नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
४२० नाट्यशास्त्र
गया था उसकी अब परिकर सामग्री बतलाते हैं—'व्यायाम' इत्यादि से। यहाँ
व्यायाम पद का अर्थ अंग विषयक प्रशिक्षण एवं अभ्यास के उपयुक्त काल है
जिसके परिणाम स्वरूप द्रुत, मध्य एवं विलम्बित चच्चत्पुटादि ताल के अंग का
(यहाँ) पठन किया गया है। (उसका अनुगमन कर के ही शारीर चेष्टाओं
को युद्धादि प्रसंग में प्रदर्शित करना अभीष्ट है)।
६०-६१. सन्नगास्त्र = जिसका शरीर थक गया हो तथा विश्रान्ति ग्रहण
कर रहा हो। कूर्परांसशिरः = कूर्पर (कोहनी), अंस (कन्धे) तथा शिर—
ये सभी अंगों का प्राण्यङ्ग होने से यहाँ एकवद्भाव हुआ है।
६२-६३. चतुरस्रता :-- जिसके लिये सौष्ठव का विधान किया जाता
है। यहाँ कटिनाभिचरौ पद से आशय है कि कटि और नाभि पर हाथ क्रमशः
तथा एक साथ भी स्थित रखे जायें।
६३-६५. खड्ग युद्ध में जिन न्यायों को बतलाया वे ही धनुर्युद्ध में भी
होते हैं, अतः धनुर्
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४२१
से शरीर दृढ़ है वह सुडोल आकार वाला भी होगा ही तथा ऐसे व्यक्ति को
जिस कार्य में लगाया जाए उसमें उपयुक्त होने से नाट्य प्रयोग में सफलता
प्राप्त होती है । गात्रों में माधुर्य का अर्थ है उनका सुन्दर या सुडोल दिखलाई
देना ।
१०१-१०२. अङ्गक्रिया = अङ्ग-सिद्धि । अङ्गों के अनुसार प्राप्त चारी
की परम्परा से निर्मित स्वरूप वाले मण्डलों का विवरण अब दिया जा
सकता है, इस तथ्य को चारी के निरूपण के उपरान्त ही बतला कर चालू
अध्याय समाप्ति तथा अगले अध्याय में मण्डल के प्रतिपादन की बात को भी
दिखलाया गया है ।
:
The ही has: ह with ी. The top loop of ी curves to the right and down to a vertical line on the right.
Now look at Word 1 in दस मण्डल [?] है:
It has ह with ो! Wait, does it have a loop to the right?
Wait, it has a vertical line on the right, and an oblique stroke to the left top: that is ो!
Wait, does it say हो?
Wait, if it is हो, then हो है? Or ही है?
Wait, look at the top of that letter:
The curve goes to the right!
Wait, let me look at ही in line 5: बनता है वही 'मण्डल'.
In line 6: ( आगे भी ) इसी प्रकार.
In line 11: दिखलाया गया है ।
In line 17: इसी को 'आस्कन्दिता' भी कहते हैं ।
Look at ही in इतने ही (line 8): ह and ी.
Now look at the word before है in line 8:
Wait, could it be होते हैं? No, it's 2 letters: हो and है? Or ही and है?
Wait, look at हो in line 10: हो जाती है.
Notice
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १२ ४२३
६६-६७. परं चैव में 'च' पद का अर्थ 'अपि' लेना चाहिए । अर्थात्
इसके बाद भी मण्डलों का प्रयोग किया जाय । कैसे किया जाए का—उत्तर
है समचारी से । अर्थात् पारस्परिक योजनां से प्राप्त चारियों का ( औचित्य
या अपेक्षा के अनुसार ) यहाँ वहाँ सर्वत्र प्रयोग करना चाहिए ।
आचार्यात् — आचार्य की बुद्धि से प्रयोग किये जाए अपनी ऊहा से नहीं ।
६८. खण्डों का भी मण्डलों के साथ रहने से प्राधान्य दिखलाया गया
है । 'वाद्येन अनुगतानि' इससे यह बतलाया गया कि यहाँ चतुर्थ अध्याय
में नृत्त के उपयोगी विषयों में प्रतिपादित गति से विपरीत या भिन्न नाटकीय
गति में मण्डलों की प्रमुखता रखनी अभीष्ट है ।
त्रयोदश अध्याय
( गतिप्रचार )
१. यहाँ 'मण्डलकल्पनं' पद से जो चारी के संयोग या मिश्रण से मण्डल
निर्मित होते हों, उनके स्वरूप की कल्पना आचार्य के द्वारा नहीं बतलाने
पर भी स्वयं लक्षणों को देख कर अपनी बुद्धि से समझ लिया जा सकता
है। यहाँ एक प्रश्न फिर भी बना ही रहता है कि जब पिछले अध्याय में
चारी के संयोग से निर्मित मण्डलों को तो बतलाया परन्तु आचार्य ने उन
मंडलों की योजना या विधान क्यों नहीं बतलाया। इसके उत्तर में यही कहा
जा सकता है कि चारीमण्डल का प्रसंग चित्तवृत्ति रूप नहीं है कि उन्हें रस
एवं भाव की उपयोगिता में बतलाया जाए। अतः रस एवं भाव के अनुसार
की जाने वाली गतियों के विनियोग बतलाये गये हैं तथा इसी कारण मुनि
ने पृथक् से इस विषय पर (अलग से या स्वतन्त्र) एक अध्याय भी रखा है।
यह गति प्रकृति या पात्र के दिव्य, अदिव्य एवं दिव्यादिव्य रूप (और)
उसकी अवस्था और देशकाल की अपेक्षा को देख कर रखी जाती है। यह
गति प्रत्येक पुरुष की भिन्न-भिन्न होती है जिसे आगे बतलाया भी जाएगा।
अतः प्रथमतः उसकी प्रक्रिया दिखलायी गयी।
२-३. अभिनय के आरम्भ में नान्दी के उपक्रम के साथ प्रयोग के
उपक्रम में कैसी गति रखी जाए। यही 'तत्रोपवहनं' से आरम्भ किया गया।
उपवहन-विधि के उपरान्त मंच पर प्रविष्ट सूत्रधार तथा उनके सहयोगी,
नट, नटी (आदि) के साथ जो अभिनेय-विषयक संवाद हों उनके बाद
क्योंकि इस के पूर्व नान्दी हो चुकी रहती है। यहाँ यही तथ्य 'ध्रुवागीति'
के हो जाने के द्वारा सूचित किया गया है। 'ध्रुवागीति' देश, रस तथा
पात्र के अनुगत विषयों में उपनिबद्ध रहना चाहिए। पट या यवनिका के
हटाने के उपरान्त पात्र प्रवेश के समय भी उपोहन क्रिया की जाए। जिसके
बीच में नटी (पात्र) का प्रवेश अंगों के वलन क्रिया के सम्पादन के साथ
रखा जाए। यद्यपि स्त्रीपात्र का प्रवेश शरीर के स्वाभाविक वलन कर्म
के साथ ही होता है। अतः उसे शब्द से बतलाने की यद्यपि आवश्यकता नहीं
