नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
नवमोऽध्यायः ७९
कटिशीर्षनिवि¹ष्टौ द्वौ त्रिपताकौ यदा करौ ।
पक्षवञ्चितकौ हस्तौ तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९२ ॥
पक्षवंचितक—एक त्रिपताक हस्त कटि प्रदेश पर तथा दूसरा शीर्ष
स्थान (के बराबर—) पर रखना ॥ १९२ ॥
तावेव तु परावृत्तौ पक्षप्रद्योतकौ स्मृतौ ।
अधोमुखतलाविद्धौ ज्ञेयौ गरुडपक्षको ॥ १९३ ॥
पक्षप्रद्योतक—पक्षवंचितक हस्तोँ को उलटे कर देना ।
गरुडपक्ष—पक्षवंचित हस्त को औंधी हथेली करते हुए रखना ॥१९३॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ ।
तथो² प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ ॥ १९४ ॥
दण्डपक्ष :—दोनों हंसपक्ष हस्तोँ को क्रमशः उलटे सीधे घुमाकर
(तथा) बाद में कोहनी से कंधे तक बाहुओं को सीधे फैलाकर रखना ॥१९४॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ ऊर्ध्वदेशविवर्तनात् ।
तावेव पार्श्वविन्यस्तौ पार्श्वमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९५ ॥
ऊर्ध्वमण्डली—दण्डपक्ष हस्त को ऊपर की ओर गोल (चक्कर)
घुमाना ।
पार्श्वमण्डली—एक बाजू में ऊर्ध्वमण्डली हस्तोँ को रखना ॥ १९५ ॥
उद्वेष्टितो भवेदेको द्वितीय³श्चापवेष्टितः ।
भ्र⁴मितावुरसः स्थाने ह्युरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९६ ॥
उरोमण्डली—एक उद्वेष्टित (ऊपर की ओर उठाए हुए) तथा दूसरे
अपवेष्टित (नीचे की ओर झुके हुए) हस्त को वक्षःस्थल के समीप घुमाते
हुए रखना ॥ १९६ ॥
अलपल्लवकारालावुरोऽर्धभ्रमणक्रमात् ।
पार्श्वार्वतश्च विज्ञेयावुरःपार्श्वार्धमण्डलौ ॥ १९७ ॥
उरःपार्श्वमण्डल—अलपल्लव तथा अराल हस्तोँ को आधा घुमाव
देकर एक को बाजू में व दूसरे को ऊपर (वक्षःस्थल के समीप) रखना ॥१९७॥
१. शीर्षनिविष्टाग्रौ—ग० । २. यथा—ग० ।
३. द्वितीयश्च विवेष्टितः—ग० । ४. भ्रामिता—ख ।
५. अरालपल्लवकरावुरो—ख० ।
हस्तौ तु मणिबन्धान्ते कुञ्चितावञ्चितौ यदा ।
खटकाख्यौ कृतौ स्यातां मुष्टिकस्वस्तिकौ तदा ॥ १९८ ॥
मुष्टिकस्वस्तिक—दो खटकामुख हस्तों की कलाई के कोनो पर झुकाते
हुए तथा गोल घुमाव देते हुए उद्वेष्टित करण में रखना ॥ १९८ ॥
पद्मकोशौ यदा हस्तौ व्योवृत्तपरिवर्तितौ ।
नलिनीपद्मकोशौ तु तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९९ ॥
नलिनीपद्मकोश—पद्मकोश हस्तों को औंधे सीधे (घुमाव देना या)
पलटना ॥ १९९ ॥
करावुद्वेष्टिताग्रौ च प्रविधायालपल्लवौ ।
ऊर्ध्वप्रसारिताविद्धौ कर्त्तव्यावुल्बणाविति ॥ २०० ॥
अलपल्लव—दोनों हाथों को ऊपर की ओर घुमाव देते हुए उद्वेष्टित
करण में रखना ।
उल्बण—अलपल्लव हस्तों को ऊपर की ओर फैलाकर (कन्धे के बराबर)
घुमाया जाना ॥ २०० ॥
पल्लवौ च शिरोदेशं⁴ सम्प्राप्तौ ललितौ स्मृतौ ।
कूर्परस्वस्तिकगतौ लताख्यौ वलिताविति ॥ २०१ ॥
ललित—दो पल्लव हस्तों को सिर पर (घुमाव देना) ले जाना ।
वलित—दो लता हस्तों को कलाई पर स्वस्तिक कर देना ॥ २०१ ॥
करणे तु प्रयोक्तव्या नृत्तहस्ता विशेषतः ।
तथार्थाभिनये चैव पताकाद्याः प्रयोक्तृभिः ॥ २०२ ॥
नृत्तहस्तों का विशेष रूप से प्रयोग करणों के निर्माणार्थ करना चाहिए
तथा अर्थाभिनय के प्रदर्शन में भी करना चाहिए जैसा कि पताक आदि
हस्तमुद्राओं का अर्थ प्रदर्शन हेतु प्रयोग किया जाता है ॥ २०२ ॥
सङ्करोऽपि भवेत्तेषां प्रयोगोऽर्थवशात् पुनः ।
प्राधान्येन पुनस्सञ्ज्ञा नाट्ये नृत्ते करेष्विह ॥ २०३ ॥
१. कटकाख्यौ तु तौ—ग० । २. व्यावत्तै—ग०
३. विज्ञेयावुल्वणावपि—ख; विज्ञेयौ उल्बणाविति—ग० ।
४. एतत् पद्यत्रयं ख-पुस्तके नास्ति । ५. शिरोदेशे—ग० ।
६. ललिताविति—ग० ।
नवमोऽध्यायः ८१
वियुतास्संयुताश्चैव नृत्तहस्ताः प्रकीर्तिताः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि करांन् करणसंश्रयान् ॥ २०४ ॥
किन्तु आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग मिश्रित (या आन्तरिक परि-
वर्तन के साथ) भी हो सकता है पर नाट्य तथा नृत्य में इन हस्तों का
इनके कथित नामों (संज्ञाओं) के अनुसार ही प्रयोग होता है। नृत्तहस्त
संयुक्त तथा असंयुत दोनों प्रकार के होते हैं। अब मैं करणों¹ से सम्बद्ध
'हस्तों' (की क्रियाओं) को बतलाता हूँ ॥ २०३-२०४ ॥
हस्तकरणों के चार प्रकार :-
सर्वेषामेव हस्तानां नाट्यहस्तनिदेशिभिः ।
विज्ञातव्यं प्रयत्नेन करणन्तु चतुर्विधम् ॥ २०५ ॥
अथावेष्टितमेकं स्यादुद्वेष्टितमथापरम् ।
