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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 668 में से

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मध्यमध्य में स्थान; फिर उनमें भिन्न-भिन्न क्रियाएँ या चेष्टाएँ तथा उनमें भी
विश्राम की कल्पना के लिये विराम-स्वरूप मात्रा की कल्पना की गयी है।
इसी मात्रा की कल्पना के आधार पर चतुष्कला आदि का विधान रहता है
तथा यही तथ्य मुनि ने उपर्युक्त विवरण से सूचित भी किया है।
१२. यह समय के लय विषयक (मान का) नियम दिखलाने के लिये
कहा गया है। स्थित = (अर्थात्) विलम्बित लय। इसे प्रकृति आदि के
विभाग के अनुसार ठीक से विचार कर प्रयुक्त करे। यहाँ आदि पद से देश,
काल, अवस्था तथा रस को ध्यान में रखना भी अपेक्षित है। जैसे-धीरता के
कारण विलम्बित लय तथा इसके अभाव में कभी मध्य तथा कभी द्रुत लय का
होना। क्योंकि यह भी देखा गया है कि उत्तम जाति होने पर भी उसका
भाव अन्यथा रहता है अत यह प्रकृतिविभाजन है जात्यादि कृत विभाजन नहीं।
१३. लयत्रय का यह प्रयोग सत्व के कारण होता है। सत्व से आशय है
चित्तवृत्ति। अतएव संग्राम आदि के अवसर पर उत्तमपात्र की भी द्रुतलय
में गति रखी जाती है तथा शोकादि के अवसर पर अधमपात्र की भी
विलम्बित लय में गति रहती है।
१४. देश, काल आदि के नियम के अनुसार पात्रों के गतिगत विशेषरूप
या विचित्रता को दिखला कर अब विशिष्ट विवरण देने के भाव से मुनि
उनको बतला रहे हैं जिन्हें पूर्व में सामान्यरूप से कहा था।
१५. यहाँ 'तु' शब्द विशेषता के द्योतक रूप में प्रयुक्त है। अतः मन्थर
गति में चार ताल, स्वभावगति में तीन तथा दीप्तगति में पाँच ताल भी रखे
जा सकते हैं—(यही इस "तु" के द्वारा सूचित किया गया है)।
१६-१७. पार्श्वक्रान्तैः इत्यादि से कुञ्चितपाद में पार्श्वक्रान्ताचारी के
स्वरूप को दिखलाया गया है। (द्र० ना० शा० ११।३२) रंगकोण
अर्थात् प्रेक्षागृह के (रंगस्थल के) उत्तर-पूर्व कोण में तथा द्वितीयकोण
अर्थात् उत्तर-पश्चिम कोण में। तत परं=अन्य (शेष) दो कोणों में।
१८-१९. 'वामवेध' का अर्थ है पार्ष्णि क्षेत्र में एडी पर सूचीपाद का
निपात या प्रक्षेप करना। पञ्चपदी गमन स्वाभाविक गति में होता है। गति
की सिद्धि होने पर रंगकोणों में जाने के समय ब्रह्म स्थान का उल्लंघन नहीं
किया जाए यह ध्यान देने की बात है। मूल में 'पादानामेक विंशतिम्'
अर्थात् इक्कीस डग की जो बात कही है वह प्रत्येक कोण में पञ्चपदी गमन
करने पर (४ × ५ = २०) बीस ही होते हैं इक्कीस नहीं। परन्तु इसे
आचार्य की आज्ञा मान कर यहाँ यथाशक्य निर्वाह होगा संगति न बैठने से।