है फिर भी कोहल आदि आचार्यों के मत में यहाँ ऐसी गति विहित
या इष्ट है। इस समय शुष्काक्षर गान कर समुचित स्थान, दृष्टि एवं
तत्काल उपयुक्त मुखरागादि से युक्त हो कर पात्र को प्रवेश करना चाहिए
जिससे सामाजिकों को शीघ्र ही सम्बद्ध अर्थ या विषय की प्रतीति हो जाए।
इस समय गीत भी उत्तम रखा जाए जिससे सामाजिक या दर्शक उत्सुक
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२५
हो जाए। यहाँ 'यथामार्गरसोपेतं' के स्थान पर 'यथामार्गकलोपेतम्' पाठ भी
मिलता है। इसका अर्थ है कि मार्ग अर्थात् चित्र आदि में जो दो, चार, आठ
मात्राओं की कलाएँ होती हैं उनसे उपेत अर्थात् युक्त होना चाहिए।
४-५. विकृष्ट, त्र्यस्र एवं चतुरस्र इन तीन स्थानों में त्र्यस्र में वैष्णव
स्थान जिसमें एक पक्ष या बाजू समान या बराबर और दूसरा समुन्नत रहता
है। प्रसन्न—अर्थात् अपने प्रवेश के समय ही सन्न अर्थात् अचल। स्वस्थ
मयूर सदृश सुन्दर सिर जिसमें हो उसी प्रकार ग्रीवा प्रदेश रखना चाहिए।
६-७. यहाँ 'नाभिसंस्थ' पद से चतुरस्र का संकेत है। अतः नाभिस्थित
दक्षिण खटकामुखहस्त और कटिस्थित वाम अर्धचन्द्र हस्त (का प्रयोग)
अभीष्ट है यह यहाँ दिखलाया गया है।
८-१०. गति के बाद क्रमप्राप्त एवं उचित होने से स्थान (स्थिति)
को दिखलाने हेतु 'पादयोरन्तरम्' इत्यादि से पूर्व अध्याय ११।५२ में दर्शित
स्थानक को प्रस्तुत करने के बाद गति का उपक्षेप किया गया है। इसे देश
तथा काल को दिखलाने वाले लक्षणों के (जिन्हें इसी अध्याय में कह रहे हैं)
अनुरूप किया जाए। ताल-फैलाई गई अंगुलि और अंगूठे के बीच की लम्बाई
या प्रदेश हो वह ताल कहलाता है, जिसे बालिश्त कहते हैं। (अर्थात् एक
ताल = एक बालिश्त)। यह ताल अभिनेता के अपने हाथ के प्रमाण से रख
लेना चाहिए। यह गति की स्थिति या डग रखने की पृथ्वी पर की दूरी
(देश) चार, दो तथा एक ताल की होती है। यहाँ उत्तमादि प्रकृति के
अभिनय की अपेक्षा से क्रमशः ऐसी संख्या को लिया गया है। यह
विनियोजना उत्तम प्रकृति के पात्रों की चार ताल, मध्य पात्रों की दो ताल
तथा अधम पात्रों की एक ताल के प्रमाण पर की जाती है। इसे शोभाधायक
या नाट्यधर्मी प्रकार से मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उत्तमादि
पात्रों में क्रमशः तालों का ह्रास स्वभावतः होता है।
११. देश के नियम के पश्चात् इसमें समय का मान भी नियत होता है।
इसमें पैर को उठा कर रखने के समय में भी इसी प्रकार उत्तमप्रकृति के लिये
चार कलाएँ तथा इनसे आधी-आधी मध्यम एवं अधमों के लिये नियत हैं। पाँच
निमेष की एक मात्रा होती है, इस सामान्य लक्षण से यही सूचित होता है कि
सर्वत्र ध्रुवक के प्रमाणानुसार पैर को रखने में चार कलाएँ आवश्यक हैं।
कोहलाचार्य ने इस प्रसंग में उत्तमादि पात्रों के लिये द्विपदी आदि का भी
विधान बतलाया है जिसे विस्तारभय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है। यहाँ
मध्यमध्य में स्थान; फिर उनमें भिन्न-भिन्न क्रियाएँ या चेष्टाएँ तथा उनमें भी
विश्राम की कल्पना के लिये विराम-स्वरूप मात्रा की कल्पना की गयी है।
इसी मात्रा की कल्पना के आधार पर चतुष्कला आदि का विधान रहता है
तथा यही तथ्य मुनि ने उपर्युक्त विवरण से सूचित भी किया है।
१२. यह समय के लय विषयक (मान का) नियम दिखलाने के लिये
कहा गया है। स्थित = (अर्थात्) विलम्बित लय। इसे प्रकृति आदि के
विभाग के अनुसार ठीक से विचार कर प्रयुक्त करे। यहाँ आदि पद से देश,
काल, अवस्था तथा रस को ध्यान में रखना भी अपेक्षित है। जैसे-धीरता के
कारण विलम्बित लय तथा इसके अभाव में कभी मध्य तथा कभी द्रुत लय का
होना। क्योंकि यह भी देखा गया है कि उत्तम जाति होने पर भी उसका
भाव अन्यथा रहता है अत यह प्रकृतिविभाजन है जात्यादि कृत विभाजन नहीं।
१३. लयत्रय का यह प्रयोग सत्व के कारण होता है। सत्व से आशय है
चित्तवृत्ति। अतएव संग्राम आदि के अवसर पर उत्तमपात्र की भी द्रुतलय
में गति रखी जाती है तथा शोकादि के अवसर पर अधमपात्र की भी
विलम्बित लय में गति रहती है।
१४. देश, काल आदि के नियम के अनुसार पात्रों के गतिगत विशेषरूप
या विचित्रता को दिखला कर अब विशिष्ट विवरण देने के भाव से मुनि
उनको बतला रहे हैं जिन्हें पूर्व में सामान्यरूप से कहा था।
१५. यहाँ 'तु' शब्द विशेषता के द्योतक रूप में प्रयुक्त है। अतः मन्थर
गति में चार ताल, स्वभावगति में तीन तथा दीप्तगति में पाँच ताल भी रखे
जा सकते हैं—(यही इस "तु" के द्वारा सूचित किया गया है)।
१६-१७. पार्श्वक्रान्तैः इत्यादि से कुञ्चितपाद में पार्श्वक्रान्ताचारी के
स्वरूप को दिखलाया गया है। (द्र० ना० शा० ११।३२) रंगकोण
अर्थात् प्रेक्षागृह के (रंगस्थल के) उत्तर-पूर्व कोण में तथा द्वितीयकोण
अर्थात् उत्तर-पश्चिम कोण में। तत परं=अन्य (शेष) दो कोणों में।
१८-१९. 'वामवेध' का अर्थ है पार्ष्णि क्षेत्र में एडी पर सूचीपाद का
निपात या प्रक्षेप करना। पञ्चपदी गमन स्वाभाविक गति में होता है। गति
की सिद्धि होने पर रंगकोणों में जाने के समय ब्रह्म स्थान का उल्लंघन नहीं
किया जाए यह ध्यान देने की बात है। मूल में 'पादानामेक विंशतिम्'
अर्थात् इक्कीस डग की जो बात कही है वह प्रत्येक कोण में पञ्चपदी गमन
करने पर (४ × ५ = २०) बीस ही होते हैं इक्कीस नहीं। परन्तु इसे
