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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 668 में से

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पृष्ठ 206

एकादशोऽध्यायः
चारी विधान
१चारी—
एवं पादस्य जङ्घाया ऊरोः¹ कट्यास्तथैव च ।
समान²करणे चेष्टा चारीति परिकीर्तिता ॥ १ ॥
( हाथ ) पैर, जंघा, ऊरू तथा कटि ( आदि ) अङ्गों की एक साथ
( निर्दिष्ट पद्धति से ) चलनात्मक चेष्टा 'चारी' कहलाती है ॥ १ ॥
विधा³नोपगताश्चार्यो व्यायच्छे४न्ते परस्परम् ।
यस्मादङ्गसमायुक्तास्तस्माद् व्यायाम उच्यते ॥ २ ॥
टिप्पणी—१ 'चारी' शब्द का आशय वर्तमान 'चाल' शब्द से है तथा
उसे ही 'चारी' शब्द से यहां निर्दिष्ट किया गया है यही सामान्यतः कहा जा
सकता है । कथकलि में 'सारी' तथा मणिपुरी नृत्य में होने वाली 'चाली' इसी
शब्द का अपभ्रंश या वर्तमान प्रचलित नाम है जिसे अंग्रेजी में Step कहते हैं ।
इसे 'चारी' शब्द द्वारा प्रकट कर सकते हैं ।
नाट्यशास्त्र में भौमीचारी तथा आकाशीकी-चारी के ३२ प्रकार बतलाए
गए हैं । संगीतरत्नाकर में देशीचारी के अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये हैं जो
नाट्यशास्त्र के परवर्ती आचार्यों-(कोहल तथा अन्य परवर्ती आचार्यों) द्वारा
निरूपित की गई । इनमें ३५ भौमी तथा २९ आकाशीकी चारी है ।
संगीत-रत्नाकर के व्याख्याकार चतुर कल्लिनाथ ने ( अपनी व्याख्या में )
कोहल का मत उद्धृत करते हुए २५ मधुपाचारी को बतलाया जो अपने 'कुट्टन'
विधान के द्वारा चारी-समूह में स्वतंत्र महत्त्व रखती है । आचार्य कोहल ने
नृत्याचार्यों की आवश्यकतानुसार चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी मान्यता
दी है । इस प्रकार चारी के भेदों के विषय मे प्राचीन एवं मध्यवर्ती नाट्याचार्यों
में पर्याप्त मतभेद परिलक्षित होता है । चारी के विषय में संक्षेप में इतना ही
पर्याप्त है । विशेषजिज्ञासुजन-संगीतरत्नाकर [७।९२०-१०२६, भरतार्णव
अध्याय ८।४९३-५।४३, के अतिरिक्त अभिनयदर्पण तथा संगीतराज का चारी-
वर्णन भी देखें ।
१. ऊर्वोः—ख-ग० । २. समानकरणाच्चेष्टा—ख-ग० ।
३. विधानोभयतश्चार्यो—ख-ग० । ४. व्यायच्छन्ति—ख-ग० ।