व्यावर्तितं तृतीयन्तु चतुर्थं परिवर्तितम् ॥ २०६ ॥
नाट्य तथा हस्ताभिनय के विशेषज्ञों ने हाथों के चार विभाग किये
हैं। इनको ध्यान से जान लेना उचित है। ये चार करण के विभाग
(इस प्रकार) हैं :—(१) आवेष्टित, (२) उद्वेष्टित, (३) व्यावर्तित
तथा (४) परिवर्तित ॥ २०५-२०६ ॥
आवेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्याद्या यथाक्रमम् ।
अभ्यन्तरेण करणं तदावेष्टितमुच्यते ॥ २०७ ॥
आवेष्टित—तर्जनी अंगुली से प्रारम्भ होकर सभी अंगुलियाँ वेष्टित
होती हों और हाथ गोल घुमाव से रहा हो तो इस करण को 'आवेष्टित'
जानो ॥ २०७ ॥
उद्वेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्यैद्या बहिर्मुखम् ।
क्रमशः करणं विप्रास्तदुद्वेष्टितमुच्यते ॥ २०८ ॥
उद्वेष्टित—जब तर्जनी से प्रारंभ होकर सभी उंगलियों द्वारा क्रमशः
हस्त को बाहरी भाग से आवेष्टित किया जाए और फिर हाथ गोल घुमाव
ले तो उसे 'व्यावर्तित' करण जानो ॥ २०८ ॥
१. ये 'करण' चतुर्थाध्याय के ताण्डव में प्रयुक्त करणों से भिन्न है।
१. करणं हस्तसंश्रयम्—ग० । २. नाट्यहस्ते निदेशिभिः—ख० ।
३. विज्ञातव्या—ख० । ४. तर्जन्या बहिर्मुखाः—ग० ।
६ ना० शा० द्वि०
८२ नाट्यशास्त्रम्
आवर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या अङ्गुल्योऽभ्यन्तरेण तु ।
यथाक्रमेण करणं तद् व्यावर्त्तितमुच्यते ।। २०९ ।।
व्यावर्तित—यदि कनिष्ठिका उंगली से प्रारंभ हो कर सभी उंगलियों
को क्रमशः भीतरी भाग से आवेष्टित किया जाए और हाथ गोल घुमाव ले
तो उसे 'व्यावर्तित' करण जानो ।। २०६ ।।
उद्वर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या बाह्यतः क्रमशो यदा ।
अङ्गुल्यः करणं विप्रास्तदुक्तं परिवर्तितम् ।। २१० ।।
परिवर्तित—जब कनिष्ठिका उंगली से प्रारम्भ होकर सभी उंगलियां
क्रमशः हस्त को बाहरी भाग से आवेष्टित करें और हस्त गोल घुमाव ले
तो यह 'परिवर्तित' कहलाता है ।। २१० ।।
नृत्तेऽभिनययोगे च पाणिभिर्वर्तनाश्रयैः ।
मुख-भ्रू-नेत्रयुक्तानि करणानि प्रयोजयेत् ।। २११ ।।
जब नृत्त तथा नाट्य अभिनय की दशा में इन हस्तों को उनकी विभिन्न
क्रियाओं में प्रदर्शित किया जाए तो उन्हें मुख, भौंहें तथा नेत्र के अनुसार
करणों के द्वारा अनुसृत करते हुए रखा जाए ।। २११ ।।
तिर्यक् तथोर्ध्वसंस्थो ह्यधोमुखश्चाञ्चितोऽपविद्धस्तु ।
मण्डलगतिस्तथा स्वस्तिकश्च पृष्ठानुसारी च ।। २१२ ।।
उद्वेष्टितःप्रसारित इत्येते वै स्मृताः प्रकारास्तु ।
बाह्वोरिति करणगता विज्ञेया नर्तकैर्नित्यम् ।। २१३ ।।
नर्तकों को करणों में स्थित बाहुओं के इन (दस) प्रकारों का सदैव
ज्ञान रखना चाहिए। ये हैं (१) तिर्यक, (२) ऊर्ध्वसंस्थ, (३) अधोमुख,
(४) अञ्चित, (५) अपविद्ध, (६) मंडलगति, (७) स्वस्तिक, (८)
पृष्ठानुसारी, (९) उद्वेष्टित तथा (१०) प्रसारित ।। २१२-२१३ ।।
१. आवर्तन्ते—ग० । २. यत्तु क्रमेण—ग० । ३. उद्वर्तन्ते—ग० ।
४. ग—पुस्तकेतु तिर्यगूर्ध्वगतञ्चैव तथाधोमुख एव च ।
आविद्धश्चापविद्धश्च मण्डलस्वस्तिकस्तथा ।।
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव पृष्ठगश्चेतिचोदितः ।
बाहुप्रकारो दशधा नाट्यनृत्तप्रयोक्तृभिः ।। इत्यधिकम् ।
५. विज्ञेया निवर्तकैः—ख० ।
नवमोऽध्यायः ८३
हस्तानां करणविधिर्मया समासेन निगदितो विप्राः
अत ऊर्ध्वं व्याख्यास्ये हृदयोदरपार्श्वकर्माणि ॥ २१४ ॥
हे मुनिजन, इस प्रकार संक्षेप में मैंने करणों की हस्ताभिनय द्वारा
होने वाली विधि बतलाई । अब मैं हृदय, ( वक्षस्थल ) उदर तथा बाजुओं
के अभिनय कार्यों को बतलाता हूँ ॥ २१४ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे हस्ताभिनयो नाम नवमोऽध्यायः ॥
॥ भरतनाट्यशास्त्र का 'हस्ताभिनय' नामक नवम अध्याय समाप्त ॥
१. क० ख—पुस्तकयोर्नात्राध्यायसमाप्तिः ।
दशमोऽध्यायः
वक्षःस्थल—भेद, लक्षण तथा योजना
आभुग्नमथ निर्भुग्नं तथा चैव प्रकम्पितम् ।
उद्वाहितं समञ्चैव ह्युरैः पञ्चविधं स्मृतम् ॥ १ ॥
वक्षःस्थल के पांच प्रकार हैं । यथा—( १ ) आभुग्न, ( २ ) निर्भुग्न,
( ३ ) प्रकम्पित, ( ४ ) उद्वाहित तथा ( ५ ) सम ॥ १ ॥
निम्नमुन्नतपृष्ठञ्च व्याभुग्नांसं श्लथं कचित् ।
आभुग्नं तदुरो ज्ञेयं कर्म चास्य निबोधत ॥ २ ॥
सम्भ्रमविषादमूर्च्छाशोकभयव्याधिहृदयशल्येषु ।
कार्य शीतस्पर्शे वर्षे लज्जाऽन्वितेऽर्थवशात् ॥ ३ ॥
आभुग्न—यदि स्कन्ध झुके हुए, पीठ उठी हुई तथा वक्षःस्थल और
