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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४२१
से शरीर दृढ़ है वह सुडोल आकार वाला भी होगा ही तथा ऐसे व्यक्ति को
जिस कार्य में लगाया जाए उसमें उपयुक्त होने से नाट्य प्रयोग में सफलता
प्राप्त होती है । गात्रों में माधुर्य का अर्थ है उनका सुन्दर या सुडोल दिखलाई
देना ।
१०१-१०२. अङ्गक्रिया = अङ्ग-सिद्धि । अङ्गों के अनुसार प्राप्त चारी
की परम्परा से निर्मित स्वरूप वाले मण्डलों का विवरण अब दिया जा
सकता है, इस तथ्य को चारी के निरूपण के उपरान्त ही बतला कर चालू
अध्याय समाप्ति तथा अगले अध्याय में मण्डल के प्रतिपादन की बात को भी
दिखलाया गया है ।