आचार्य की आज्ञा मान कर यहाँ यथाशक्य निर्वाह होगा संगति न बैठने से।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२७
२०. यहाँ 'भरत' शब्द भरत से प्राप्त शास्त्र शिक्षा वाले एवं भरत की
सन्तति से सम्बद्ध नट की सूचना देता है । परिमित दिशा में पञ्चपदी का
नियम है अतः एक ही स्थान पर पादों के दो दो विक्षेप करना चाहिये ।
विकृष्ट में बार २ पञ्चपदी हो सकती है इस विषय में भिन्न प्रमाणों में दी
गई गति की रीति या विवरण ही प्रमाण है ।
२१. मिश्रगतियों के विषय में विशेष बात कहने की भावना से
'समगति' का उपसंहार किया गया है—'यः समै' इत्यादि से । तथैव-अर्थात्
समानता से ।
२२. मिश्रगति को बतलाते हैं—'अथ' इत्यादि से । परिवारितः = जो
( उत्तमरूप आदि से ) विवक्षित हों ऐसे पात्रों से युक्त । इस समय उत्तम
की चार कलाएँ, मध्यम की दो तथा अधम पात्र की एक कला प्रमाण का
पाद पात रहे ।
२३. यहाँ कला के चतुस्तालादि विभाग को निश्चय करने के लिये विशेष
कहा गया है—दैत्य दानव आदि ।
२४. सभी अर्थात् देवदूत आदि उत्तम पात्र । उद्धत देवपात्र जैसे
मातलि प्रभृति ।
२५-२६. राजा भी देवांश से उत्पन्न होने वाला व्यक्ति है क्योंकि शास्त्र में
इसे लोकपालों के अंशों से उद्भूत माना गया है । (द्रष्ट—'अष्टाभिर्लोकपालानां
मात्राभिर्निर्मितो नृपः') इत्यादि ( मनु० ) । इसी कारण इनका प्राधान्य
होता है । यही तथ्य गीता में भी—'राजविद्या राजगुह्यम्' इत्यादि से कहा
है । अयं = चतुष्कल इत्यादि । स्वच्छन्द गमन = स्वस्थ स्थिति में गति ।
संभ्रम = आवेग । उत्पात = उन्माद जैसी मानसी दशा । इन दशाओं में
निश्चयपूर्वक गति में कोई प्रमाण या मान नहीं होता है ।
३०-३३. विशेष स्थिति या अवस्थाओं के बल से नियम में ( भी )
परिवर्तन हो जाता है । तब उत्तम पात्र की दों कलाएँ, मध्यम की एक तथा
अधम की आधी कला गति का प्रमाण हो जाती है । यह श्वासादि की
विश्रान्ति के साथ होता है तथा चार प्रकार से होता है और यहीं द्रुत
उपयुक्त मानी जाती है ।
३४-३५. भय से युक्त होने पर 'ऊरुस्तम्भ' हो जाता है । इसी प्रकार
विस्मय और अवहित्था अर्थात् कृत्रिम धीरता के अवसर पर भी । ऐसे
समय गति स्थित या विलम्बित लय वाली की जाए । आदर से विशिष्ट,
औत्सुक्य से युक्त शृंगार के विप्रलम्भ नामक प्रकार में भी इसी प्रकार 'गति'
४२८ | नाट्यशास्त्र
रहती है। स्वच्छन्दगमन = बिना किसी लक्ष्य के या कार्य के क्रीडा करते हुए
चलना। पादपात भी जिस गति में जैसा कलान्तर का परिमाण बतलाया
हो वैसा ही रहना चाहिए। यह बात आगे इसी अध्याय में कही भी जा रही
है। अभिनय के दौरान स्त्री-पात्रों से छः या आठ कलाओं तक के पादपात
नहीं करवाये जाने चाहिये क्योंकि देर तक ऐसा करने पर उन्हें थकावट
(खेद) हो जाएगी। विषम संख्या के किसी विशेष परिमाण में पादों का
उत्क्षेप तथा निपात का योग नहीं बनता अतः साम्य या सम संख्या ही
आचार्यगण यहाँ उचित समझते हैं।
३६-३६. पूर्व में कलागत आधिक्य दिखलाया गया था। इसके विपरीत
कलागत न्यूनता भी होती है—यह तथ्य अगली-'अस्वस्थकामिते' इत्यादि
से कहा गया है। अस्वस्थ = प्रच्छन्न । कामित = कामुक । बान्धव आदि के
अनिष्टश्रवण के बाद उनके समीप शीघ्र जाना अभीष्ट होता है, इसी तरह
अद्भुत पदार्थ के दर्शन में भी (मन में) उतावलापन रहता है तब कलाओं में
न्यूनता रखा जाना उचित हो जाता है। आत्ययिक = अवश्यकर्तव्य कार्य।
शत्रु और अपराधी के ढूंढ़ने या पकड़ने में भी इसी प्रकार विकला (जिसमें
कला का चार से आधा परिणाम या कम हो) की योजना रखी जाती है।
'विकला' पाठ में अर्थ है अर्धकला रहित चतुर्थी कला। इसी कारण
'चतुरर्धकलं' कहा भी है (जो संभ्रम, उत्पात आदि के प्रसंग में कहा था।)
कलाओं के परिमाण का यह विधान या नियम उपयोगी (होता) है तथा
इसका उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों में प्रयोग भी किया जाता है। अतः
नियम की व्यावहारिकता भी है तथा महत्त्व भी।
४०-४४. इस प्रकार प्रकृतिभेद से गति का विवरण देकर रस में गति
को दिखलाने की भावना से तथा पुरुषार्थ में उपयोगी रसों में शृंगाररस के
प्रमुख होने से उसी की गति बतलाई जा रही है—'गतिः शृङ्गारिणी'
इत्यादि से। स्वस्थकामित = प्रकट कामुक या प्रेमी। यहाँ 'सूचा' का पुनः
कथन आकर्षक पदार्थ के अतिशय चमत्कारी होने से पर्यालोचन के निरूपणार्थ
है अर्थात् शृङ्गार में 'सूचा' की योजना आवश्यक समझी जाए।
(सूचाभिनय का स्वरूप ना० शा० २४।४४ पर है। जिसे टिप्पणी०
पृ० १३६ पर दिया गया है।) उस सूचा से भी अन्तरङ्ग प्रकृत में गति
निरूपण है इसलिये इसे यहाँ दिखलाया गया। यहाँ पर सौष्ठव से अङ्ग की
चतुरस्रता तथा उससे युक्त लय, (विलम्बित आदि) ताल सभी सामान्यरूप
में होना चाहिए।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२९
४५-४८. प्रच्छन्नकामिता—छिप कर प्रिया से मिलने या सम्बन्ध रखने
वाला। जैसे रत्नावली नाटिका में वत्सराज उदयन। इसके विपरीत सर्वलोक
समक्ष कामिता जैसे पौलस्त्य की सीता में कामिता। इस समय किसी के
देख लेने की आशंका होने से दीपक को बुझा दिया जाता है। वेलासदृश
वस्त्र—समय के अनुरूप वस्त्र या वेषधारी। यहाँ वैसे ही आभूषण भी धारण
करना उपलक्षण है। शब्दशङ्की पद से खण्डित कला की मिश्रित गति
रखने की बात भी बतलाई गयी है तथा वेपमान-शरीर से कला के चौथाई
भाग का काल भी संकेतित किया गया है !
