नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः १०३
रगड़ खाता हुआ फैलाए और चारों ओर एक गोल चक्कर ले ले तो
‘विद्युद्भ्रान्ता’ चारी होती है ॥४०॥
पृष्ठे प्रसारितः पादो वलितोऽभ्यन्तरीकृतः ।
पार्ष्णिप्रपतितश्चैव ह्यलाता सम्प्रकीर्तिता ॥ ४१ ॥
अलाता—यदि एक पैर को पीछे की ओर फैला दे तथा घुमाकर इसे
अन्दर रखते हुए दूसरे पैर के पंजे के पास पटके तो 'अलाता' चारी जानों ॥
कुंचितं पादमुत्क्षिप्य त्र्यश्रमूरूं विवर्तयेत् ।
कटीजानु-विवर्त्ताच्च भुजङ्गत्रासिता भवेत् ॥ ४२ ॥
भुजंगत्रासिता—यदि कुञ्चित पैर को ऊपर उठाकर पिंडली को गोल
चक्करदार घुमाव दे साथ में कटि तथा जंघा को भी एक गोल घुमाव दे तो
'भुजंगत्रासिता' चारी जानो ॥ ४२ ॥
अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा चोत्प्लुत्य५ विनिपातयेत् ।
जङ्घाञ्चितां परिक्षिप्ता सा ज्ञेया ७हरिणप्लुता ॥ ४३ ॥
हरिणप्लुता—यदि अतिक्रान्ताचारी में एक उछाल (उत्प्लुत्य) मार
कर पृथ्वी पर पैर टिका दे तथा जंघा को अंचित पाद युक्त करते हुए
आक्षिप्त दशा में पैर को नीचे पटके तो 'हरिणप्लुता' चारी होती है ॥४३॥
नूपुरं चरणङ्कृत्वा पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
क्षिप्तंमाविद्धकरणं दण्डपादा तु सा स्मृता ॥ ४४ ॥
दण्डपादा—यदि नपुर (पादिका) चारी को प्रदर्शित कर एक पैर को फैला
कर (उसे शीघ्र) पीछे लौटाया जाए तो ‘दण्डपादा’ चारी कहलाती है ॥
अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा त्रिकन्तु परिवर्तयेत् ।
द्वितीयपादभ्रमणात्तलेन भ्रमरी स्मृता ॥ ४५ ॥
भ्रमरी—यदि अतिक्रान्ता चारी को प्रदर्शित करते हुए एक पैर को ऊपर
उठाया जाए तथा पीठ को घुमाव दे दे (सारे शरीर को एक गोल चक्कर
देकर) और फिर दूसरे पैर को उसके नीचे भाग में घुमाव दे दे तो
'भ्रमरी' चारी कहलाती है ॥ ४५ ॥
१. पृष्ठतः सर्वतः पादो वलिताभ्यन्तरीकृतः—ख० ।
२. प्रपादितश्चैव—ग। ३. प्रवर्तयेत्—ग० ।
४. विवर्तेन—ग० । ५. समुत्प्लुत्य विपातयेत्—ग० ।
६. जङ्घाञ्चितोपरि क्षिप्ता—ख–ग० । ७. हरिणी—ख० ।
८. क्षिप्र—ग० । ९. च्वलने—ख० ।