नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२७
२०. यहाँ 'भरत' शब्द भरत से प्राप्त शास्त्र शिक्षा वाले एवं भरत की
सन्तति से सम्बद्ध नट की सूचना देता है । परिमित दिशा में पञ्चपदी का
नियम है अतः एक ही स्थान पर पादों के दो दो विक्षेप करना चाहिये ।
विकृष्ट में बार २ पञ्चपदी हो सकती है इस विषय में भिन्न प्रमाणों में दी
गई गति की रीति या विवरण ही प्रमाण है ।
२१. मिश्रगतियों के विषय में विशेष बात कहने की भावना से
'समगति' का उपसंहार किया गया है—'यः समै' इत्यादि से । तथैव-अर्थात्
समानता से ।
२२. मिश्रगति को बतलाते हैं—'अथ' इत्यादि से । परिवारितः = जो
( उत्तमरूप आदि से ) विवक्षित हों ऐसे पात्रों से युक्त । इस समय उत्तम
की चार कलाएँ, मध्यम की दो तथा अधम पात्र की एक कला प्रमाण का
पाद पात रहे ।
२३. यहाँ कला के चतुस्तालादि विभाग को निश्चय करने के लिये विशेष
कहा गया है—दैत्य दानव आदि ।
२४. सभी अर्थात् देवदूत आदि उत्तम पात्र । उद्धत देवपात्र जैसे
मातलि प्रभृति ।
२५-२६. राजा भी देवांश से उत्पन्न होने वाला व्यक्ति है क्योंकि शास्त्र में
इसे लोकपालों के अंशों से उद्भूत माना गया है । (द्रष्ट—'अष्टाभिर्लोकपालानां
मात्राभिर्निर्मितो नृपः') इत्यादि ( मनु० ) । इसी कारण इनका प्राधान्य
होता है । यही तथ्य गीता में भी—'राजविद्या राजगुह्यम्' इत्यादि से कहा
है । अयं = चतुष्कल इत्यादि । स्वच्छन्द गमन = स्वस्थ स्थिति में गति ।
संभ्रम = आवेग । उत्पात = उन्माद जैसी मानसी दशा । इन दशाओं में
निश्चयपूर्वक गति में कोई प्रमाण या मान नहीं होता है ।
३०-३३. विशेष स्थिति या अवस्थाओं के बल से नियम में ( भी )
परिवर्तन हो जाता है । तब उत्तम पात्र की दों कलाएँ, मध्यम की एक तथा
अधम की आधी कला गति का प्रमाण हो जाती है । यह श्वासादि की
विश्रान्ति के साथ होता है तथा चार प्रकार से होता है और यहीं द्रुत
उपयुक्त मानी जाती है ।
३४-३५. भय से युक्त होने पर 'ऊरुस्तम्भ' हो जाता है । इसी प्रकार
विस्मय और अवहित्था अर्थात् कृत्रिम धीरता के अवसर पर भी । ऐसे
समय गति स्थित या विलम्बित लय वाली की जाए । आदर से विशिष्ट,
औत्सुक्य से युक्त शृंगार के विप्रलम्भ नामक प्रकार में भी इसी प्रकार 'गति'