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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 668 में से

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पृष्ठ 210

एकादशोऽध्यायः ९९
विच्यं¹वात् समपादाया विच्यवां सम्प्रयोजयेत् ।
निकुट्टयंस्तं²स्तलाग्रेण पादस्य धरणीतलम् ॥ १९ ॥
विच्यवा—यदि समपादा चारी के दोनों पैरों को अलग हटा कर (उनके)
पञ्जों को पृथ्वी पर (ताल देते हुए) पटकें तो 'विच्यवा' चारी जानों ॥१९॥
तलसञ्चरपादाभ्यामुत्प्लुत्य पतनन्तु यत् ।
पर्यायशै³श्च क्रियते एडकाक्रीडिता तु सा ॥ २० ॥
एलकाक्रीडिता—यदि तलसंचर पादों से उछाल लेकर पृथ्वी पर क्रमशः
गिरता रहे तो 'एलकाक्रीडिता' चारी जानो ॥ २० ॥
अन्योन्य जङ्घासंवेधात् कृत्वा तु स्वस्तिकं ततः ।
ऊरूभ्यां वलनं यस्मात् सा बद्धा चार्युदाहृता ॥ २१ ॥
बद्धा—दोनों जंघाओं को 'स्वस्तिक' बनाकर पिंडलियों को धीरे-धीरे
हिलाने पर 'बद्धा' चारी हो जाती है ॥ २१ ॥
तलसञ्चरपादस्य पाष्णिर्बाह्योन्मुखी यदा ।
जङ्घाञ्चिता तथोद्वृत्ता ऊरूद्वृत्तेति सा स्मृता ॥ २२ ॥
ऊरूद्वृत्ता—यदि 'तलसंचरपाद' में पञ्जा आगे रख दिया जाए और
एक पिंडली थोड़ी नमाकर जंघा को ऊपर उठाले तो 'ऊरूद्वृत्ता' चारी
होती है ॥ २२ ॥
अग्रतः पृष्ठतो⁴ वापि पादो⁵ऽग्रतलसञ्चरः ।
द्वितीयपादनिर्घृष्टो यस्यां स्यादड्डिता तु सा ॥ २३ ॥
अड्डिता—यदि एक 'अग्रतलसंचर' पैर को आगे या (और) पीछे
की ओर पृथ्वी को रगड़ता हुआ रखा जाए तो 'अड्डिता' चारी जानो ॥२३॥
शनैः पादो निवर्तेत बाह्येनाभ्यन्तरेण च ।
यद् रेचकानुसारेण सा चार्युत्स्पन्दितास्मृता ॥ २४ ॥
उत्स्पन्दिता—यदि 'रेचक' के अनुसार दोनों पैरों को क्रमशः एक
दूसरे के पीछे घुमाया जाए (जिससे कि वह आगे आए और पीछे चला
जाए) तो 'उत्स्पन्दिता' चारी होती है ॥ २४ ॥
मुष्टिहस्तश्च वक्षस्थः करोऽन्यश्च प्रवर्तितः ।
तलसञ्चरपादश्च जनिता चार्युदाहृता ॥ २५ ॥
१. वीच्यवाक् समपादायां—ख-ग० । २. स्तथाग्रेण—ख-ग० ।
३. पर्यायतश्च—ख-ग० । ४. पृष्ठतश्चापि—ख० ।
५. पादस्तु तलसञ्चरः—ख-ग० । ६. चार्युत्सन्दिता—ग० ।