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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 668 में से

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पृष्ठ 540

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४२९
४५-४८. प्रच्छन्नकामिता—छिप कर प्रिया से मिलने या सम्बन्ध रखने
वाला। जैसे रत्नावली नाटिका में वत्सराज उदयन। इसके विपरीत सर्वलोक
समक्ष कामिता जैसे पौलस्त्य की सीता में कामिता। इस समय किसी के
देख लेने की आशंका होने से दीपक को बुझा दिया जाता है। वेलासदृश
वस्त्र—समय के अनुरूप वस्त्र या वेषधारी। यहाँ वैसे ही आभूषण भी धारण
करना उपलक्षण है। शब्दशङ्की पद से खण्डित कला की मिश्रित गति
रखने की बात भी बतलाई गयी है तथा वेपमान-शरीर से कला के चौथाई
भाग का काल भी संकेतित किया गया है !
४८-५४. विप्रलम्भशृङ्गार में संभोग शृङ्गार की तरह गति बतलाकर अब
रसत्वेन समानरूप वाले रौद्ररस की गति बतलाते हैं—‘रसे रौद्रे’ इत्यादि से।
दैत्य, दानव आदि में प्रयुक्त कहने का आशय यही है कि उनमें क्रोध के बिना
भी रौद्रता रहती है। यह बात रसाध्याय में पूर्व में कही जा चुकी है क्योंकि
इनमें एक ही रस (रौद्र) होता है। यहाँ ताल शब्द काल का प्रमाणवाची
समझा जाए। ‘तालान्तरपातित्व’ से जितने समय उत्क्षेप हो उससे न्यून
काल में पातन रहने का भी संकेत है। ‘तद्विधा’ से भीमसेन सदृश व्यक्ति
का ग्रहण है तथा युद्धवीर में भी ऐसे व्यक्ति की ऐसी ही गति रखने की बात
की सूचना भी !
५५-५७. रौद्ररस की प्राणभूता ‘उग्रता’ को बतलाने के अवसर के बीच
ही पुरुषार्थ के अनुसार प्राप्त बीभत्सगति का क्रम आगया था। जिसे—
‘अहृद्या’ इत्यादि से बतलाते हैं। अहृद्या मही = स्मशान की भूमि या जहाँ
युद्ध होने से कट-कट गिरने वाले नरदेह (कबन्ध आदि) के कारण भूमि
स्मशान बन गयी हो।
५७-५६. वीररस की गति—‘अथ वीरे च’ इत्यादि से बतलाते हैं।
‘पादविक्षेप’ का अर्थ है विस्तार से क्षेप या पाद का स्थापन करना। इससे
‘स्पन्दिता’ तथा ‘अपस्यन्दिता’ चारी का ग्रहण सूचित होता है तथा इसमें
गन्तव्य प्रदेश में शीघ्रता से आगे बढ़ कर स्थान प्राप्ति करना अभीष्ट होता
है। वीर तथा रौद्र रस में आवेग नामक भाव का स्पर्श रहने से यहाँ कभी
धीरे तथा कभी द्रुत प्रचार भी विहित माना गया है। आवेग की दशा में—
कला गत प्रमाण वाले काल के अनुगत गतिशील पैरों के द्वारा तीन पादपात
किये जाए। एक लघुपात एक दूसरे की ओर दो द्रुतपात तथा फिर एक कला
का विश्राम। यह वीर तथा रौद्र दोनों रसों में ‘गतिपरिक्रम’ होता है।