दोनों कन्धे नीचे झुके हों तो 'आभुग्न' वक्षस्थल कहलाता है। इसकी
योजना सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, शोक, भय, व्याधि, हृदयशल्य, शीतस्पर्श,
वर्षा तथा लज्जा में (आवश्यकतानुसार) की जाती है ॥ २-३ ॥
स्तब्धञ्च निम्नपृष्ठञ्च निर्भुग्नांसैसमुन्नतम् ।
उरो निर्भुग्नमेतद्धि कर्म चास्य निबोधत ॥ ४ ॥
स्तम्भे मानग्रहणे विस्मयदृष्टे च सत्यवचने च ।
अहमिति च दर्पवचने गर्वोत्सेके च कर्त्तव्यम् ॥ ५ ॥
निर्भुग्नः—यदि वक्षःस्थल दृढ़, पीठ झुकी हुई तथा कन्धे (न झुक कर)
उठे हुए हों तो उसे 'निर्भुग्न' वक्षःस्थल जानो ।
इसकी योजना स्तम्भ, मान, विस्मयपूर्वक अवलोकन, सत्यवचन,
'अहम्' (गर्वयुक्त) वचन तथा गर्वातिशय (उत्सेक) में करनी चाहिए ॥४-५॥
[ दीर्घनिःश्वसिते चैव जृम्भणे मोटने तथा ।
बिब्बोके च पुनः स्त्रीणां तद्विज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ]
१. उरः—ग० २ व्याभुग्नं संश्लथं—ख-ग ।
३. शिल्पेषु—ख० । ४. लज्जायिते—ग० ।
५. निर्भुग्नांसं समुन्नतम्—ग० । ६. गर्वोत्साहे तु—ग० ।
दशमोऽध्यायः ८५
(प्रक्षिप्त—दीर्घनिश्वास, जृम्भा, अंगों के मरोड़ने तथा स्त्रियों के
विव्वोक की दशा में भी प्रयोक्ताजन इसकी योजना करें ।)
ऊर्ध्वक्षेपैरुरो यन्नै¹ निरन्तरकृतैः कृतम् ।
प्रकम्पितञ्च तज्ज्ञेयमुरो नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ६ ॥
प्रकम्पित—यदि वक्षःस्थल निरन्तर फुलाया तथा सिकुड़ाया जाए
तो 'प्रकम्पित' वक्षःस्थल कहलाता है ॥ ६ ॥
हसितरुदितेषु कार्यं श्रमे भये श्वासकासयोश्चैव ।
हिक्के दुःखे च तथा नाट्यज्ञैरर्थयोगेन ॥ ७ ॥
इसकी योजना हास्य, रुदन, श्रम, भय, श्वास, कास, हिक्का तथा
दुःख की दशा में स्थिति के अनुसार करनी चाहिये ॥ ७ ॥
उद्वाहितं तूर्ध्व³कृतमुरो ज्ञेयं प्रयो⁴क्तृभिः ।
⁵दीर्घोच्छ्वासोन्नतालोके जृम्भणादिषु चेष्यते ॥ ८ ॥
उद्वाहित—यदि वक्षःस्थल को उठा हुआ रखे तो 'उद्वहित' वक्षःस्थल
होता है। इसे दीर्घ उच्छ्वास, ऊँची वस्तु का अवलोकन तथा जंभाई लेने
की अवस्था में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ ८ ॥
सर्वैरेवाङ्गविन्यासैश्चतुरश्रकृतैः कृतम् ।
उरः समन्तु विज्ञेयं स्वस्थं सौष्ठवसंयुतम् ॥ ९ ॥
सम—सभी अवयव चतुरस्र हों (समान रहे) तथा सौष्ठव युक्त हों
तो (वह) वक्षःस्थल 'सम' (स्वाभाविक) कहलाता है। इसे स्वाभाविक
दशा के अभिनय में प्रयुक्त करें ॥ ९ ॥
पार्श्व—भेद लक्षण तथा योजना—
एतदुक्तं मया सम्यगुरसस्तु विकल्पनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि पार्श्वयोरिह लक्षणम् ॥ १० ॥
इस प्रकार मैंने वक्षःस्थल के विभेद बतलाए । अब मैं 'पार्श्व' (कोख)
के लक्षण बतलाता हूँ ।
१. यत्तु—ग० ।
२. हसितरुदितादिसम्भ्रमश्रमव्याधिपीडितार्थेषु । नानाभावोपगतं कार्यमुरो
नाट्ययोगेषु ॥—ग० ।
३. मूर्ध्वंगत—ग० । ४. प्रयोगतः—ग० ।
५. दीर्घोच्छ्वसनता—ग। ६. सर्वैः ससौष्ठवैरङ्गैः—ग० ।
८६ नाट्यशास्त्रम्
नतं समुन्नतञ्चैव प्रसारितविवर्तिते ।
तथोपसृतमेवन्तु पार्श्वयोः कर्म पञ्चधा ॥ ११ ॥
पार्श्व के पांच प्रकार हैं। यथा--(१) नत, (२) समुन्नत, (३)
प्रसारित, (४) विवर्तित तथा (५) अपसृत ॥ ११ ॥
कटी भवेत्तु व्याभुग्ना पार्श्वमाभुग्नमेव च ।
तथैवापसृतांसञ्च किञ्चित्पार्श्वं नतं स्मृतम् ॥ १२ ॥
नत—यदि कटी तथा उसी ओर की पार्श्व (बाजू) थोड़ी झुकी हुई
और कन्धा नमता हुआ रखा जाए तो 'नत' पार्श्व जानो ॥ १२ ॥
नतस्यैवापरं पार्श्वं विपरीतन्तु युक्तितः ।
कटिपार्श्वभुजांसैश्चाभ्युन्नतैरुन्नतं भवेत् ॥ १३ ॥
समुन्नत—यदि, दूसरी बाजू (जो कि नत पार्श्व की हो) उठी हुई
रहे तथा कटि, पार्श्व, भुजा और कन्धा भी (जिसके कारण) उठा हुआ
हो तो 'समुन्नत' पार्श्व जानो ॥ १३ ॥
आयामानादुभयतः पार्श्वयोः स्यात् प्रसारितम् ।
परिवर्तत् त्रिकस्यापि विवर्तितमिहेष्यते ॥ १४ ॥
प्रसारित—यदि कोख की दोनों बाजुओं को उनकी अपनी दिशा में
फैलाया जाए तो 'प्रसारित' पार्श्व होता है ।
विवर्तित—यदि त्रिक (पीठ) को एक घुमाव दिया जाए तो 'विवर्तित'
पार्श्व होता है ॥ १४ ॥
विवर्तनापनयनाद् भवेदपसृतं पुनः ।
पार्श्वलक्षणमित्युक्तं विनियोगं निबोधत ॥ १५ ॥
अपसृत—यदि विवर्तित (पार्श्व) की स्थिति से पार्श्व-भाग पुनः
अपनी मूल-स्थिति में आ जाए तो उसे 'अपसृत' पार्श्व जानो। (इस प्रकार)
मैंने पार्श्वलक्षण बतलाए अब इनकी योजना सुनिये ॥ १५ ॥
उपसर्पे नतं कार्यमुन्नतं चापसर्पणे ।
