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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

४. अध्याय ३५-३६: भूमिका-विकल्प, नाट्य-अवतरण, भरत-पुत्र शाप-मोक्ष एवं महाग्रन्थ उपसंहार

४०० नाट्यशास्त्र
१४६-१४७. मकरहस्त :-दोनों अँगूठों का मकर के कर्णों की तरह
रहना होने के कारण इसका 'मकर' नाम है । अर्थयोगेन से आशय है कि
आगे पीछे, अगल-बगल में, ऊपर-नीचे, ठहरने-चलने, उठने-बैठने जैसे अनेक
कार्यों या प्रयोजन के अनुसार इसका प्रयोग किया जाए । 'नाट्य शा० सं०'
के अनुसार नदी के पूर को दिखलाने में इस हस्त की योजना की जाती है ।
अभि० द० में इसका लक्षण नहीं मिलता ।
१४८-१४६. गजदन्त हस्त :-इसमें वाम बाहु में दक्षिण तथा दक्षिण
बाहु में वाम हस्त स्तम्भाकार वेष्टित होता है जो हाथी के दाँत के आकार
के सम्बन्ध से गजदन्त कहलाता है । वधू तथा वर के विवाह मण्डप में ले जाने
या शिला उखाड़ने जैसे अवसरों तथा कार्यों का इस हस्त को आते जाते
रखकर अभिनय किया जाता है ।
१५०-१५१. अवहित्थ हस्त :-आकार गोपन की सूचना देने के कारण
इस हस्त का अवहित्थ नाम करण सार्थक है। अवहित्थ हस्त के प्रयोग से हृदय
के आशय को दबा लेने या उसका भेदन नहीं होने देने को बतलाया जाता है ।
१५२-१५३. वर्धमान हस्त :-दो हस्त पराङ् मुख हो स्वस्तिकता से
रहित चलने से विस्तार युक्त हो जाते हैं अतः इनमें वर्धमानता रहती है जो
इसकी व्युत्पत्ति में निमित्त होती है ।
१५४. संक्षेप में बतलाने की भावना से यहाँ इनका निरूपण किया गया ।
'तु' का आशय है—इन कथित अर्थों के अतिरिक्त अन्य अर्थों के अभिनय भी
योग्यतावश हस्तों से किये जा सकते हैं । अभिनयदर्पण में संयुतहस्त २३
बतलाये गये हैं जब कि भरतमुनि ने तेरह ही बतलाये जिनमें अभिनयदर्पण
में ६ ही समान नाम से मिलते हैं । ऐसे अतिरिक्त हस्त हैं—१. शिवलिङ्ग,
२. कर्तरी-स्वस्तिक, ३. शकट, ४. शंख, ५. चक्र ६. सम्पुट, ७. पाश,
८. कीलक, ६. मत्स्य, १०. कूर्म, ११. वराह, १२. गरुड़, १३. नागबन्ध,
१४. खट्वा तथा १५. भेरुण्ड । विस्तार भय से इनके स्वरूप को यहाँ उद्धृत
नहीं किया जा रहा है । इसे अभिनयदर्पण में यथास्थान देखा जा सकता है ।
इसके अतिरिक्त देव-देवी-प्रतिमाओं के लिये हस्तमुद्राओं का प्रयोग भी इसी में
तथा अन्यत्र (नाट्यग्रन्थों में) मिलता है । इनमें—ब्रह्महस्त, ईश्वर (शिव) हस्त,
विष्णुहस्त, सरस्वतीहस्त, पार्वतीहस्त, लक्ष्मीहस्त, विनायक (गणेश) हस्त,
षण्मुखहस्त, मन्मथहस्त, इन्द्रहस्त, अग्निहस्त, यमहस्त, निऋर्तिहस्त, वरुण-
हस्त, वायुहस्त, कुबेरहस्त, आदि आते हैं । इनके अतिरिक्त दशावतारहस्त भी

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०१
है। यथा-१. मत्स्यावतारहस्त, २. कूर्मावतारहस्त, ३. वराहावतारहस्त,
४. नृसिंहावतारहस्त, ५. वामनावतारहस्त, ६. परशुरामावतारहस्त,
७. रामावतारहस्त, ८. बलरामावतारहस्त. ६. कृष्णावतारहस्त तथा
१०. कल्क अवतारहस्त । इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियों एवं वर्णों की
हस्तमुद्राओं का विवरण प्राप्त है। इनमें राक्षसहस्त, ब्राह्मणहस्त, वैश्यहस्त,
