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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 668 में से

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पृष्ठ 216

एकादशोऽध्यायः १०५
१स्थान— ( भेद तथा लक्षण )—
वैष्णवं समपादञ्च वैशाखं मण्डलन्तथा ।
प्रत्यालीढं तथालीढं स्थानान्येतानि षण्णृणाम् ॥ ५१ ॥
मनुष्यों के खड़े होने में अवस्था विशेष के निदर्शक ये स्थान छः
( होते ) हैं । यथा :—(१) वैष्णव, (२) समपाद, (३) वैशाख, (४) मंडल,
( ५ ) आलीढ़ तथा ( ६ ) प्रत्यालीढ़ ॥ ५१ ॥
वैष्णव-स्थान—
द्वौ तालावर्धतालञ्च पादयोरन्तरं भवेत् ।
तयोस्समुत्थितस्त्वेक१स्त्र्यश्रः पक्षस्थितोऽपरः ॥ ५२ ॥
किञ्चिदञ्चितजंघ२श्च सौष्ठवाङ्गपुरस्सर३म् ।
वैष्णवं स्थानमेतद्धि विष्णुर्४त्राधिदैवतम् ॥ ५३ ॥
यदि दोनों पैर अढ़ाई ताल२ के अन्तर से रखे जाएँ । इन ( पैरों ) में
एक पैर खड़ा ( समुत्थित ) और दूसरा पैर टेढ़ा और बाजू में स्थित रखे
जंघा थोड़ी झुकी हुई (या सिकुड़ी हुई—अंचित) हो (और एडी भी तिरछी
हो ) शरीर के सभी अवयव 'सौष्ठव' युक्त हों तो 'वैष्णवस्थान' कहलाता
है । विष्णु इस स्थान के अधिकारी देवता हैं ॥ ५२-५३ ॥
स्थानेनानेन कर्त्तव्यः संलापस्तु स्वभावजः ।
नानाकार्यान्तरोपे५ तैर्नृभिरुत्तममध्यमैः ॥ ५४ ॥
१. स्थान—नाट्य-शास्त्र में स्थानों के जो लक्षण दिये गए हैं वे अस्पष्ट हैं ।
इनकी सही स्थिति दक्षिण भारत के कलाकारों द्वारा भी अज्ञात होने के कारण
आजकल प्रयोग में नहीं आती । कथकलि में मुद्राओं के प्रदर्शन के अवसर पर
जिन स्थानों का उपयोग होता है वे भी ये ही स्थान होंगे ऐसा श्री कुंजुनायर
का अनुमान है । वे यह भी कहते हैं कि नाट्यशास्त्र से स्थानों का प्रयोग तथा
स्वरूप स्पष्टतः विदित नहीं होता ।
२. ताल = बारह अङ्गुल की दूरी । इस प्रकार २ १/२ ताल का अर्थ है तीस
अङ्गुल के अन्तर से । आगे भी ताल शब्द का दूरी के अर्थ में जहां भी प्रयोग हो
इसी प्रकार समझना चाहिए ।
१. त्र्यस्रपादस्थितो—ख० । २. जङ्घोऽसौ—ग० ।
३. समन्वितः—ग । ४. रेवाधि—ख । ५. न्तरापेतो—ग० ।