प्रसारितं प्रहर्षादौ परिवृत्ते विवर्तितम् ॥ १६ ॥
१. तथा प्रसृतमेतत्—ग० । २. कटिर्भवेत्तु—ग० ।
३. तस्यैव चापरं—ख०, ग० । ४. श्चाप्युन्नतः—ख० ।
५. परिवर्तित्रिकस्यापि—ख-ग० ।
६. विवर्तितोपनयनात्—ख०, विवर्तितापनयनात्—ग० ।
७. परिवर्त्तौ—ग० ।
दशमोऽध्यायः ८७
विनिवृत्ते त्वपसृतं पार्श्वमर्थवशाद् भवेत् ।
एतानि पार्श्वकर्माणि जठरस्य निबोधत ॥ १७ ॥
किसी व्यक्ति के पास आने में 'नत' की, पीछे खिसकने में 'समुन्नत'
की, अतिहर्ष में 'प्रसारित' की, पीछे घूमने में 'विवर्तित' की तथा लौटने
(विनिवृत्त-पीछे घूमने) में 'अपसृत' की योजना करनी चाहिए। इस
प्रकार पार्श्व (कोख) के ये भेद तथा कार्य बतलाए हैं। अब मैं उदर के
लक्षण बतलाता हूँ ॥ १६-१७ ॥
उदर-- (भेद, लक्षण तथा योजना)
क्षामं खल्वञ्च पूर्णञ्च सम्प्रोक्तमुदरं त्रिधा ।
तनु क्षामं नतं खल्वं पूर्णमाध्मातमुच्यते ॥ १८ ॥
उदर के तीन प्रकार हैं। (१) क्षाम, (२) खल्व तथा (३) पूर्ण।
इनमें दुबला या खिंचा हुआ उदर 'क्षाम', झुका हुआ 'खल्व' तथा भरा
हुआ 'पूर्ण' कहलाता है ॥ १८ ॥
क्षामं हास्ये¹ऽथ रुदिते निःश्वासे जृम्भणे भवेत् ।
व्याधिते तपसि² श्रान्ते क्षुधार्ते खल्वमिष्यते ॥ १९ ॥
³पूर्णमुच्छ्वसिते स्थूले व्याधितात्यशनादिषु ।
योजना--हास्य, रुदन, निश्वास तथा जंभाई लेने में 'क्षाम' की,
बीमारी, तपस्या, थकावट तथा भूख में 'खल्व' की तथा उच्छ्वास, स्थूलता,
व्याधि तथा अतिशय भोजन करने में 'पूर्ण' उदर की योजना करना
चाहिए ।
[ ⁴क्षामं खल्लं समं पूर्णमुदरं स्याच्चतुर्विधम् । ]
(प्रक्षिप्त—क्षाम, खल्व, सम तथा पूर्ण भेद से उदर के चार प्रकार हैं)
इत्येतदु⁵दरस्योक्तं कर्म⁶ कट्या निबोधत ॥ २० ॥
इस प्रकार मैंने उदर के कार्य बतलाए। अब मैं कटि के कार्य बतलाता
हूँ ॥ १९-२० ॥
१. हासे च—ग० । २. तपसा—क० ।
३. पूर्णमुच्चलितं स्थूले व्याधितन्द्राशनादिषु—ख—ग० ।
४. एतत्पद्यार्धं ग—पुस्तके नास्ति । ५. इत्येतदुदरं प्रोक्तं—ग० ।
६. कटचाः कर्म—ग० ।
५८ नाट्यशास्त्रम्
कटि—(भेद, लक्षण तथा योजना)
छिन्ना चैव निवृत्ता च रेचिता कम्पिता तथा ।
उद्वाहिता चेति कटी नाट्ये¹ नृत्ते च पञ्चधा ॥ २१ ॥
नाट्य तथा नृत्त में उपयोगी 'कटि' के पांच प्रकार हैं :—(१) छिन्ना,
(२) निवृत्ता, (३) रेचिता, (४) कम्पिता तथा (५) उद्वाहिता ।
कटी मध्यस्य वलनाच्छिन्ना सम्परिकीर्तिता ।
पराङ्मुखस्याभिमुखी निवृत्ता स्यान्निवर्तिता ॥ २२ ॥
सर्वतो भ्रमणाच्चापि विज्ञेया रेचिता कटी ।
तिर्यग्गतागता क्षिप्रं कटी ज्ञेया प्रकम्पिता ॥ २३ ॥
नितम्बपार्श्वोद्वहनाच्छनैरुद्वाहिता कटी ।
बीच से (मध्य-भाग में) लचकती हुई रहनेवाली कटि 'छिन्ना'
कहलाती है, सामने की ओर घुमाव देकर फिर सामने की ओर उठाकर
रखने या लौटाने पर 'निवृत्ता', चारों ओर घुमाव देने पर 'रेचिता',
द्रुतगति से आड़ी तिरछी आने जाने वाली 'कम्पिता' तथा बगल और
नितम्ब भाग से ऊपर की ओर धीरे-धीरे उठाने पर 'उद्वाहिता' कटि
कहलाती है ॥ २२-२४ ॥
⁴कटिकर्म मया प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ॥ २४ ॥
छिन्ना व्यायामसंभ्रान्तव्यावृत्त प्रेक्षणादिषु ।
निवृत्ता वर्तने चैव रेचिता ⁵भ्रमणादिषु ॥ २५ ॥
कुब्ज-वामन-नीचानां गतौ कार्या प्रकम्पिता ।
स्थूलेषूद्वाहिता योज्या स्त्रीणां लीलागतेषु च ॥ २६ ॥
इस प्रकार मैंने कटि (कर्म) के लक्षण बतलाए अब मैं इनकी योजना
बतलाता हूँ।
'छिन्ना' की व्यायाम, भ्रान्ति तथा पीछे घूम कर देखने में, गोल,
घूमने में 'निवृत्ता' की, भ्रमण आदि सामान्य क्रियाओं में 'रेचिता' की,
कूबड़े (कुब्ज), बौने तथा नीच प्रकृति के पुरुषों की चाल में 'प्रकम्पिता'
की तथा स्थूल पुरुष और स्त्रियों की लीला-पूर्ण (ललित) गति में
'उद्वाहिता' कटि की योजना करनी चाहिए ॥ २४-२६ ॥
१. नाट्यनृत्ते—ग० । २. तिर्यंगता गताक्षिप्ता—ख-ग० ।
३. नितम्बोद्वहनाच्चैव क्रमेणोद्वाहिता स्मृता—क०।
४. पुनश्चासां प्रवक्ष्यामि विनियोग-प्रयोजनम्—क-ख०।
५. भ्रमणेषु च—ग०।
दशमोऽध्यायः ८९
ऊरू—( भेद एवं लक्षण )
कम्पनं वलनञ्चैव स्तम्भनोद्वर्तने तथा ।
विवर्तनञ्च पञ्चैतान्यूरु-कर्माणि योजयेत् ॥ २७ ॥
ऊरू (पिंडलियां) की पांच अवस्थाएं होती हैं। (१) कम्पन, (२)
चलन, (३) स्तम्भन, (४) उद्वर्तन तथा, (५) विवर्तन ॥ २७ ॥
नमनोन्नमनात् पाष्णेर्मुहुः स्यादूरुकम्पनम् ।
गच्छेद्भ्यन्तरं जानु यत्तु तद्वलितं स्मृतम् ।