४८-५४. विप्रलम्भशृङ्गार में संभोग शृङ्गार की तरह गति बतलाकर अब
रसत्वेन समानरूप वाले रौद्ररस की गति बतलाते हैं—‘रसे रौद्रे’ इत्यादि से।
दैत्य, दानव आदि में प्रयुक्त कहने का आशय यही है कि उनमें क्रोध के बिना
भी रौद्रता रहती है। यह बात रसाध्याय में पूर्व में कही जा चुकी है क्योंकि
इनमें एक ही रस (रौद्र) होता है। यहाँ ताल शब्द काल का प्रमाणवाची
समझा जाए। ‘तालान्तरपातित्व’ से जितने समय उत्क्षेप हो उससे न्यून
काल में पातन रहने का भी संकेत है। ‘तद्विधा’ से भीमसेन सदृश व्यक्ति
का ग्रहण है तथा युद्धवीर में भी ऐसे व्यक्ति की ऐसी ही गति रखने की बात
की सूचना भी !
५५-५७. रौद्ररस की प्राणभूता ‘उग्रता’ को बतलाने के अवसर के बीच
ही पुरुषार्थ के अनुसार प्राप्त बीभत्सगति का क्रम आगया था। जिसे—
‘अहृद्या’ इत्यादि से बतलाते हैं। अहृद्या मही = स्मशान की भूमि या जहाँ
युद्ध होने से कट-कट गिरने वाले नरदेह (कबन्ध आदि) के कारण भूमि
स्मशान बन गयी हो।
५७-५६. वीररस की गति—‘अथ वीरे च’ इत्यादि से बतलाते हैं।
‘पादविक्षेप’ का अर्थ है विस्तार से क्षेप या पाद का स्थापन करना। इससे
‘स्पन्दिता’ तथा ‘अपस्यन्दिता’ चारी का ग्रहण सूचित होता है तथा इसमें
गन्तव्य प्रदेश में शीघ्रता से आगे बढ़ कर स्थान प्राप्ति करना अभीष्ट होता
है। वीर तथा रौद्र रस में आवेग नामक भाव का स्पर्श रहने से यहाँ कभी
धीरे तथा कभी द्रुत प्रचार भी विहित माना गया है। आवेग की दशा में—
कला गत प्रमाण वाले काल के अनुगत गतिशील पैरों के द्वारा तीन पादपात
किये जाए। एक लघुपात एक दूसरे की ओर दो द्रुतपात तथा फिर एक कला
का विश्राम। यह वीर तथा रौद्र दोनों रसों में ‘गतिपरिक्रम’ होता है।
४३० | नाट्यशास्त्र
मध्यमपात्रों की इसी क्रम में रहनेवाली गति में भी अनुकूल संचारी (आवेग
आदि में) भाव में यही गति होती है। इसमें इधर उधर चलने में व्याकुल
एवं द्रुत बहुल पादविक्षेप होते हैं। अद्भुतरसत्व को प्राप्त होनेवाले विस्मय
स्थायी में उत्तमपात्र की स्वच्छन्द गति बतलाई जा चुकी है, परन्तु यहाँ वदन
में राग लालिमा उत्पन्न हो जाना विशेष रूप में होता है। (तथा इस
विस्मय में आवेग सदृश ही पाद विक्षेप द्वारा गति भी रखी जाती है)
६०-६१. स्मित से अतिहसित तक उत्तम हास्य है। इसमें उत्तम पात्र की
गति स्वस्थ होती है किन्तु यहीं अपहसित एवं अतिहसित वाले मध्यम पात्र
की गति विक्षिप्त रखी जाती है। 'अन्यच्च' पद से विदूषक की गति के
विषय में आगे बतलाये जाने वाले विवरण का संकेत दिया गया है। यहाँ
केवल प्रसङ्गवश हास्यगति द्रुत बतलायी गयी है।
६१-६४. अब करुणरस की गति—'पुनश्च करुणे' इत्यादि से बतलाते हैं।
यद्यपि 'ज्वरातें' (ना० शा० १३।३५) इत्यादि से करुण में स्तोकगति को
(इसी अध्याय में) बतलाया जा चुका है परन्तु कुछ अन्य बातें भी और है
यह 'पुनः' शब्द से दिखलाया गया है जिन्हें आगे कहेंगे।
६५-६७. प्रहार लगने पर करुणरस में होनेवाली गति में 'चूर्णपद'
का विधान है अर्थात् पैरों को ऊपर थोड़ा उठाये तथा बड़े जोर से नीचे
पटके। इस क्रिया में 'अध्यर्धिका' से चूर्णपद में स्वतः अन्तर हो जाता है।
६७-७०. शीत या वर्षा से अभिभव होने पर अब गति को बतलाते हैं—
'शीतेन' इत्यादि से। मध्यम तथा उत्तम पात्रों की शीतादि में होनेवाली गति
अनुभावों से शून्य भावों के द्वारा सूचित की जाती है। 'च' पद से शरीर के
अवयवों का कम्पन के अतिरिक्त संकोचन कार्य भी लिया जाए। 'एव' शब्द से
यहाँ 'सौष्ठव तथा चतुरस्र' की योजना का निषेध किया गया है। 'करौ' से वे
हाथ यहाँ अपेक्षित हैं जो कटि के ऊपर पटके जाएँ। इस स्थिति में शरीर
को सिकोड़ कर और हाथों को छाती पर रख कर लोक प्रसिद्ध या प्रचलित
गति का ही अभिनय किया जाए जिसमें ओठ, दांत और चिबुक का कम्पन
एवं शरीर का कुञ्चन का भाव भी लोक प्रचलित रूप में ही प्रस्तुत
होता हो।
७१-७६. शृङ्गार तथा करुणरस की गति के प्रसंग से शीत एवं वर्षा में
होने वाली गति का भी निरूपण करके बाद में 'भयानक रस' में गति को
बतलाते हैं—'तथा भयानके' इत्यादि से। सत्ववर्जिता = जिनको अपने
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३१
कुछ शील आदि के कारण उत्तम (स)त्व के औचित्य प्राप्त होने पर भी जो
सत्वहीन अर्थात् प्राणरहित हैं—जैसे विराट् का पुत्र उत्तर । 'द्रुतैः' इत्यादि
से कोहल के द्वारा दिखलाई गई धारा-लयादि का संकेत है । अनुसरण = शत्रु
का पीछे से आ जाना । जिनमें धैर्य या पराक्रम पुनः लाया जाए ऐसी गति ।
इसका फल यह है कि इसमें बीच में हल्के और भारी पादपात भी होते हैं
जिन्हें 'आसन्नपतितैः' इत्यादि से यहाँ कहा भी गया है ।
