४. निर्गतिं—ख ।
५. ज्ञात्वा—ग० । ६. पादचार्या—ख-ग० ।
७. हस्तश्चरित्वा—क० । ८. स्थानानि सम्प्रवक्ष्यामि—ग ।