स्तम्भनञ्चात्र विज्ञेयमपविद्धक्रियात्मकम् ॥ २८ ॥
वलिता विद्धकरणादुद्वर्तनमितीरितम् ।
पार्ष्णिरभ्यन्तरं गच्छेद्यत्र तत्तु निवर्तनम् ॥ २९ ॥
बार-बार पैर की एड़ी के अग्रभाग (पाष्णि) को ऊपर तथा नीचे धुजाना
(या लेजाना) 'कम्पन' कहलाता है। पैर घुटने के अन्दर के भाग में रहें
और पिंडलियां गति शील हो तो 'वलित'; स्थिर गति रखना 'स्तम्भन',
घुटनों को सिकुड़ाना तथा हिलाना 'उद्वर्तन' तथा पैर की एड़ी को अन्दर
की ओर सिकुड़ाना 'विवर्तन' कहलाता है ॥ २८-२९ ॥
गतिष्वधमपात्राणां भये चापि हि कम्पनम् ।
वलनञ्चैव कर्त्तव्यं स्त्रीणां स्वैरपरिक्रमे ॥ ३० ॥
साध्वसे च विषादे च स्तम्भनं सम्प्रयोजयेत् ।
व्यायामे ताण्डवे चैव कार्यमुद्वर्तनं बुधैः ॥ ३१ ॥
निवर्तनञ्च कर्तव्यं सम्भ्रमादि परिक्रमे ।
योजना—अधमपात्रों की चाल (गति) तथा भय की दशा में 'कम्पन'
की, स्त्री की यथेच्छ गति में 'वलन' की, भय और विषाद की अवस्था में
'स्तम्भन' की, व्यायाम तथा ताण्डवनृत्य में 'उद्वर्तन' की तथा भ्रान्त और
घूमने की दशा में 'निवर्तन' की योजना करनी चाहिए ॥ ३०-३२ ॥
१. निवर्तनञ्च—ग०। २. कारयेत्—ख०-ग०।
३. दम्यन्तराज्जानु यत्र—ग०।
४. स्तम्भनं चापि विज्ञेयमपवृत्तक्रियात्मकम्—ख०, ग०।
५. द्वयोरुद्वर्तनं स्मृतम्—ख-ग०। ६. तत्र—ख-ग०।
७ स्तम्भनन्तु प्रयोजयेत्—ग०। ८. परिभ्रमे—ख-ग०।
९० नाट्यशास्त्रम्
यथा दर्शनमन्यच्च लोकाद् ग्राह्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ३२ ॥
इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं जङ्घयोस्तु निबोधत ।
इसके अतिरिक्त ऊरू की अन्य क्रिया तथा अवस्थाएं प्रयोक्ता जन कार्य
के अनुसार लौकिक स्थिति से ग्रहण करें। इस प्रकार 'ऊरू' का वर्णन
किया गया। अब 'जंघाओं' का कार्य कहता हूँ, उन्हें भी जानिये ॥३२-३३॥
जंघा — (भेद एवं लक्षण)
आवर्तितं नतं क्षिप्तमुद्वाहितमथापि वा ॥ ३३ ॥
परिवृत्तं तथा चैव जङ्घा कर्माणि पञ्चधा ।
वामो दक्षिणपार्श्वेन दक्षिणाच्चापि वामतः ॥ ३४ ॥
पादो यत्र व्रजेद्विप्रास्तदावर्तितमुच्यते ।
जानुनः कुञ्चनाच्चैव नतं ज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ॥ ३५ ॥
विक्षेपाच्चापि जङ्घायाः क्षिप्तमित्यभिधीयते ।
उद्वाहितञ्च विज्ञेयमूर्ध्वमुद्वाहनादिह ॥ ३६ ॥
प्रतीपनयनं यत्तु परिवृत्तं तदुच्यते ।
जंघा के पांच भेद होते हैं :— (१) आवर्तित, (२) नत, (३)
क्षिप्त, (४) उद्वाहित तथा, (५) परिवृत्त ।
यदि बायां पैर सीधी ओर तथा सीधा पैर बायीं ओर घूमे तो
'आवर्तित', जंघा को सिकुड़ाने (कुंचनात्-झुकाने) पर 'नत', जंघा को
झटके से आगे फेंकने पर 'क्षिप्त', जंघा को ऊपर (की ओर) उठाने को
'उद्वाहित' तथा पीछे की ओर मोड़ने (या 'उद्वाहित' के विपरीत बढ़ाने)
को 'परिवृत्त' जानो ॥ ३३-३७ ॥
आवर्तितं प्रयोक्तव्यं विदूषकपरिक्रमे ॥ ३७ ॥
नतञ्चापि हि कर्तव्यं स्थानासनगतादिषु ।
क्षिप्तं व्यायामयोगेषु ताण्डवे च प्रयुज्यते ॥ ३८ ॥
१. जंघायास्तु—ग० ।
२. जंघास्वस्तिकयोगेन क्रमादावर्तितं भवेत् — इति क-पुस्तके प्रक्षिप्तम-
धिकञ्च ।
३. जानुनः कुञ्चनं वापि—ग० ।
४. नतं स्याज्जानुनमनाद् क्षिप्तं विक्षेपणाद्वहिः—क-ख० ।
५. यत्तत्—ग० । ६. सम्भ्रमातिपरिक्रमे—ख-ग
दशमोऽध्यायः ९५
तथा चोद्वाहितं १कार्यमाविद्धगमनादिषु ।
ताण्डवादौ प्रयोक्तव्यं परिवृत्तं प्रयोक्तृभिः ॥ ३९ ॥
योजना—विदूषक की गति में 'आवर्तित' की, स्थिति ( खड़े होने )
तथा आसन ग्रहण करने में 'नत' की, व्यायाम तथा ताण्डवनृत्य में 'क्षिप्त'
की आविद्ध ( वक्र ) गति आदि में 'उद्वाहित' की तथा ताण्डव आदि
के प्रस्तुतीकरण में 'परिवृत्त' जंघा की योजना करनी चाहिए ॥ ३७-३९ ॥
पादकर्म—( लक्षण तथा योजना )
२इत्येवं जङ्घयोः कर्म पादयोस्तु निबोधत ।
३उद्घट्टितः समश्चैव तथाग्रतलसञ्चरः ॥ ४० ॥
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव४ पादः पञ्चविधः स्मृतः ।
मैंने ये जंघा के कार्य बतलाए । अब आप पैरों के कार्य सुनिये ।
पादकर्म के पांच भेद हैं । ( १ ) उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( ३ )
अग्रतलसंचर, ( ४ ) अंचित तथा ( ५ ) कुंचित ।
स्थित्वा पादतलाम्रेण पाष्णिर्भूभौ निपात्यते ॥ ४१ ॥
यस्य पादस्य करणे भवेदुद्घट्टितस्तु सः ।
५अयमुद्घट्टितकरणेष्वनुकरणार्थं प्रयोगमासाद्य ॥ ४२ ॥
६द्रुतमध्यमप्रचारः सकृदसकृद्वा प्रयोक्तव्यः ।
पैरों से पंजे के बल खड़े होकर एड़ी से भूमि का स्पर्श करने पर