७५-७६. धीरप्रशान्त प्रकृति के 'वणिक्' तथा 'सचिव' जैसे पात्र की गति
को बतलाने के प्रसंग को उठा कर शान्त रस में होने वाली गति को भी बतलाते
हैं—'वणिजां' इत्यादि से । 'धीरप्रशान्ताः वणिजः' इस वचन के अनुसार
वणिक् जैसे पात्र के अन्तःकरण में संस्कार रूप में शान्तत्व स्थित है । इसी
प्रकार शान्तरस प्रधान यति आदि के नाटक आदि में प्रसङ्ग आते हैं वहाँ
भी उनकी गति को बतलाना अभीष्ट होता है जिसे इसी प्रकरण में दिखलाया
गया है । वणिक्, सचिव आदि का हृदय शान्त होने से नियमन के योग्य
होता है । स्वभावजा गति से गति के अनाविष्ट रूप को बतलाया गया है
अर्थात् जिसकी गति आवेश रहित रखी जाए वही स्वाभाविक है ।
७६-८६. नैष्ठिक यति आदि पात्रों की गति—'यतीनाम्' इत्यादि से
बतलाते हैं । नैष्ठिकों की गति ब्रह्मचर्य से प्रवृत्त होती है । उपस्थितस्मृति =
संस्कार के सर्वदा उद्बुद्ध रहने से जिसे सर्वदा स्मरण बना रहता हो वह ।
व्रतानुगा पद से व्रतों की अनुकूलगामिता स्पष्ट की गई हैं । उन्मत्तादि के
आगमादि में जो व्रत दिखलाये हैं तदनुसार योग्य पादों से इसी प्रकार गति
होती है । पाशुपत तथा नकुलीशपाशुपत—जो परमेश्वरव्रत को धारण
करते हैं—उनका उन्मत्तव्रत होता है तथा इसी व्रत के कारण इनकी
गति में भी उद्धतत्व रहता है । इसी प्रकार रसान्तरों की भी संगति कही
गयी है ।
८७. रसों के अनुसार गति को बतला कर अब देशों के अनुसार भी गति
को बतलाते हैं—'अन्धकारे' इत्यादि से । अन्धकार में या अन्धा बन कर
चलने में या अन्धे की तरह चलने में भूमि पर पैरों को घिसाते हुए चल
कर मार्ग के अन्वेषण में तत्परता को दिखलाया जाए ।
८८-९०. समपाद नामक स्थानक द्वारा रथ से जहाँ जाया जाता हो उसे
प्रदर्शित किया जाता है या रथविशिष्ट की गति सामान्यतः यहाँ दिखलाई
गयी है या फिर प्रकृति के विभागगत औचित्य से विचित्रता लिये हुए अश्व,
४३२ नाट्यशास्त्र :
वृषभ, खर तथा उँट के चित्रपट भी इस कार्य में लिये जाएँ यह भी या फिर
नट के पदों में ही ऐसा अनुकूलगमन रखा जाए जिससे यह मालूम होने लगे
कि जैसे कोई रथ चल रहा है।
६१-६२. यही बात विमान में बैठे हुए पात्र की गति में भी समझना
चाहिए। रथ में चढ़ने की दशा में गात्र को ऊपर ले जाये और इसके
विपरीत उतरने की दशा में उसे नीचे ले जाकर अवरोहण करे।
६२-६५. अब विमान के प्रसंगवश आकाशगति को भी बतलाते हैं—
'अधोऽलोकनेन' इत्यादि से। यहाँ चक्करदार घुमाव में गति को रखे परन्तु
यहाँ आकाशीकीचारी तथा मण्डलों की बार-बार आवृत्ति भी रखी जाती है।
ऋजु = सरल एवं ललित जंघाओं के द्वारा और आयत अर्थात् चरणों को ऊपर
ले जाकर गिराते हुए तथा कुटिल गति से घुमा कर। इसमें उत्क्षेपण के
समय उन्नत और पात के समय नत रखा जाए। भ्रश्यतः—गिरने वाले
की, जो कि अनजाने में नीचे आ रहा हो। अपविद्धभुज-जिसमें दोला के
आकार में भुजा जल्दी २ गिरती हो।
६६-६८. अर्थवश = प्रयोजन के अनुकूल मान कर अवतरण किया जाए।
इसमें नदी या जल में अवतरण (में उतर रहे हों) जैसा वर्णित क्रियाओं में
अभिनय कर शरीर को ललित अंगक्रिया द्वारा उतारे।
१०१-१०३. तैरने की प्रक्रिया जल के प्रमाण की अपेक्षा से की जाए
अर्थात् जब पानी थोड़ा हो तो वस्त्रों को ऊपर लेकर तथा अधिक
जल में पाणि के द्वारा विचित्र रूप में जल को हटाते हुए गति रखे। इसमें
पताक तथा सर्पशीर्ष हस्त से उपलक्षित गति रखी जाती है।
१०३-१०४. वैसे अपनी जानकारी या इच्छा में तैर कर मनुष्य चलते
हैं किन्तु कभी कभी-कभी तेज प्रवाह में बिना इच्छा के भी जल में बहते हुए
चला जाता है या जल बहा कर ले जाए तो ऐसी स्थिति में गति दिखलाते
हैं—'प्रसार्य' इत्यादि से। एकैकं—अर्थात् क्रमशः। ऐसी गति में सभी अंगों
में आकुलता तथा मुख को तिरछा घुमा कर (आधूत) रखा जाता है।
अन्य आचार्य पारी पारी से पार्श्व परिवर्तन के द्वारा भी इसे दिखलाने की
बात कहते हैं परन्तु इसमें पार्श्वपरिवर्तन नहीं होता वह तो स्वेच्छा से जल
में तैरने के समय ही सम्भव रहता है।
१०५-१०७. जल के प्रसंग में नौका की एवं नौका में बैठे हुए पात्र की
गति भी—'नौस्थस्यापि' के द्वारा बतलाते हैं।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३३
१०८-१०६. इस प्रकार देश की अपेक्षा से गति बतलाई गयी तथा
नागादि के प्रसंग से सर्प-गति भी बतलाई ।
११०-१११. अवस्थाभेद से गति निरूपण के प्रसंग में विट की गति
बतलाते हैं—'विटस्यापि' इत्यादि से । सौष्ठव जो अपनी प्रकृति के
उपयुक्त हो ।
११२-११३. कञ्चुक के योग्य वृत्ति को जो अपने लिये चाह कर
लेता है इस विग्रह से कञ्चुक पद से क्यच् तथा 'क्वचि + च' से ककार
