नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः १०७
तथा विमान में स्थित पुरुष, शैवसंन्यासी ( लिंगस्थ ) तथा व्रतस्थ पुरुष
को बतलाया जाता है ॥ ५९-६१ ॥
तालास्त्रयोऽर्धतालश्च पादयोरन्तरं भवेत् ॥ ६१ ॥
तालास्त्रीनर्धतालांश्च निषण्णोरुं प्रकल्पयेत् ।
त्र्यश्रौ पक्षेस्थितौ चैव तत्र पादौ प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥
वैशाखस्थानमेतद्धि स्कन्दश्चात्राधिदैवतम् ।
वैशाख स्थान—यदि दोनों पैर साढ़े तीन ताल के अन्तर से गतिहीन
(स्तब्ध) रखें और पैर तिरछे तथा एक दूसरे के सम्मुख बाजू को बतलाते
हुए रखे जाए तो 'वैशाखस्थान' होता है । इसके अधिदेवता कार्तिकेय हैं ॥
स्थानेनानेन कर्तव्यमश्वानां वाहनं बुधैः ॥ ६३ ॥
व्यायामो निर्गमश्चैव स्थूलपक्षिनिरूपणम् ।
शरासनसमुत्कर्षे व्यायामकृतमेव च ॥ ६४ ॥
रेचकेषु च कर्तव्यमिदमेव प्रयोक्तृभिः ।
योजना—इस स्थान से अश्वारोहण, व्यायाम, (एक स्थान विशेषसे)
बहिर्गमन (निर्गम), बड़े आकार वाले पक्षियों का निरूपण, धनुष का
खींचना या अभ्यास तथा पाद रेचकों का प्रदर्शन किया जाता है ॥६३-६५॥
मण्डलस्थान—
ऐन्द्रे तु मण्डले पादौ चतुस्तालान्तरस्थितौ ॥ ६५ ॥
त्र्यश्रौ पक्षस्थितौ चैव कटिजानू समौ तथा ।
धनुर्वज्राणि शस्त्राणि मण्डलेन प्रयोजयेत् ॥ ६६ ॥
वाहनं कुञ्जराणान्तु स्थूलपक्षिनिरूपणम् ।
मण्डलस्थान के अधिदेवता 'इन्द्र' देव हैं । इस स्थान में पैर चार
ताल के अन्तर से होते हैं, (वे) तिरछे तथा एक दूसरे के सम्मुख समान
अवस्था में रखे जाते हैं, कटि तथा घुटने अपने स्वाभाविक स्वरूप में
रहते हैं ॥ ६५-६६ ॥
योजना:—इस स्थान का प्रयोग धनुष तथा वज्र आदि शस्त्रों के चलाने,
हाथी पर सवार होने और स्थूल पक्षियों के बतलाने में किया जाता है ॥
१. वक्षः स्थितौ—ख-ग० । २. स्थलपक्ष—ख०-स्थूलपक्षि—ग० ।
३. शराणाञ्च समुत्क्षेपं—ग० । ४. ऐन्द्रन्तु मण्डलं—ग० ।
५. वक्षःस्थितौ—ख-ग० । ६. वज्रादिशस्त्राणां—ग० ।