शूद्रहस्त आते हैं। जातियों की उनके व्यवसाय, तथा विभिन्न देशों की
परम्पराओं के अनुसार हस्तमुद्राएँ रहती हैं ।
इसी क्रम में सम्बन्धीजन की हस्तमुद्राओं का भी विवरण मिलता है ।
तदनुसार दम्पत्तिहस्त, मातृहस्त, पितृहस्त, श्वश्रूहस्त, श्वशुरहस्त, भर्तृ-
भ्रातृहस्त, ननान्दृहस्त, पुत्रहस्त, स्नुषाहस्त, तथा सपत्नीहस्त । इसके
अतिरिक्त नवग्रहों के लिये भी हस्तमुद्राओं का स्वरूप इसी में दिया गया है ।
यथा-(१) सूर्यहस्त, (२) चन्द्रहस्त, (३) कुज-(भौम) हस्त,
(४) बुधहस्त, (५) गुरुहस्त, (६) शुक्रहस्त, (७) शनिहस्त,
(८) राहुहस्त तथा (६) केतु हस्त। इन सभी के लक्षण तथा योजना
आदि अभिनयदर्पण में देखना चाहिए। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में संयुक्त हस्तों
के ६ अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये गये हैं। यथा-(१) कर्तरीस्वस्तिकहस्त,
(२) स्वस्तिकहस्त, (३) पताकस्वस्तिक, (४) कलश, (५) तिलक
तथा (६) वैष्णव । इनके स्वरूपादि भी (कारिका संख्या २१८ से २२५
तक) नाट्यशास्त्रसंग्रह में देखना चाहिए ।
१५५-१५६. बिना हस्त के कोई 'नाट्य' नहीं होता है। यहाँ नाट्य
शब्द का अर्थ है 'नाट्य' के उपयोगी अभिनय में विभावादि, जिसका रूप
जो दिखाई दिया है तथा जिसको बतलाया गया है 'वह' ।
१५७. यहाँ 'अर्थ का आशय' शोभातिशय और अभिनय-सामर्थ्य है ।
छन्दतः = नाट्याचार्य की इच्छा के तथा अनुभव के अनुसार रहने वाले
प्रयोग । लोकधर्मी इतिकर्तव्यता को दिखलाने वाले अभिनय, रस तथा भाव
के सूचक जो 'हस्त' हों उन्हें ।
१५८. देश = क्षेत्रविशेष । प्रयोग = सुकुमार एवं उद्धत रूपकविशेष-
अर्थयुक्ति = अभिधेय (वाच्य) गौण (लाक्षणिक, लक्ष्य) तथा प्रतीयमान
या व्यङ्ग्य अर्थ की उपपत्ति । पुरुषों के आचार स्त्रियों की अपेक्षा सामान्य
होते हैं अतः उनकी अपेक्षा स्त्रियों के विशेष रूप में हस्त प्रयुक्त किये जाएँ ।
१५६-१६४. रस और भाव के अनुसार स्थायी एवं संचारी के भेद से
तथा भिन्न-भिन्न विभाव भेद के कारण हस्तकर्म होते हैं। जैसे-विदूषक के
२६ ना० शा० द्वि०

४०२ नाट्यशास्त्र
प्रति केशों का आकर्षण खटकामुखहस्त से, प्रिया के प्रति अरालहस्त से, क्रीडा
और कलह की दशा में मुष्टिहस्त के द्वारा । इस प्रकार क्रियाओं की स्थिति
रस, भाव के अनुसार स्वयं कल्पना कर योजना की जाए । इस प्रकार इन
हस्तप्रचारों को नेत्र, मुखराग एवं भ्रुकुटि के साथ उनके भावों को व्यक्त करते
हुए रखना चाहिए । परोक्ष अभिनय में दृष्टियों को हस्त के अनुगत रखना
चाहिए, प्रत्यक्ष अभिनय में हस्तों का अनुगम नहीं होगा वहाँ इसके विपर्यय
अर्थात् प्रतिकूल क्रम रहेगा ।
१६५. करण का अर्थ है आवेष्टित आदि क्रियाएँ । कर्म = विधेय या
कर्तव्य । स्थान = ललाट आदि प्रदेश तथा उत्तान, अधोमुख, ऊर्ध्वमुख जैसी
स्थिति । प्रचार = स्वल्प, मध्य एवं अधिक प्रमाण में हस्तों का चालन ।
युक्ति = अर्थ के विषय में गौण या मुख्य की उपपत्ति या बारीकी से विचार
कर तदनुसारी अभिनय करना । यदि ब्राह्मण गौ है ( बैल या मूर्ख है ) तो
उसके मृग ( पशु ) रूप अर्थ को स्वरूप मान कर कर्तरीमुख या मृगशीर्ष
बहुल हरिण ( पशु ) का अभिनय उपयुक्त नहीं किन्तु ऐसे समय मूर्खता के