को ईकार युक्त कर कञ्चुकी शब्द निष्पन्न होता है । वय एवं अवस्था के
विभाग को विचार कर यह विवरण दिया गया है जिसका अभिनय में प्रयोग
किया जाता है ।
११४-११७. विष्कम्भनकृतप्राण-विष्कम्भ अर्थात् स्थैर्य, वह जिसे हो
या ऐसी दशा में यष्टि आदि से प्राण बल को जिसने समन्वित किया हो—
ऐसी गति ।
११८. विकूणन, सङ्कोचन, विमर्दन इत्यादि मिश्रित क्रियाओं को लिया
जाए पथिक की गति में ।
११९-१२०. स्थूल अर्थात् महाकाय या मोटे आकार का व्यक्ति जिसे
थोड़े से श्रम से थकावट आ जाए तथा पसीना आने लगे ।
१२१-१३०. पैरों की विपर्यय गति के साथ चेष्टा के साथ तदनुकूल
हाथों की गति, स्थिति भी रखी जाती है ।
१३१-१३४. 'कुहक' शब्द का कुछ आचार्य अधम-लिङ्गी (नीच साधु)
अर्थ करते हैं । 'कुहना' पाठ के अनुसार अर्थ होगा जो दम्भी या ईर्ष्यालु
है । (मेदिनी कोष भी इसका—'कुहना दम्भचर्यायामर्ष्यालौ कुहनस्त्रिषु'
के द्वारा समर्थन करता है) । पैर में कांटा या क्षत हो जाए तो ऐसे
(लंगड़े) पात्र की गति या पंगु की गति का 'अग्रतलसंचरपाद' से अभिनय
दिखलावे । अन्य आचार्यों ने यहाँ नर्कुट की योजना भी दिखलाई है ।
१३७-१४२. विदूषक की गति बतलाते हैं—'विदूषकस्यापि' इत्यादि
से । असम्बद्ध प्रभाषण अर्थात् निरर्थक या अनुचित भाषण । जब ऐसा
पात्र रंगमञ्च पर आता है तो अङ्गहास्य होता है। यहाँ प्रवेश पद से
नाट्य में ही रस है, लोक में नहीं; यही दिखलाया गया है । इस प्रकार
तीन हास्यों में में से कहीं पर एक प्रकार का, कहीं दो तथा कहीं तीनों
प्रकारों का आश्रय लिया जाता है । इस क्रम में विदूषक को अपने
स्वामी राजा, अमात्य या श्रेष्ठो की प्रकृति को समझते हुए विभागशः इसे
२८ ना० शा० द्वि०
प्रस्तुत करना चाहिए परन्तु राजा आदि की अनुपस्थिति में इसका अश्लील
भाषण करना अनुचित है।
१४३-१४६. इस प्रकार गति के उपयुक्त तथ्य को दिखला कर अब
उसकी—'स्वभावजायाम्' इत्यादि से गति बतलाते हैं। इसमें विलम्बित
लय, ताल में लघु, गुरु तथा प्लुत सभी रखे जाते हैं, जब कि अन्यत्र द्रुतलय
के नहीं होने से तथा प्लुत के कालमान के प्राचुर्य से शोकादि के प्रसंग में भी
स्वभावजा गति होती है। गति में गर्वात्मक विकृति भी अलाभलाभ पद से
दिखलाई गयी है। भुक्त पद से उपयोग में लिये गये वस्त्र, भूषा आदि को
संकेतित किया गया है। भयादि में परितः परिक्रम होता है।
१४८-१५१. अपने संभाषण व्यवहार में 'शकार' के अधिक प्रयोग करने
वाला अभिनेता 'शकार' कहलाता है या फिर शकार से उपलक्षित शकादि
जनपद का निवासी भी 'शकार' है। अन्य आचार्य शकार उसे मानते हैं
जिसे उत्तम पद मिलने पर भी उसकी आशय या भावना सदा हीन बनी
रहे। इस विषय में अध्वरहार का एक प्रसिद्ध कथन इस प्रकार है :—
प्राकृतेऽपि शशकारस्य विभूतिर्न प्रसिद्ध्यते।
तद्विभूतिरपभ्रंशे तापस्येव प्रकाशिता॥
[ शकार की विभूति प्राकृत भाषाओं में प्रसिद्धि की हेतु या उसका
आधार नहीं होती परन्तु शकार की यह बहुलता अपभ्रंश भाषा में ताप की
तरह ( ही ) प्रकाशित होती है। तात्पर्य यह कि अपभ्रष्ट पात्र होने से
शकार अपभ्रंश भाषा के ही उपयुक्त होता है।]
इस प्रकार जो उच्च श्रेणी के व्यक्तियों के सम्पर्क एवं ( धन )
विद्या एवं बुद्धि शून्य पुरुष हो, वही शकार होता है। यह अपने वस्त्र,
आभरण के स्पर्श एवं आलोकन में गर्व का अनुभव करता है तथा आर्यजाति
का नहीं होता। म्लेच्छों की जातियों का वर्णन स्वतन्त्र रूप में आगे किया ही
गया है।
१५३. रीछ तथा वानर जाति में जाम्बवान्, सुग्रीव, अङ्गद एवं हनुमान
आदि की जो गति हो उसे स्वजाति के अनुसार रखना चाहिए।
'प्रभविष्णुना'—पद से नरसिंह आदि अवतार के प्राधान्य के अनुरूप गति को
सूचित किया गया है। 'तस्यैव' पद से आलीढ़ स्थान के अनुगत शरीर के
अवयवों द्वारा बायी ओर से गमन किया जाना चाहिए।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३५
१७१-१७६. प्रकृति संस्थिताम्-यह सामान्य या सहज स्थिति में कहा
गया है किन्तु प्राथम्य या प्राधान्यतः जब कोई गति हो तो उसे भी सम्पन्न
किया जाए इसे 'कृत्वावहित्थम्', इत्यादि से भी कहा गया है। बाहर की
ओर (अर्थात्) कनिष्ठिका अंगुलि के क्षेत्र में वामभुज को लताख्य दशा
में रखे।
१७७-१७८. 'यो विधिः' इत्यादि। उसके पश्चात् 'वामवेध' को
सम्पादित करे अर्थात् एडी के समीप सूची-पाद का निपातन हो। पूर्व में रस,
प्रकृति, काल तथा देश की अपेक्षा से जो मनुष्यों की गति बतलाई गयी हैं
वे सभी गति विलासादि से युक्त रख कर वैसे ही स्त्री पात्रों में भी संयोजित
करना इष्ट है। इस सन्दर्भ में यह भी बतलाया जा चुका है कि स्त्रियों का
