नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० नाट्यशास्त्रम्
बायें हाथ में ढाल को सामने रखते हुए तथा दाहिने हाथ में तलवार
(शस्त्र) लेकर अभिनेता रंगमंच पर चले। फिर वह सामने की ओर हाथ
को पूरा फैला दे और पीछे की ओर खींच ले और तब ढाल को पीछे आगे
तथा दाये-बायें घुमाए, (और) फिर अपने मस्तक के चारों ओर तलवार
या शस्त्र को घुमावे (फिर) उसे कपोल प्रदेश के समीप गोल घुमावे और
फिर हाथ में तलवार तथा ढाल लेकर ललित क्रम से घुमाते हुए मस्तक के
चारों ओर एक चक्कर लगाले। (इस प्रकार) शस्त्रों के चलाने में 'भारत'
न्याय के प्रदर्शन के समय इसी विधि से मंच पर चलना (विचार) चाहिए ॥
सात्वत—
सात्वते तु प्रवक्ष्यामि प्रविचारं यथाविधि ।
स एवं प्रविचारस्तु शस्त्रखेटकयोः स्मृतः ॥ ८१ ॥
केवलं पृष्ठतः २शंखं कर्तव्यं खलु सात्वते ।
अब मैं सात्वतन्याय में होने वाली चाल को बतलाता हूँ। भारतन्याय
के समान सात्वत न्याय में भी शस्त्र और ढाल की चाल वही होगी केवल
इसमें शस्त्रों का घुमाना पीछे से होता है ॥ ८१-८२ ॥
वार्षगण्य—
गतिश्च वार्षगण्येऽपि सात्वतेन क्रमेण तु ॥ २८ ॥
३शस्त्रखेटकयोश्चापि भ्रमणं संविधीयते ।
४शिरःपरिगमस्तद्वच्छस्त्रस्येह भवेत्तथा ॥ ८३ ॥
उरस्युद्वेष्टनं कार्यं ५शस्त्रस्यांसेऽथवा पुनः ।
वार्षगण्य न्याय में भी सात्वत न्याय के क्रमानुसार ही गति (चाल)
रहती है। इसमें शस्त्र (तलवार) तथा ढाल को साथ साथ घुमाया जाता है
और इन शस्त्रों को मस्तक का एक चक्कर लगाते हुए घुमाते हैं और इसके
बाद शस्त्र छाती या कन्धे के सामने वाले स्थान पर घुमाये जाते हैं ॥८२-८३॥
कैशिक—
भारते प्रविचारो यः कर्त्तव्यस्स तु कैशिके ॥ ८४ ॥
७विभ्रमय्य तथा शस्त्रं केवलं मूर्ध्नि पातयेत् ।
१. एवं—ख—ग० । २. शस्त्रं—ग० । ३. खड्ग—ख० ।
४. शिरः परिगमादस्मिस्तस्य शस्त्रस्य केवलम्—ख० ग० ।
५. शस्त्रस्याङ्गेन वा पुनः—ग० ।
६. प्रविचारोऽयं—ग० । ७. विभ्रमश्च—ख० ।