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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 668 में से

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पृष्ठ 542

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १३ ४३१

कुछ शील आदि के कारण उत्तम (स)त्व के औचित्य प्राप्त होने पर भी जो
सत्वहीन अर्थात् प्राणरहित हैं—जैसे विराट् का पुत्र उत्तर । 'द्रुतैः' इत्यादि
से कोहल के द्वारा दिखलाई गई धारा-लयादि का संकेत है । अनुसरण = शत्रु
का पीछे से आ जाना । जिनमें धैर्य या पराक्रम पुनः लाया जाए ऐसी गति ।
इसका फल यह है कि इसमें बीच में हल्के और भारी पादपात भी होते हैं
जिन्हें 'आसन्नपतितैः' इत्यादि से यहाँ कहा भी गया है ।
७५-७६. धीरप्रशान्त प्रकृति के 'वणिक्' तथा 'सचिव' जैसे पात्र की गति
को बतलाने के प्रसंग को उठा कर शान्त रस में होने वाली गति को भी बतलाते
हैं—'वणिजां' इत्यादि से । 'धीरप्रशान्ताः वणिजः' इस वचन के अनुसार
वणिक् जैसे पात्र के अन्तःकरण में संस्कार रूप में शान्तत्व स्थित है । इसी
प्रकार शान्तरस प्रधान यति आदि के नाटक आदि में प्रसङ्ग आते हैं वहाँ
भी उनकी गति को बतलाना अभीष्ट होता है जिसे इसी प्रकरण में दिखलाया
गया है । वणिक्, सचिव आदि का हृदय शान्त होने से नियमन के योग्य
होता है । स्वभावजा गति से गति के अनाविष्ट रूप को बतलाया गया है
अर्थात् जिसकी गति आवेश रहित रखी जाए वही स्वाभाविक है ।
७६-८६. नैष्ठिक यति आदि पात्रों की गति—'यतीनाम्' इत्यादि से
बतलाते हैं । नैष्ठिकों की गति ब्रह्मचर्य से प्रवृत्त होती है । उपस्थितस्मृति =
संस्कार के सर्वदा उद्बुद्ध रहने से जिसे सर्वदा स्मरण बना रहता हो वह ।
व्रतानुगा पद से व्रतों की अनुकूलगामिता स्पष्ट की गई हैं । उन्मत्तादि के
आगमादि में जो व्रत दिखलाये हैं तदनुसार योग्य पादों से इसी प्रकार गति
होती है । पाशुपत तथा नकुलीशपाशुपत—जो परमेश्वरव्रत को धारण
करते हैं—उनका उन्मत्तव्रत होता है तथा इसी व्रत के कारण इनकी
गति में भी उद्धतत्व रहता है । इसी प्रकार रसान्तरों की भी संगति कही
गयी है ।
८७. रसों के अनुसार गति को बतला कर अब देशों के अनुसार भी गति
को बतलाते हैं—'अन्धकारे' इत्यादि से । अन्धकार में या अन्धा बन कर
चलने में या अन्धे की तरह चलने में भूमि पर पैरों को घिसाते हुए चल
कर मार्ग के अन्वेषण में तत्परता को दिखलाया जाए ।
८८-९०. समपाद नामक स्थानक द्वारा रथ से जहाँ जाया जाता हो उसे
प्रदर्शित किया जाता है या रथविशिष्ट की गति सामान्यतः यहाँ दिखलाई
गयी है या फिर प्रकृति के विभागगत औचित्य से विचित्रता लिये हुए अश्व,