पादपात चारकलाओं से अधिक परिमाण का नहीं रखना चाहिए। षट् या
अष्टकल से यह भी यहाँ सूचित किया गया है कि इससे अधिक परिमाण
पुरुषों के लिये भी न रखा जाए क्योंकि जब षट्कलाओं का ही निषेध किया
गया है तो फिर अष्ट कलाओं की तो संगति ही नहीं बैठेगी।
१७६-१८१. यहाँ स्थानीया पद से मध्यम अवस्था वाली युवति का
संकेत है अतः प्रकृत में मध्यम प्रकृति को उद्देश्य करके ही यह विधि दिखलायी
है। आद्य अर्थात् दक्षिण पाद। इसे परिवाहित भी नहीं किया जाए।
१८२-१८३. विभाग के अनुसार अधमपात्रों की गति में प्रेष्याओं की
गति उद्भ्रान्तगामिनी अर्थात् मद विकार से युक्त रखनी चाहिए। 'आविद्ध-
भुज-विक्रमा' अर्थात् बाहुओं का क्रम वर्तना बहुल रहना चाहिए।
१८४-१८६. 'नार्या अर्धम्' नारी के आधे इस प्रकार भाग की विवक्षा में
यहां 'अर्ध नपुंसकम्' से समास हुआ है। नारी की प्रकृति का आधा भाग ही
यहाँ अनुकृत रहने से इसे (नपुंसक को) तृतीया प्रकृति भी कहा जाता है।
तब पुरुषों की गति में उदात्तत्व तथा स्त्रियों की गति में ललितत्व या सौन्दर्य
रहेगा। इनमें गति का परिमाण चार ताल तथा चार कलाएँ होता है।
अनुत्तम स्त्रियों की गति का मान द्विताल तथा द्विकला है। इससे भी आधा
प्रमाण कर्म-कर भृत्यों और अधम पुरुषों का अर्थात् एक ताल और एक कला
प्रमाण रहता है। इस प्रकार अनुत्तम पुरुषादि पात्रों की गति को दिखला कर
मध्यम तथा उत्तम पुरुषों की गति एवं चेष्टा की अनुगामी ही उत्तम, मध्यम
एवं अधम स्त्रीपात्रों की तथा भृत्यों की गति में चेष्टाएँ रखी जाए इस तथा
को 'उत्तम' पद से संकेतित किया गया है।
४३६ नाट्यशास्त्र
१८७-१८८. जहाँ उत्तमादि की स्थिति उद्भिन्न नहीं हुई ऐसे पात्रों को
दिखलाकर विवरण का सर्वग्राहत्व दिखलाने की भावना से—बालानाम्,
इत्यादि से 'बालकों' की गति बतलाई गयी है।
१८६-१६१. 'तद्भावगमनादिति'—जो पुरुष जिस रूप को ग्रहण करता
है उसकी वैसी ही गति (स्वभाव के अनुरूप) रखी जाती है। परन्तु विपर्यय
विशिष्ट-कारण या स्थितिवश होता है—जैसे व्याजादि से। ब्याज = छल।
किसी उद्देश को सिद्ध करने के लिये छल का प्रयोग किया जाता है, इसे भ्रम
उत्पन्न करने के लिये, क्रीड़ा में तथा वञ्चना के लिये प्रयुक्त करते हैं। अपिच
पद से स्त्री और पुरुष का नपुंसक से तथा नपुंसक का स्त्री या पुरुष से
विपर्यय हो जाता है यह दिखलाया गया है। इसी विपर्यय दशा में गति के
विपर्यय में सञ्चारी तथा सात्विक भावों के तथा उपाङ्गादि अभिनयों में होने
वाले विपर्यय भी--'धैर्यौदार्येण' इत्यादि से बतलाये गये हैं। यहां सामान्य
अभिनय में उक्त धैर्य एवं औदार्य का ग्रहण समझना चाहिए तथा इनसे अन्य
भावों का (भी उपलक्षण है यह भी। यथा 'बुध्यापद से-स्थायी भाव का,
सत्व से सात्विक भाव का, कर्म से स्थानकादि विषयक अनुभावों का, वेष से
आहार्य (वेष भूषा के) प्रकार का, वाक्य से संस्कृतादि भाषाओं के वाचिक
प्रकार का चेष्टित से त्रिपताक आदि शारीर का उपलक्षण से ग्रहण समझना
चाहिए।
१६६-१६८. जैसे स्थानक गमन आगे पीछे होता है वैसे ही उपवेशनात्मा
आसन में भी पूर्व-पश्चाद्-भाविता रहने से उसे भी बतलाया जा रहा है—
'अथासन' इत्यादि से। तथैव--अर्थात् जैसे गति में पूर्व पश्चाद् भाव है वैसे
ही शयन और तदाश्रय, आसन आदि में भी। विष्कम्भ अर्थात् वैशाख-स्थानक
के उचित प्रसार से अञ्चित अर्थात् सुन्दर पाद, अतः यहाँ अञ्चितपाद का
लक्षणानुसारी स्वरूप इष्ट नहीं है। स्वस्थ पुरुष के आसन पर बैठने पर त्रिक
उन्नत रहती ही है। यहाँ दोनों हाथ कटि तथा ऊरू पर 'कर्कटमुद्रा में रखे
जाएँ।
१६६-२०० संप्रणष्ट विशेषण केवल इन्द्रियमात्र से सम्बद्ध है, उसे मन के
साथ लगा कर 'आकुल' अर्थ करते हैं। शोक की दशा में 'आकुल-मन' से बैठा
जाए। अपायाश्रयाश्रितः—अपने आश्रित का या किसी वस्तु का सहारा लेकर
रहना। उपवेशयेत्—यहाँ स्वार्थ में णिच् है। अतः कर्ता मात्र यहाँ विवक्षित
है। अन्य आचार्य कहते हैं कि जब वह इस स्थिति मे अपने बाहुओं को फैला
दे तो उसे विश्राम हेतु बिठवा दे।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३७
२०१-२०२. अंगो के पिण्डीकृतत्व में जानुओं के विश्लेष से घुटनों और
शरीर के ऊपरी भाग का मेल हो गया होता है तथा उसे विघटित कर देने
पर घुटने अलग होकर ऊर्ध्वकाय टेड़ा हो जाएगा । ऐसी स्थिति उत्कटिक
स्थान कहलाती है। इसमें घुटनों का विरलत्व और स्फिक् का भूमि से
स्पर्श रहता है। पूर्व पिण्डितांग दशा से यह भिन्नता ही यहाँ वैलक्षण्य
दिखाता है। निवाप = पितरों का तर्पण । सन्ध्या शब्द से सन्ध्या के योग्य
जप तथा ध्यान का ग्रहण है।
