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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 668 में से

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पृष्ठ 204

दशमोऽध्यायः ९३
पार्ष्णिर्यस्य स्थिता भूमौ^१ पादमग्रतलन्तथा ।
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः स पादोऽञ्चित उच्यते ॥ ५१ ॥
एड़ी भूमि पर टिकी हो, पंजा ऊपर उठा हुवा तथा उंगलियां सिकुड़ी
हुई ( झुकी हुई ) रहे तो 'अंचित' पाद कहलाता है ।
पादाग्रस्थितसञ्चारे वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
^२एष पादाहते कार्यो नाना भ्रमरकेषु च ॥ ५२ ॥
पंजों के बल खड़े होकर चलने, किसी ओर घूमने और लौटने
( वर्तितोद्वर्तिते ), पैर से पीटने तथा अमरी-चारी के प्रदर्शन में इस
अञ्चित पाद की योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
उत्क्षिप्तता यस्य पार्ष्णिः स्यादङ्गुल्यः कुञ्चितास्तथा ।
तथाकुञ्चितमध्यश्च स पादः कुञ्चितः स्मृतः ॥ ५३ ॥
जिसमें एड़ी ऊपर उठाई हुई, उंगलियां सिकुड़ी हुई तथा पैर का
आधा भाग ( मध्यभाग ) नमा हुआ रहे तो 'कुंचित' पाद कहलाता
है ॥ ५३ ॥
उदात्तगमने चैव वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
^३अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
शिष्टजन की चाल ( उदात्तगमन ), सीधी ओर घूमने, लौटने और
अतिक्रान्ताचारी के प्रदर्शन में इस कुञ्चित पाद की योजना करनी
चाहिए ॥ ५४ ॥
[ ^५उत्क्षिप्तता तु भवेत् पार्ष्णिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः^६ ।
वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः ॥
^७नृत्ते नूपुरकरणेच प्रयोगस्तस्य की^८र्तितः । ]
[ प्रक्षिप्त—यदि ( दाहिने पैर की ) एड़ी उठी हुई, पंजा अंगूठे के बल
पर टिका हुआ तथा बायां पैर स्वाभाविक दशा में खड़ा रखा जाए तो
'सूची' पाद कहलाता है ।
इस पाद की नृत्त तथा नूपुर धारण में योजना करनी चाहिए । ]


१. भूमावूर्ध्वमग्रतलं तथा—ख० । २. स पादस्त्वञ्चितः स्मृतः—ग० ।
३. अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत्—ख० ।
४. पद्यार्धमेतत्—ख०--पुस्तके नास्ति ।
५. उत्क्षिप्तं तु—ग० । ६. संस्थिता—ग० ।
७ नृत्तेऽन्तःपुरकरणे—ख० । ८. कीर्त्यते—ग० ।