नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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आलीढ-स्थान :-
अस्यैव दक्षिणं पादं पञ्चतालान् प्रसार्य तु ॥ ६७ ॥
ओलीढं स्थानकं कुर्याद् रुद्रश्चैवास्याधिदैवतम् ॥
यदि मण्डल स्थान में दाहिने पैर को (दूसरे पैर से) ऊपर फैलाया जाए
तो 'आलीढ स्थान' हो जाता है। इसके अधिदेवता रुद्र देव हैं। ६७-६८ ॥
अनेन कार्यं स्थानेन वीररौद्रकृतन्तु यत् ॥ ६८ ॥
उत्तरोत्तरसञ्जल्पो रोषामर्षकृतश्च यः ।
मल्लानाञ्चैव सम्फेटः शत्रूणाञ्च निरूपणम् ॥ ६९ ॥
तथाभिद्रवणञ्चैव शस्त्राणाञ्चैव मोक्षणम् ।
योजना—इस स्थान द्वारा वीर तथा रौद्र रस के अभिव्यञ्जक (सभी)
कार्य, क्रोध में अनुष्ठित प्रश्न तथा प्रत्युत्तर की (क्रमशः) वृद्धि, मल्लों के
रोषपूर्ण भाषण (स्फेंट), शत्रुओं का प्रदर्शन करना, शत्रुओं पर हमला तथा
शस्त्रों का प्रहार या फेंकना आदि प्रदर्शित किया जाता है ॥ ६८-७० ॥
प्रत्यालीढ स्थान :-
कुञ्चितं दक्षिणङ्कृत्वा वामपादं प्रसार्य च ॥ ७० ॥
आलीढपरिवर्तस्तु प्रत्यालीढमिति स्मृतम् ।
आलीढ स्थान से विपरीत अर्थात् दाहिने पैर को सिकुड़ाकर उस
(दाहिने) पैर से बाएं पैर का पांच ताल के अन्तर से ऊपर फैलाना
'प्रत्यालीढ स्थान' कहलाता है। (इसके भी अधिदेवता रुद्र हैं) ॥७०-७१॥
आलीढ संहितं शस्त्रं प्रत्यालीढेन मोक्षयेत् ॥ ७१ ॥
नानाशास्त्रविमोक्षो हि कार्योऽनेन प्रयोक्तृभिः ।
योजना—आलीढ स्थान से जिन शस्त्रों का सन्धान किया गया हो
उन्हें प्रत्यालीढ स्थान से चलाना चाहिए। अनेक शस्त्रों का चलाना भी इसी
स्थान के द्वारा अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है ॥ ७१-७२ ॥
न्याय-(लक्षण तथा योजना )—
न्यायाश्चैवात्र विज्ञेयाश्चत्वारः शस्त्रमोक्षणे ॥ ७२ ॥
भारतः सात्वतश्चैव वार्षगण्योऽथ कैशिकः ।
१. आलीढ़स्थानकं—ग० । २. श्चात्राधि—ख-ग० ।
३. सहितं-ग० । ४. श्चैव प्रयोक्तव्या—ख० ।