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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 668 में से

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१०० नाट्यशास्त्रम्
जनिता—यदि एक 'मुष्टि' हस्त छाती पर तथा दूसरा हाथ गोल
चक्कर लगाते हुए रखे और पैर 'अग्रतलसंचर' दशा में हो तो 'जनिता'
चारी हो जाती है ॥ २५ ॥
पञ्चतालान्तरं पादं प्रसार्य स्यन्दितां न्यसेत् ।
द्वितीयेन तु पादेन तथापस्यन्दितामपि ॥ २६ ॥
स्यन्दिता—यदि एक पैर को दूसरे पैर से पांच ताल के अन्तर से
सामने रखी जाए तो 'स्यन्दिता' चारी होती है ।
अप(अव)स्यन्दिता—स्यन्दिता-चारी के ठीक विपरीत (यदि दूसरे
पैर को पहले पैर के सामने पांच ताल के अन्तर से ) रखा जाए तो
'अवस्यन्दिता' चारी जानों ॥ २६ ॥
तलसञ्चर¹पादाभ्यां ²घूर्णमानोपसर्पणैः ।
समोत्सारितमत्तल्ली व्यायामे समुदा³हृता ॥ २७ ॥
समोत्सारित मत्तल्ली—यदि तलसंचर पादों से पीछे की ओर गोल
चक्कर लगाते हुए जाया जाए तो 'समोत्सारित-मत्तल्ली' चारी होती
है ॥ २७ ॥
उभाभ्यामपि पादाभ्यां घूर्णमानोपसर्पणैः ।
उद्वेष्टितापविद्धैश्च हस्तैर्मत्तल्युदाहृता ॥ २८ ॥
मत्तल्ली--यदि एक गोल चक्कर लगाकर पीछे जाया जाए तथा हस्त
उद्वेष्टित तथा पुनः अपविद्ध ( गतिहीन ) स्थिति में रखे तो 'मत्तल्ली' चारी
होती है ॥ २८ ॥
एता भौम्यः स्मृताश्चार्यो नियुद्धकरणाश्रयाः ।
आकाशिंकीनां चारीणां सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २९ ॥
ये सभी भौमीचारी कहलाती हैं। इनका प्रयोग बाहुयुद्ध तथा करणों
के प्रदर्शन में किया जाता है। अब मैं आकाशिकी-चारी के लक्षण
बतलाता हूँ ॥ २९ ॥
आकाशिकी चारी लक्षण :—
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पुरतः सम्प्रसारयेत् ।
उत्क्षिप्य पातयेच्चैनमतिक्रान्ता तु सा स्मृता ॥ ३० ॥
१. सञ्चार—ग० । २. घूर्णमानापसर्पणैः—ख० ।
३. समुदाहृताः—ग० । ४. भौम्यः—ख-ग० ।
५. नियुक्तकरणं—ख-ग० । ६. आकाशकीनां—ग० ।