नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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रहती है। स्वच्छन्दगमन = बिना किसी लक्ष्य के या कार्य के क्रीडा करते हुए
चलना। पादपात भी जिस गति में जैसा कलान्तर का परिमाण बतलाया
हो वैसा ही रहना चाहिए। यह बात आगे इसी अध्याय में कही भी जा रही
है। अभिनय के दौरान स्त्री-पात्रों से छः या आठ कलाओं तक के पादपात
नहीं करवाये जाने चाहिये क्योंकि देर तक ऐसा करने पर उन्हें थकावट
(खेद) हो जाएगी। विषम संख्या के किसी विशेष परिमाण में पादों का
उत्क्षेप तथा निपात का योग नहीं बनता अतः साम्य या सम संख्या ही
आचार्यगण यहाँ उचित समझते हैं।
३६-३६. पूर्व में कलागत आधिक्य दिखलाया गया था। इसके विपरीत
कलागत न्यूनता भी होती है—यह तथ्य अगली-'अस्वस्थकामिते' इत्यादि
से कहा गया है। अस्वस्थ = प्रच्छन्न । कामित = कामुक । बान्धव आदि के
अनिष्टश्रवण के बाद उनके समीप शीघ्र जाना अभीष्ट होता है, इसी तरह
अद्भुत पदार्थ के दर्शन में भी (मन में) उतावलापन रहता है तब कलाओं में
न्यूनता रखा जाना उचित हो जाता है। आत्ययिक = अवश्यकर्तव्य कार्य।
शत्रु और अपराधी के ढूंढ़ने या पकड़ने में भी इसी प्रकार विकला (जिसमें
कला का चार से आधा परिणाम या कम हो) की योजना रखी जाती है।
'विकला' पाठ में अर्थ है अर्धकला रहित चतुर्थी कला। इसी कारण
'चतुरर्धकलं' कहा भी है (जो संभ्रम, उत्पात आदि के प्रसंग में कहा था।)
कलाओं के परिमाण का यह विधान या नियम उपयोगी (होता) है तथा
इसका उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों में प्रयोग भी किया जाता है। अतः
नियम की व्यावहारिकता भी है तथा महत्त्व भी।
४०-४४. इस प्रकार प्रकृतिभेद से गति का विवरण देकर रस में गति
को दिखलाने की भावना से तथा पुरुषार्थ में उपयोगी रसों में शृंगाररस के
प्रमुख होने से उसी की गति बतलाई जा रही है—'गतिः शृङ्गारिणी'
इत्यादि से। स्वस्थकामित = प्रकट कामुक या प्रेमी। यहाँ 'सूचा' का पुनः
कथन आकर्षक पदार्थ के अतिशय चमत्कारी होने से पर्यालोचन के निरूपणार्थ
है अर्थात् शृङ्गार में 'सूचा' की योजना आवश्यक समझी जाए।
(सूचाभिनय का स्वरूप ना० शा० २४।४४ पर है। जिसे टिप्पणी०
पृ० १३६ पर दिया गया है।) उस सूचा से भी अन्तरङ्ग प्रकृत में गति
निरूपण है इसलिये इसे यहाँ दिखलाया गया। यहाँ पर सौष्ठव से अङ्ग की
चतुरस्रता तथा उससे युक्त लय, (विलम्बित आदि) ताल सभी सामान्यरूप
में होना चाहिए।