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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 536

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२५
हो जाए। यहाँ 'यथामार्गरसोपेतं' के स्थान पर 'यथामार्गकलोपेतम्' पाठ भी
मिलता है। इसका अर्थ है कि मार्ग अर्थात् चित्र आदि में जो दो, चार, आठ
मात्राओं की कलाएँ होती हैं उनसे उपेत अर्थात् युक्त होना चाहिए।
४-५. विकृष्ट, त्र्यस्र एवं चतुरस्र इन तीन स्थानों में त्र्यस्र में वैष्णव
स्थान जिसमें एक पक्ष या बाजू समान या बराबर और दूसरा समुन्नत रहता
है। प्रसन्न—अर्थात् अपने प्रवेश के समय ही सन्न अर्थात् अचल। स्वस्थ
मयूर सदृश सुन्दर सिर जिसमें हो उसी प्रकार ग्रीवा प्रदेश रखना चाहिए।
६-७. यहाँ 'नाभिसंस्थ' पद से चतुरस्र का संकेत है। अतः नाभिस्थित
दक्षिण खटकामुखहस्त और कटिस्थित वाम अर्धचन्द्र हस्त (का प्रयोग)
अभीष्ट है यह यहाँ दिखलाया गया है।
८-१०. गति के बाद क्रमप्राप्त एवं उचित होने से स्थान (स्थिति)
को दिखलाने हेतु 'पादयोरन्तरम्' इत्यादि से पूर्व अध्याय ११।५२ में दर्शित
स्थानक को प्रस्तुत करने के बाद गति का उपक्षेप किया गया है। इसे देश
तथा काल को दिखलाने वाले लक्षणों के (जिन्हें इसी अध्याय में कह रहे हैं)
अनुरूप किया जाए। ताल-फैलाई गई अंगुलि और अंगूठे के बीच की लम्बाई
या प्रदेश हो वह ताल कहलाता है, जिसे बालिश्त कहते हैं। (अर्थात् एक
ताल = एक बालिश्त)। यह ताल अभिनेता के अपने हाथ के प्रमाण से रख
लेना चाहिए। यह गति की स्थिति या डग रखने की पृथ्वी पर की दूरी
(देश) चार, दो तथा एक ताल की होती है। यहाँ उत्तमादि प्रकृति के
अभिनय की अपेक्षा से क्रमशः ऐसी संख्या को लिया गया है। यह
विनियोजना उत्तम प्रकृति के पात्रों की चार ताल, मध्य पात्रों की दो ताल
तथा अधम पात्रों की एक ताल के प्रमाण पर की जाती है। इसे शोभाधायक
या नाट्यधर्मी प्रकार से मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उत्तमादि
पात्रों में क्रमशः तालों का ह्रास स्वभावतः होता है।
११. देश के नियम के पश्चात् इसमें समय का मान भी नियत होता है।
इसमें पैर को उठा कर रखने के समय में भी इसी प्रकार उत्तमप्रकृति के लिये
चार कलाएँ तथा इनसे आधी-आधी मध्यम एवं अधमों के लिये नियत हैं। पाँच
निमेष की एक मात्रा होती है, इस सामान्य लक्षण से यही सूचित होता है कि
सर्वत्र ध्रुवक के प्रमाणानुसार पैर को रखने में चार कलाएँ आवश्यक हैं।
कोहलाचार्य ने इस प्रसंग में उत्तमादि पात्रों के लिये द्विपदी आदि का भी
विधान बतलाया है जिसे विस्तारभय से यहाँ नहीं दिया जा रहा है। यहाँ