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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 668 में से

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४३० | नाट्यशास्त्र

मध्यमपात्रों की इसी क्रम में रहनेवाली गति में भी अनुकूल संचारी (आवेग
आदि में) भाव में यही गति होती है। इसमें इधर उधर चलने में व्याकुल
एवं द्रुत बहुल पादविक्षेप होते हैं। अद्भुतरसत्व को प्राप्त होनेवाले विस्मय
स्थायी में उत्तमपात्र की स्वच्छन्द गति बतलाई जा चुकी है, परन्तु यहाँ वदन
में राग लालिमा उत्पन्न हो जाना विशेष रूप में होता है। (तथा इस
विस्मय में आवेग सदृश ही पाद विक्षेप द्वारा गति भी रखी जाती है)
६०-६१. स्मित से अतिहसित तक उत्तम हास्य है। इसमें उत्तम पात्र की
गति स्वस्थ होती है किन्तु यहीं अपहसित एवं अतिहसित वाले मध्यम पात्र
की गति विक्षिप्त रखी जाती है। 'अन्यच्च' पद से विदूषक की गति के
विषय में आगे बतलाये जाने वाले विवरण का संकेत दिया गया है। यहाँ
केवल प्रसङ्गवश हास्यगति द्रुत बतलायी गयी है।
६१-६४. अब करुणरस की गति—'पुनश्च करुणे' इत्यादि से बतलाते हैं।
यद्यपि 'ज्वरातें' (ना० शा० १३।३५) इत्यादि से करुण में स्तोकगति को
(इसी अध्याय में) बतलाया जा चुका है परन्तु कुछ अन्य बातें भी और है
यह 'पुनः' शब्द से दिखलाया गया है जिन्हें आगे कहेंगे।
६५-६७. प्रहार लगने पर करुणरस में होनेवाली गति में 'चूर्णपद'
का विधान है अर्थात् पैरों को ऊपर थोड़ा उठाये तथा बड़े जोर से नीचे
पटके। इस क्रिया में 'अध्यर्धिका' से चूर्णपद में स्वतः अन्तर हो जाता है।
६७-७०. शीत या वर्षा से अभिभव होने पर अब गति को बतलाते हैं—
'शीतेन' इत्यादि से। मध्यम तथा उत्तम पात्रों की शीतादि में होनेवाली गति
अनुभावों से शून्य भावों के द्वारा सूचित की जाती है। 'च' पद से शरीर के
अवयवों का कम्पन के अतिरिक्त संकोचन कार्य भी लिया जाए। 'एव' शब्द से
यहाँ 'सौष्ठव तथा चतुरस्र' की योजना का निषेध किया गया है। 'करौ' से वे
हाथ यहाँ अपेक्षित हैं जो कटि के ऊपर पटके जाएँ। इस स्थिति में शरीर
को सिकोड़ कर और हाथों को छाती पर रख कर लोक प्रसिद्ध या प्रचलित
गति का ही अभिनय किया जाए जिसमें ओठ, दांत और चिबुक का कम्पन
एवं शरीर का कुञ्चन का भाव भी लोक प्रचलित रूप में ही प्रस्तुत
होता हो।
७१-७६. शृङ्गार तथा करुणरस की गति के प्रसंग से शीत एवं वर्षा में
होने वाली गति का भी निरूपण करके बाद में 'भयानक रस' में गति को
बतलाते हैं—'तथा भयानके' इत्यादि से। सत्ववर्जिता = जिनको अपने