नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ नाट्यशास्त्रम्
अचञ्चलमकुब्जञ्च संस्र¹ग्गात्रन्तथैव² च ॥ ९० ॥
नात्युच्चं चलपादञ्च³ सौष्ठवाङ्गं प्रयोजयेत् ।
शरीर को सीधे, न झुके हुए, यथेच्छ, न ऊँचे तने और न अधिक झुके
हुए रखकर अङ्गों का सौष्ठव प्रदर्शित करना चाहिए ॥ ९१ ॥
[ कटी कर्णसमा यत्र कूर्परांसं⁴शिरस्तथा ।
⁵समुन्नतमुरश्चैव सौष्ठवं नाम तद्भवेत् । ]
[ प्रक्षिप्त—जिसमें कटि प्रदेश तथा कान एक समान या सीधे हो, इसी
प्रकार कलाई, कन्धे तथा मस्तक भी रहे, छाती थोड़ी ऊँची तनी रहे तो
'सौष्ठव' समझना चाहिए । ]
अत्र नित्यं प्रयत्नो⁷ हि विधेयो मध्यमोत्तमैः ॥ ९१ ॥
नाट्यं नृत्तञ्च सर्वं हि सौष्ठवे सम्प्रतिष्ठितम् ।
मध्यम तथा उत्तम पात्रों द्वारा सौष्ठव को ( प्रयत्नपूर्वक ) ठीक प्रदर्शित
करने का उद्योग करना चाहिए क्योंकि नाट्य, नृत्त तथा नृत्य 'सौष्ठव' पर
ही आधारित हैं ।
चतुरस्र—
कटीनाभिचरौ⁸ हस्तौ वक्षश्चैव समुन्नतम् ॥ ९२ ॥
वैष्णवं स्थानमित्यङ्गं⁹ चतुरश्रमुदाहृतम् ॥
( यदि ) दोनों हाथ, कटि तथा नाभि घूमने वाले हों, छाती तनी हो
और वैष्णवस्थान हो तो 'अङ्गों' का यह सारा एक साथ होने वाला प्रदर्शन
'चतुरस्र' कहलाता है ॥ ९२-९३ ॥
करण—( के कार्य )
परिमार्जनं¹⁰ दानं सन्धानं मोक्षणन्तथा ॥ ९३ ॥
धनुषस्तु प्रयोक्तव्यं कर¹¹णन्तु चतुर्विधम् ।
१. चासन्नगात्रं—ग० । २. मथापि च । ३. चलपातं – ग० ।
४. कूर्परोंऽसस्थितः--ग० ।
५. सौष्ठवं लक्षणं प्रोक्तवत्तर्मनाक्रमयोजितम्--ग० ।
६. पद्यमिदं ग-पुस्तके नास्ति । ७. प्रपन्नो हि विधेये-ख० ।
८. खरौ--ग० । ९. त्यङ्गचतुरस्र-ख० ।
१०. संमार्जनं--ख० । ११. ग्रहणं क्रिया--ख ग० ।