नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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गया था उसकी अब परिकर सामग्री बतलाते हैं—'व्यायाम' इत्यादि से। यहाँ
व्यायाम पद का अर्थ अंग विषयक प्रशिक्षण एवं अभ्यास के उपयुक्त काल है
जिसके परिणाम स्वरूप द्रुत, मध्य एवं विलम्बित चच्चत्पुटादि ताल के अंग का
(यहाँ) पठन किया गया है। (उसका अनुगमन कर के ही शारीर चेष्टाओं
को युद्धादि प्रसंग में प्रदर्शित करना अभीष्ट है)।
६०-६१. सन्नगास्त्र = जिसका शरीर थक गया हो तथा विश्रान्ति ग्रहण
कर रहा हो। कूर्परांसशिरः = कूर्पर (कोहनी), अंस (कन्धे) तथा शिर—
ये सभी अंगों का प्राण्यङ्ग होने से यहाँ एकवद्भाव हुआ है।
६२-६३. चतुरस्रता :-- जिसके लिये सौष्ठव का विधान किया जाता
है। यहाँ कटिनाभिचरौ पद से आशय है कि कटि और नाभि पर हाथ क्रमशः
तथा एक साथ भी स्थित रखे जायें।
६३-६५. खड्ग युद्ध में जिन न्यायों को बतलाया वे ही धनुर्युद्ध में भी
होते हैं, अतः धनुर्