'उद्घट्टित पाद' होता है । इसको अनुसरण करने तथा एक या अनेक
बार होने वाली द्रुत और मध्यम गति में संयोजित किया जाता है ॥४१-४२॥
स्वभाव७रचितो भूमौ८समस्थानश्च यो भवेत् ॥ ४३ ॥
९समपादः स विज्ञेयः स्वभावाभिनयाश्रयः ।
स्थिरः स्वभावाभिनये नानाकरणसंश्रये ॥ ४४ ॥
१०चलितश्च पुनः कार्यो विधि११ज्ञैः पादरेचिते ।
१२समस्यैव यदा पाष्णिः पादस्याभ्यन्तरे भवेत् ॥ ४५ ॥
१. कुर्यादाविद्ध—ग० । २. इत्येतज्जङ्घयोः—ग० ।
३. उद्धट्टितं समञ्चैव—ख—ग० ।
४. कुञ्चितः सूचीपादः षोढा प्रकीर्तितः—ख० । ५. अयमुद्वेष्टित—क० ।
६. हृतमध्यम—ख—ग० । ७. स्वभावरचिते—ग० । ८. समस्थाने—ग० ।
९. समः पादः—ख-ग० । १०. चलिताक्ष—ग० ।
११. विक्षेपः—ख० ग० । १२. एतत् श्लोकद्वयं—ख-ग-पुस्तके नास्ति ।
९२ नाट्यशास्त्रम्
बहिः पार्श्वस्थितोऽङ्गुष्ठस्त्र्यश्रपादस्तु स स्मृतः ।
कृत्वा समपदं स्थानम् अश्वक्रान्तं तथैव च ॥ ४६ ॥
स्याद्विक्कवादिश्वर्थेषु त्र्यश्रः पादो यथाविधि ।
स्वाभाविक रूप से समतल भूमि पर स्थापित पैर को 'समपाद' कहते
हैं । इसका स्वभाविक अभिनय में उपयोग होता है ।
विभिन्न करणों से युक्त स्वाभाविक स्थिति को प्रदर्शित करने में स्थिर
'समपाद' रखना चाहिए तथा 'रेचक' अवस्था के प्रदर्शित करने में (इसे)
चलित दशा में रखते हैं ।
समपाद में ही पैर का पंजा ( पाणि ) दूसरे पैर के अन्दर चला जाए
और अंगूठा एक बाजू बाहर टिका रहे तो 'त्र्यश्रपाद' जानो ।
समपादस्थान तथा अश्वक्रान्तस्थान के प्रदर्शन करने के उपरान्त
विक्लवादि भावों की अभिव्यक्ति के लिये 'त्र्यश्रपाद' का विधिवत् प्रयोग
किया जाता है ॥ ४३-४७ ॥
[ अस्यैव समपादस्य पाणि॑रभ्यन्तरे भवेत् ।
त्र्यश्रपादः स विज्ञेयः स्थानकादिषु संश्रयः ॥ ]
(प्रक्षिप्त—यदि इसी 'समपाद' में पंजा अन्दर रख ले तो त्र्यश्रपाद
होता है । इसका स्थानग्रहण करने आदि में प्रयोग किया जाए ।)
उत्क्षिप्तता तु भवेत् पाणिः प्रसृतोऽङ्गुष्ठकस्तथा ॥ ४८ ॥
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः पादे ३ ऽग्रतलसञ्चरे ॥ ४९ ॥
यदि एड़ी उठी हुई, अंगूठा आगे की ओर फैला हुआ और उंगलियां
झुकी हुई हो तो 'अग्रतल-संचर' नामक पाद होता है ॥ ४८-४९ )
तोदँननिकुट्टने स्थितनिशुम्भने भूमिताडने भ्रमणे ।
विक्षेप विविधरेचकपाष्णिकृ॑तागमनमेतेन ॥ ५० ॥
प्रेरणा, कूटना (तोड़ना), स्थित होना (स्थानक दशा में) (ठोकर
से) पीटना, पृथ्वी की ताड़ना करना, भ्रमण, (किसी वस्तु का) फेंकना,
विभिन्न रेचक गतियों की दशा में तथा एड़ी के बल आने में 'अग्रतलसंचर'
पाद की योजना की जाएं ।
१. अयं श्लोकः क-पुस्तके प्रक्षिप्तः । २. पाष्णिरञ्चितो—ग० ।
३. पादोऽग्रतलसञ्चरः—ख-ग० ।
४. नोदन-निकुट्ठिते स्थितनिसुंभिते भूमिताडनभ्रमणे—ग० ।
५ पाष्णिक्षताग्रगमन—ख-ग० ।
दशमोऽध्यायः ९३
पार्ष्णिर्यस्य स्थिता भूमौ^१ पादमग्रतलन्तथा ।
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः स पादोऽञ्चित उच्यते ॥ ५१ ॥
एड़ी भूमि पर टिकी हो, पंजा ऊपर उठा हुवा तथा उंगलियां सिकुड़ी
हुई ( झुकी हुई ) रहे तो 'अंचित' पाद कहलाता है ।
पादाग्रस्थितसञ्चारे वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
^२एष पादाहते कार्यो नाना भ्रमरकेषु च ॥ ५२ ॥
पंजों के बल खड़े होकर चलने, किसी ओर घूमने और लौटने
( वर्तितोद्वर्तिते ), पैर से पीटने तथा अमरी-चारी के प्रदर्शन में इस
अञ्चित पाद की योजना करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
उत्क्षिप्तता यस्य पार्ष्णिः स्यादङ्गुल्यः कुञ्चितास्तथा ।
तथाकुञ्चितमध्यश्च स पादः कुञ्चितः स्मृतः ॥ ५३ ॥
जिसमें एड़ी ऊपर उठाई हुई, उंगलियां सिकुड़ी हुई तथा पैर का
आधा भाग ( मध्यभाग ) नमा हुआ रहे तो 'कुंचित' पाद कहलाता
है ॥ ५३ ॥
उदात्तगमने चैव वर्तितोद्वर्तिते तथा ।
^३अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत् ॥ ५४ ॥
शिष्टजन की चाल ( उदात्तगमन ), सीधी ओर घूमने, लौटने और
अतिक्रान्ताचारी के प्रदर्शन में इस कुञ्चित पाद की योजना करनी
चाहिए ॥ ५४ ॥
[ ^५उत्क्षिप्तता तु भवेत् पार्ष्णिरङ्गुष्ठाग्रेण संस्थितः^६ ।
वामश्चैव स्वभावस्थः सूचीपादः प्रकीर्तितः ॥
^७नृत्ते नूपुरकरणेच प्रयोगस्तस्य की^८र्तितः । ]
[ प्रक्षिप्त—यदि ( दाहिने पैर की ) एड़ी उठी हुई, पंजा अंगूठे के बल
पर टिका हुआ तथा बायां पैर स्वाभाविक दशा में खड़ा रखा जाए तो
'सूची' पाद कहलाता है ।
