नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ नाट्यशास्त्रम्
बहिः पार्श्वस्थितोऽङ्गुष्ठस्त्र्यश्रपादस्तु स स्मृतः ।
कृत्वा समपदं स्थानम् अश्वक्रान्तं तथैव च ॥ ४६ ॥
स्याद्विक्कवादिश्वर्थेषु त्र्यश्रः पादो यथाविधि ।
स्वाभाविक रूप से समतल भूमि पर स्थापित पैर को 'समपाद' कहते
हैं । इसका स्वभाविक अभिनय में उपयोग होता है ।
विभिन्न करणों से युक्त स्वाभाविक स्थिति को प्रदर्शित करने में स्थिर
'समपाद' रखना चाहिए तथा 'रेचक' अवस्था के प्रदर्शित करने में (इसे)
चलित दशा में रखते हैं ।
समपाद में ही पैर का पंजा ( पाणि ) दूसरे पैर के अन्दर चला जाए
और अंगूठा एक बाजू बाहर टिका रहे तो 'त्र्यश्रपाद' जानो ।
समपादस्थान तथा अश्वक्रान्तस्थान के प्रदर्शन करने के उपरान्त
विक्लवादि भावों की अभिव्यक्ति के लिये 'त्र्यश्रपाद' का विधिवत् प्रयोग
किया जाता है ॥ ४३-४७ ॥
[ अस्यैव समपादस्य पाणि॑रभ्यन्तरे भवेत् ।
त्र्यश्रपादः स विज्ञेयः स्थानकादिषु संश्रयः ॥ ]
(प्रक्षिप्त—यदि इसी 'समपाद' में पंजा अन्दर रख ले तो त्र्यश्रपाद
होता है । इसका स्थानग्रहण करने आदि में प्रयोग किया जाए ।)
उत्क्षिप्तता तु भवेत् पाणिः प्रसृतोऽङ्गुष्ठकस्तथा ॥ ४८ ॥
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः पादे ३ ऽग्रतलसञ्चरे ॥ ४९ ॥
यदि एड़ी उठी हुई, अंगूठा आगे की ओर फैला हुआ और उंगलियां
झुकी हुई हो तो 'अग्रतल-संचर' नामक पाद होता है ॥ ४८-४९ )
तोदँननिकुट्टने स्थितनिशुम्भने भूमिताडने भ्रमणे ।
विक्षेप विविधरेचकपाष्णिकृ॑तागमनमेतेन ॥ ५० ॥
प्रेरणा, कूटना (तोड़ना), स्थित होना (स्थानक दशा में) (ठोकर
से) पीटना, पृथ्वी की ताड़ना करना, भ्रमण, (किसी वस्तु का) फेंकना,
विभिन्न रेचक गतियों की दशा में तथा एड़ी के बल आने में 'अग्रतलसंचर'
पाद की योजना की जाएं ।
१. अयं श्लोकः क-पुस्तके प्रक्षिप्तः । २. पाष्णिरञ्चितो—ग० ।
३. पादोऽग्रतलसञ्चरः—ख-ग० ।
४. नोदन-निकुट्ठिते स्थितनिसुंभिते भूमिताडनभ्रमणे—ग० ।
५ पाष्णिक्षताग्रगमन—ख-ग० ।