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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 668 में से

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पृष्ठ 534

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १२ ४२३
६६-६७. परं चैव में 'च' पद का अर्थ 'अपि' लेना चाहिए । अर्थात्
इसके बाद भी मण्डलों का प्रयोग किया जाय । कैसे किया जाए का—उत्तर
है समचारी से । अर्थात् पारस्परिक योजनां से प्राप्त चारियों का ( औचित्य
या अपेक्षा के अनुसार ) यहाँ वहाँ सर्वत्र प्रयोग करना चाहिए ।
आचार्यात् — आचार्य की बुद्धि से प्रयोग किये जाए अपनी ऊहा से नहीं ।
६८. खण्डों का भी मण्डलों के साथ रहने से प्राधान्य दिखलाया गया
है । 'वाद्येन अनुगतानि' इससे यह बतलाया गया कि यहाँ चतुर्थ अध्याय
में नृत्त के उपयोगी विषयों में प्रतिपादित गति से विपरीत या भिन्न नाटकीय
गति में मण्डलों की प्रमुखता रखनी अभीष्ट है ।