इस पाद की नृत्त तथा नूपुर धारण में योजना करनी चाहिए । ]
१. भूमावूर्ध्वमग्रतलं तथा—ख० । २. स पादस्त्वञ्चितः स्मृतः—ग० ।
३. अतिक्रान्तक्रमे चैव पादमेतं प्रयोजयेत्—ख० ।
४. पद्यार्धमेतत्—ख०--पुस्तके नास्ति ।
५. उत्क्षिप्तं तु—ग० । ६. संस्थिता—ग० ।
७ नृत्तेऽन्तःपुरकरणे—ख० । ८. कीर्त्यते—ग० ।
९४ नाट्यशास्त्रम्
पादजङ्घोरुकरणं समं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।
पादस्य करणं¹ सर्वं जङ्घोरुकृतमिष्यते ॥ ५५ ॥
नाट्यप्रयोक्ता पाद, जंघा तथा ऊरू की गतियों को एक साथ ही
प्रयुक्त करें क्योंकि पैरों की गति के प्रदर्शन करने में जंघा तथा ऊरू की
गतियां भी सम्मिलित रहती ही हैं ॥ ५५ ॥
यथा पादः प्रवर्तेत तथैवोरुः प्रवर्त्तते ।
तयोः² समानकरणात् पादचारीं प्रयोजयेत् ॥ ५६ ॥
क्योंकि पैर जिधर घूमता है पिंडली भी उसी ओर जाएगी, (तथा जंघा
भी) इसी कारण इन (दोनों) की (समान) गति से 'पादचारी' बनती है ॥
इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं लक्षणं कर्म चैव हि ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि चारीव्यायामलक्षणम् ॥ ५७ ॥
यह मैंने विभिन्न अङ्गों का अभिनय बतलाया । अब मैं (विभिन्न)
चारियों के भेद एवं लक्षण (अगले अध्याय में) बतलाऊंगा ॥ ५७ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे शारीरा³भिनयो नाम दशमोऽध्यायः ।
॥ भरतनाट्य शास्त्र का शारीराभिनय नामक दसवां अध्याय समाप्त ॥
१. करणं ग०—। २. अनयोः—ग० ।
३. अङ्गिकाभिनयो नाम नवमोऽध्यायः—क०; ख० ।
एकादशोऽध्यायः
चारी विधान
१चारी—
एवं पादस्य जङ्घाया ऊरोः¹ कट्यास्तथैव च ।
समान²करणे चेष्टा चारीति परिकीर्तिता ॥ १ ॥
( हाथ ) पैर, जंघा, ऊरू तथा कटि ( आदि ) अङ्गों की एक साथ
( निर्दिष्ट पद्धति से ) चलनात्मक चेष्टा 'चारी' कहलाती है ॥ १ ॥
विधा³नोपगताश्चार्यो व्यायच्छे४न्ते परस्परम् ।
यस्मादङ्गसमायुक्तास्तस्माद् व्यायाम उच्यते ॥ २ ॥
टिप्पणी—१ 'चारी' शब्द का आशय वर्तमान 'चाल' शब्द से है तथा
उसे ही 'चारी' शब्द से यहां निर्दिष्ट किया गया है यही सामान्यतः कहा जा
सकता है । कथकलि में 'सारी' तथा मणिपुरी नृत्य में होने वाली 'चाली' इसी
शब्द का अपभ्रंश या वर्तमान प्रचलित नाम है जिसे अंग्रेजी में Step कहते हैं ।
इसे 'चारी' शब्द द्वारा प्रकट कर सकते हैं ।
नाट्यशास्त्र में भौमीचारी तथा आकाशीकी-चारी के ३२ प्रकार बतलाए
गए हैं । संगीतरत्नाकर में देशीचारी के अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये हैं जो
नाट्यशास्त्र के परवर्ती आचार्यों-(कोहल तथा अन्य परवर्ती आचार्यों) द्वारा
निरूपित की गई । इनमें ३५ भौमी तथा २९ आकाशीकी चारी है ।
संगीत-रत्नाकर के व्याख्याकार चतुर कल्लिनाथ ने ( अपनी व्याख्या में )
कोहल का मत उद्धृत करते हुए २५ मधुपाचारी को बतलाया जो अपने 'कुट्टन'
विधान के द्वारा चारी-समूह में स्वतंत्र महत्त्व रखती है । आचार्य कोहल ने
नृत्याचार्यों की आवश्यकतानुसार चारी में संवर्द्धन या संशोधन को भी मान्यता
दी है । इस प्रकार चारी के भेदों के विषय मे प्राचीन एवं मध्यवर्ती नाट्याचार्यों
में पर्याप्त मतभेद परिलक्षित होता है । चारी के विषय में संक्षेप में इतना ही
पर्याप्त है । विशेषजिज्ञासुजन-संगीतरत्नाकर [७।९२०-१०२६, भरतार्णव
अध्याय ८।४९३-५।४३, के अतिरिक्त अभिनयदर्पण तथा संगीतराज का चारी-
वर्णन भी देखें ।
१. ऊर्वोः—ख-ग० । २. समानकरणाच्चेष्टा—ख-ग० ।
३. विधानोभयतश्चार्यो—ख-ग० । ४. व्यायच्छन्ति—ख-ग० ।
९६ नाट्यशास्त्रम्
क्योंकि यह विधान से युक्त (होकर) अङ्गों (अवयवों, हस्त, पैर
इत्यादि) को परस्पर सम्बद्ध करती हैं, इसीलिये 'चारी' व्यायाम (भी)
कहलाती है ॥ २ ॥
एकपादप्रचारो यः सा चारीत्यभिसंज्ञिता ।
द्विपादक्रमणं यत्तु करणं नाम तद्भवेत् ॥ ३ ॥
करणानां समायोगः खण्ड इत्यभिधीयते ।
खण्डैस्त्रिभिश्चतुर्भिर्वा संयुक्तैर्मण्डलं भवेत् ॥ ४ ॥
एक पैर के द्वारा भरा जाने वाला डग 'चारी' १(संचारी) तथा दोनों
पैरों से होने वाली गति 'करण' कहलाती है। (तीन) करणों का योग
'खण्ड' तथा तीन या चार खंडों के मिलने पर एक 'मण्डल' बनता है ॥
चारी—उपयोगिता
चारीभिः प्रसृतं नृत्तं चारीभिश्चेष्टितं तथा ।
चारीभिः शस्त्रमोक्षश्च चार्यो युद्धे च कीर्तिताः ॥ ५ ॥
चारी से नृत्त व्याप्त है, चारी से ही हलचल (गति आदि) की जाती