२०३-२०६. विष्कम्भितम्—एक जानु को भूमि पर फैलाकर दूसरे को
यथास्थित रखना । होमादि के करने में मन्त्रादि का उच्चारण भी किया
जाए। शोके च तथा नीचानां—का प्रकृत में सभी स्थान पर सम्बन्ध समझना
चाहिए ।
२०६-२१४. आसन सन्निवेश के प्रसंग में सभी के लिये आसन विधान
बतलाया जाए अतः इसे—'तथासन' इत्यादि से दिखलाते हैं। बाह्य-सभी
व्यक्तियों के उपयुक्त तथा आभ्यन्तर—राजा के योग्य इनका विधान ।
मुण्डासन—गोलाकार चतुरतापूर्ण रचना का आसन । मसूरक—आराम से
बैठने लायक आसन । काष्ठासन—पट्टासन या लकड़ी का पीठक (या स्टूल
जैसी कुरसी) । एवं पद का अभिप्राय है राजा की सन्निधि में। यह
आभ्यन्तर विधि है । अन्यकालों में इच्छानुसार आसन रखे जा सकते हैं इसी
तथ्य को 'स्वगृहवार्तायाम्' इत्यादि से कहा है। तथा पद से सेनापति का
अमात्य के घर जाना जैसी व्यक्तिगत सम्बन्ध की स्थिति दर्शायी गयी है।
२१५-२२०. अपेक्षित नियमादि से युक्त मुनिजन के रहने के कारण
उनके नियत आसन पर ही बैठने का विधान है जो उनके व्रतादि को ध्यान में
रखकर रखा जाता है। स्थानीय अर्थात् आश्रमादि (स्थान) में निवास
करने वाले वृद्ध या पूज्यजन । आसनसत्कार—आसन पर बैठने का निवेदन
कार्य । आसन के विषय में, विभाग की अन्य बात भी—'समे' इत्यादि कारि०
से कही है। सम—जो जाति एवं विद्या में तुल्यता रखता हो । आसन चार
प्रकार के होते हैं—सम, मध्य, उच्च या अतिरिक्त तथा भूमि । मध्यम—
कुछ कम या आसन के प्रमाण में थोड़ा न्यून । हीन—अपनी अपेक्षा से
अधम । भूम्यासन—यहाँ बैठो कह कर निर्देश्य भूमि को बैठने हेतु दिखलाना
यह हीन या अधम जैसे पात्रों के लिये उपवेशन स्थान है।
४३८ नाट्यशास्त्र
२२१-२२७. अब आगे शयन के विभाग पूर्वक सन्निवेश को दिखलाते
हैं—‘आकुञ्चित’ इत्यादि से। वह स्थिति जो अपने शरीर के तिरछे रखने
पर रहे। पूर्वकाय अर्थात् शरीर के ऊपरी भाग के पास किसी इष्ट जन के
बैठने पर बाहुओं के फैलाने में ‘विक्षेप’ होता है तथा शयन पर अन्य जन के
बैठ जाने पर भी ‘विक्षेप’ होता है। शरीर का तिरछा रखना ही ‘आकुञ्चित’
है। इसी प्रकार आगे सभी स्थितियों का स्पष्ट विवरण है।
२२८. अर्थवशेन—व्यवहार के आधार पर तदनुरूप। इस अध्याय के
उपसंहार के साथ अगले अध्याय के प्रारम्भ की संगति के लिये कहते हैं—
‘अतः परम्’ इत्यादि से। रंग में घूमने का निरूपण गत्यध्याय में किया था
उसका कक्ष्याविशेष के विभाग में विशेष उपयोग को अगले अध्याय में कहेंगे।
इति शिवम्।
चतुर्दश अध्याय
(कक्ष्या, परिधि तथा लोकधर्मी निरूपण)
१. 'तु' शब्द से द्वितीयाध्याय में पूर्व में (बहुत पहिले) कही बात को
पुनः संकेतित किया गया है। मण्डप के विशिष्ट भाग रंगपीठ को विभाग
पूर्वक समझ कर (विज्ञाय) कक्ष्या एवं गति के उपयोगी विशिष्ट स्थानों
का प्रयोग किया जाता है। नाटकीय प्रदेशानुसार प्रकोष्ठ को छोड़ते हुए जो
स्थान बचता है उसी में चतुरस्र योजना की जाती है। अतः कक्ष्या के वाम
तथा दक्षिण (बाजू के) भाग में कुतपों (आर्केस्ट्रा) की स्थापना की जाती
है तथा शेष भाग में कक्ष्या का विभाग रखते हैं।
२. रंगमण्डप के कौन (से) विभाग में कक्ष्या हो इसके उत्तर में कहते
हैं—'यो नेपथ्य' इत्यादि से। नेपथ्यगृह और उसका द्वार आदि द्वितीया-
ध्याय में कहे हैं। आतोद्य के बिठलाने पर जो प्रदेश बचा रहता है उसी
रंगपीठ के प्रदेश में पात्रों के निष्क्रम एवं प्रवेश के लिए गति के उपयोगी
स्थान विभाग का निर्देश करना चाहिए।
३. स्थान विभाग कहाँ हो इसके उत्तर में बतलाते हैं कि जिससे प्रवेश
हो उसे 'परिक्रम' कहते हैं। जहाँ चारी आदि का सन्निवेश हो उस रंगपीठ के
स्थान को (स्थान भेद से) छोड़ा नहीं जाता है (अर्थात् यही कक्ष्या-प्रदेश
होता है)। परिक्रम से स्थान भेद हो जाता है—जैसे ऊपर चढ़ने के गात्र को
सम्हालना, अतिक्रान्त पद से गति रखना—जैसे स्थलों में इसी स्थान भेद से
आरोहणीय स्थल की प्रासाद या पर्वत रूप स्थिति को दिखलाया जाता है।
४-६. रङ्गपीठ पर क्रम विशेष एवं स्थान भेद की कल्पना से कक्ष्या-
विभाग के विशिष्ट देश में भिन्न स्थानों की रचना मान ली जाती है, उन्हें
रचनाकार आदि को स्मरणार्थ (ही) उपलक्षण द्वारा बतलाया (लिखा)
गया है। यद्यपि पृथ्वी आदि सभी स्थानों को एक ही शब्द 'त्रैलोक्यम्' से
कहा ही गया है फिर भी स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल के भेद से गृह, प्रासाद,
पर्वत का कथन वर्णनोद्देश्य के लिये पृथक्-पृथक् वर्णित हुआ है।
७. इसी त्रैलोक्यवर्ती देशों के पृथक् वर्णन को दिखलाने के लिये—'नगरे'
इत्यादि से यहाँ कहते हैं। यहाँ अटवी पद से ग्राह्य उद्यान, आराम,