नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश अध्याय
( गतिप्रचार )
१. यहाँ 'मण्डलकल्पनं' पद से जो चारी के संयोग या मिश्रण से मण्डल
निर्मित होते हों, उनके स्वरूप की कल्पना आचार्य के द्वारा नहीं बतलाने
पर भी स्वयं लक्षणों को देख कर अपनी बुद्धि से समझ लिया जा सकता
है। यहाँ एक प्रश्न फिर भी बना ही रहता है कि जब पिछले अध्याय में
चारी के संयोग से निर्मित मण्डलों को तो बतलाया परन्तु आचार्य ने उन
मंडलों की योजना या विधान क्यों नहीं बतलाया। इसके उत्तर में यही कहा
जा सकता है कि चारीमण्डल का प्रसंग चित्तवृत्ति रूप नहीं है कि उन्हें रस
एवं भाव की उपयोगिता में बतलाया जाए। अतः रस एवं भाव के अनुसार
की जाने वाली गतियों के विनियोग बतलाये गये हैं तथा इसी कारण मुनि
ने पृथक् से इस विषय पर (अलग से या स्वतन्त्र) एक अध्याय भी रखा है।
यह गति प्रकृति या पात्र के दिव्य, अदिव्य एवं दिव्यादिव्य रूप (और)
उसकी अवस्था और देशकाल की अपेक्षा को देख कर रखी जाती है। यह
गति प्रत्येक पुरुष की भिन्न-भिन्न होती है जिसे आगे बतलाया भी जाएगा।
अतः प्रथमतः उसकी प्रक्रिया दिखलायी गयी।
२-३. अभिनय के आरम्भ में नान्दी के उपक्रम के साथ प्रयोग के
उपक्रम में कैसी गति रखी जाए। यही 'तत्रोपवहनं' से आरम्भ किया गया।
उपवहन-विधि के उपरान्त मंच पर प्रविष्ट सूत्रधार तथा उनके सहयोगी,
नट, नटी (आदि) के साथ जो अभिनेय-विषयक संवाद हों उनके बाद
क्योंकि इस के पूर्व नान्दी हो चुकी रहती है। यहाँ यही तथ्य 'ध्रुवागीति'
के हो जाने के द्वारा सूचित किया गया है। 'ध्रुवागीति' देश, रस तथा
पात्र के अनुगत विषयों में उपनिबद्ध रहना चाहिए। पट या यवनिका के
हटाने के उपरान्त पात्र प्रवेश के समय भी उपोहन क्रिया की जाए। जिसके
बीच में नटी (पात्र) का प्रवेश अंगों के वलन क्रिया के सम्पादन के साथ
रखा जाए। यद्यपि स्त्रीपात्र का प्रवेश शरीर के स्वाभाविक वलन कर्म
के साथ ही होता है। अतः उसे शब्द से बतलाने की यद्यपि आवश्यकता नहीं
है फिर भी कोहल आदि आचार्यों के मत में यहाँ ऐसी गति विहित
या इष्ट है। इस समय शुष्काक्षर गान कर समुचित स्थान, दृष्टि एवं
तत्काल उपयुक्त मुखरागादि से युक्त हो कर पात्र को प्रवेश करना चाहिए
जिससे सामाजिकों को शीघ्र ही सम्बद्ध अर्थ या विषय की प्रतीति हो जाए।
इस समय गीत भी उत्तम रखा जाए जिससे सामाजिक या दर्शक उत्सुक