है तथा शस्त्रों का फेंकना और युद्ध करना भी चारी के द्वारा ही प्रस्तुत
होता है ॥ ५ ॥
यदेतत् प्रस्तुतं नाट्यं तच्चारीष्वेव संस्थितम् ।
न हि चार्या विना किञ्चिन्नाट्येऽङ्गं सम्प्रवर्तते ॥ ६ ॥
'नाट्य' के रूप में जो भी (वर्णित) है वह सब चारी में ही समाविष्ट
जानो; क्योंकि कोई भी नाट्य का विभाग चारी के बिना नहीं होता।
(रहता) ॥ ६ ॥
तस्माच्चारीविधानस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ।
या यस्मिंस्तु यथा योज्या नृत्ते युद्धे गतौ तथा ॥ ७ ॥
टिप्पणी—१ चारी-चारी के संचारी करण, खण्ड तथा मण्डल का आज
कहीं प्रयोग नहीं होता, इस विषय में अन्य नृत्य-नाट्य ग्रन्थों में भी केवल
उल्लेखात्मक विवरण ही उपलब्ध है।
१. समायोगात्—ग० । २. खण्डमि—ग० ।
३. प्रस्तुतं—ख, ग० । ४. संज्ञितम्—ग० ।
५. नाट्ये ह्यङ्गं प्रवर्तते—ग० । ६. प्रयोक्तव्या—ख-ग ।
एकादशोऽध्यायः ९७
अतएव अब मैं उन (सभी) के लक्षण, विधान (आदि) को
बतलाऊँगा जिनकी नृत्य, गति तथा युद्ध में योजना की जाती है ॥ ७॥
भौमी चारी तथा आकाशिकी चारी—
समपादा स्थितावर्ता शकटास्या तथैव च ।
अध्यर्धिका चाषगतिर्विच्च्यवा च तथापरा ॥ ८ ॥
एलकाक्रीडिता बद्धा ऊरुद्वृत्ता तथाड्डिता ।
उत्स्पन्दिताथ जनिता स्पन्दिता चापस्पन्दिता ॥ ९ ॥
समोत्सारित-मत्तल्ली मत्तल्लीचेति³ षोडश ।
एता भौम्यस्मृताश्चार्यः,
ये सोलह भौमी चारी हैं—यथा :—(१) समपादा, (२) स्थितावर्ता,
(३) शकटास्या, (४) अध्यर्धिका, (५) चाषगति, (६) विच्च्यवा,
(विच्युता), (७) एलकाक्रीडिता, (८) बद्धा, (९) ऊरूद्वृत्ता,
(१०) अड्डिता (अंगिता), (११) उत्स्पन्दिता (उत्स्यन्दिता),
(१२) जनिता, (१३) स्पन्दिता, (१४) अपस्पन्दिता, (१५)
समोत्सारित-मत्तल्ली तथा (१६) मत्तल्ली ॥ ८-१० ॥
शृणुताकाशिकीः पुनः ॥ १० ॥
अतिक्रान्ता ह्यपक्रान्ता पार्श्वक्रान्ता तथैव च ।
ऊर्ध्वजानुश्च सूची च तथा नूपुरपादिका ॥ ११ ॥
डोलापादा तथाक्षिप्ता आँविद्धोद्वृत्तसंज्ञिते।
विद्युद्भ्रान्ता ह्यलाता च भुजङ्गत्रासिता तथा ॥ १२ ॥
मृगप्लुता च दण्डा च भ्रमरी चेति षोडश ।
आकाशिक्यः स्मृता ह्येता लक्षणञ्च निबोधत ॥ १३ ॥
आकाशिकी चारी (भी) सोलह हैं। यथा :—(१) अतिक्रान्ता,
(२) अपक्रान्ता, (३) पार्श्वक्रान्ता, (४) ऊर्ध्वजानु, (५) सूची,
(६) नूपुरपादिका, (७) दोलपादा (डोलापादा), (८) आक्षिप्ता,
(९) आविद्धा, (१०) उद्वृत्ता, (११) विद्युद्भ्रान्ता (विद्युत्क्रान्ता),
(१२) अलाता, (१३) भुजंगत्रासिता, (१४) हरिणीप्लुता (मृग-
प्लुता) (१५) दण्डा (दण्डपादा), तथा (१६) भ्रमरी। अब मैं इनके
क्रमशः लक्षण बतलाता हूँ ॥ ११-१३ ॥
१. स्थिता वार्त्ता—ख-ग० । २. उत्स्यन्दितां—ख-ग० ।
३. चापि—ग० । ४. व्याविद्धोद्वृत्त सं—ख-ग० ।
७ ना० शा० द्वि०
९८ नाट्यशास्त्रम्
भौमीचारी-लक्षण
पदैर्निरन्तरकृतैस्तथा समनखैरपि ।
समपादा तु सा चारी विज्ञेया स्थानसंश्रया ॥ १४ ॥
समपादा—दोनों पैरों को पास रखते हुए तथा नखों को बराबर
मिलाते हुए अपने स्थान पर स्थित रहने (या खड़े रहने) को 'समपादा'
चारी कहते हैं ॥ १४ ॥
भूमिघृष्टेन पादेन कृत्वाभ्यन्तरमण्डलम् ।
पुनरुत्सारयेदन्यं स्थितावर्ता तु सा स्मृता ॥ १५ ॥
स्थितावर्त्ता—यदि भूमि पर रगड़ते हुए एक (अग्रतलसंचर) पाद को
ऊपर उठाकर स्वस्तिक दशा बनाते हुए दूसरे पैर को अपने पास खींचे
तथा दोनों के पृथक् होने के पश्चात् यही गति पुनः आवृत्त की जाए तो
'स्थितावर्त्ता' चारी होती है ॥ १५ ॥
निषण्णाङ्गस्तु चरणं प्रसार्य तलसञ्चरम् ।
उद्वाहितमुरः कृत्वा शकटास्यां प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥
शकटास्या—शरीर को सीधा रखते हुए एक चरण को 'अग्रतलसंचर'
दशा में सामने (की) ओर रखे तथा छाती को 'उद्वाहित' स्थिति में
रखे तो 'शकटास्या' चारी होती है ॥ १६ ॥
सव्यस्य पृष्ठतो वामश्चरणस्तु यदा भवेत् ।
तस्यापसर्पणञ्चैव ज्ञेया साध्यर्धिका बुधैः ॥ १७ ॥
अध्यर्धिका—यदि बाएं पैर की एड़ी (के पिछले भाग) पर दाहिना पैर
रखकर फिर उसे पीछे हटाया जाए (तथा यह डेढ़ताल के कालप्रमाण पर
हो) तो 'अध्यर्धिका' चारी जानो ॥ १७ ॥
पादः प्रसारितः सव्यः पुनश्चैवोपसर्पितः ।
वामः सव्यापसर्पी च चाषगत्यां विधीयते ॥ १८ ॥
चाषगति—यदि दाहिने पैर को (आगे) फैलाकर फिर पीछे की
ओर रख दिया जाए और बायां पैर उसी समय पीछे की ओर रखकर पुनः
आगे बढ़ाकर रख दे तो 'चाषगति' चारी जानों ॥ १८ ॥
१. स्मृता—ख-ग०। २. स्थिता वार्त्ता—ख-ग०।
३. शकटास्यं—ग०।