अभिनय में चतुर, शुकतुण्ड, शिखर एवं निषध हस्तों का प्रयोग प्रायः उपयुक्त
होता है । इसी प्रकार विशेषणविशेष्यभाव का विचार करना भी युक्ति
कहलाता है । जैसे लम्बकर्ण में लम्बे कानों का या जिसके लम्बे कान हों उसका
भी अभिनय किया जाता है । क्रिया यह तीन प्रकार की होती है, विधिरूपा,
निषेधरूपा तथा अनुभयरूपा ( विधि एवं निषेध से रहित ) । 'जाओ मत
जाओ' इत्यादि विधि में प्रत्ययार्थ का ही अभिनय होता है, निषेध में केवल
नञर्थ का और अनुभय में केवल प्रकृत्यर्थ का ही अभिनय होता है । इन
सभी का व्यापक कारण लोकोपचार ( लोकव्यवहार ) है ।
१६६. हस्तों के निरूपण के बाद अब उनके 'स्थान' बतलाते हैं । स्थान
अर्थात् करण तथा कर्म । यहाँ हस्तों के विभागपूर्वक वर्णन को दिया गया है
कि—उत्तम पात्र का सन्निकृष्ट प्रदेश में, मध्यम पात्र का मध्यम प्रदेश में तथा
अधम पात्र का विप्रकृष्ट प्रदेश में अभिनय किया जाए । यहाँ ललाटादि शब्द
उपलक्षणार्थक हैं । इन क्षेत्रों में वर्तना के नियोजन के साथ-साथ उत्तमपात्र
( राजा आदि ) अपने स्वरूप के उपयुक्त स्थानों पर अभिनय करें । इससे यह
भी सूचित किया गया है कि देव, गुरु, नृप आदि उत्तम पात्र ललाट क्षेत्रस्थ
अञ्जलि हस्त से, अमात्य, विदूषक आदि मध्यमपात्र वक्षःस्थ चतुरादिहस्तों
से तथा चर आदि अधमपात्र शुकतुण्ड आदि हस्तों से अपना अभिनय करें ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०३
१६७. अभिनय के विषय में अन्य तथ्य भी बतलाते हैं—ज्येष्ठ इत्यादि
से । ज्येष्ठ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के चतुर्वर्ग के उपदेश प्रदाता उत्तम
नाटकादि के प्रयोग में प्रत्यक्ष की प्रधानता है अतः हस्त का स्वल्प अभिनय
रहना चाहिए। भाण आदि हास्य प्रधान भाण प्रहसन आदि रूपकों के प्रयोग
में मध्यम हस्त प्रयोग रखना चाहिये क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष की प्रधानता के
साथ आकाशभाषितादि की भी बहुलता रहती है। नृत्त षिद्गकादि अधम में
प्रकीर्ण हस्तों का अभिनय किया जाए ।
१ : ८ . लक्षण अर्थात् वर्तना के क्रम से योजित 'सौष्ठव' अर्थात् वर्णित
स्वरूप के अनुगत । अधमपात्रों के हस्त लक्षणों के अनुगत नहीं रहते वे केवल
लोक क्रिया के अनुगत रहते हैं ।
१६६. अन्य आचार्यों के मत को अथवा के द्वारा यहाँ दिखलाया जा रहा
है । जैसा समय हो—अर्थात् भय, जुगुप्सा, आदि में तथा शीत, वर्षा या आतप
के योग में हस्तों की अस्फुट या अटपटी स्थिति ही सौष्ठव है । विपरीत या
भिन्न स्वरूप का आशय है कि अवहित्थादि में सौष्ठव की योजना न करना ही
सौष्ठव है ( तथा यही वैपरीत्य है ) ।
१७०-१७३. विहस्त = हस्त में विकलता रहना । मद्यपान से युक्त
'मदमत्त' तथा प्रमाद करने वाला व्यक्ति 'उन्मत्त' कहलाता है । ( परन्तु )
जो हस्त आन्तरिक चित्तवृत्तियों को सूचित करें उनको अवश्य प्रस्तुत किया
जाए । जैसे कपोतहस्त भय को, मदन हेतुक जृंभा ( जंभाई ) को कर्कटक-
हस्त, कपोतहस्तजैसे शोक को और शुकतुण्डहस्त ईर्ष्या को सूचित करता है
तो ऐसे हस्तों का अवश्य प्रयोग द्वारा किया जाए ।
१७४. यहाँ हस्ताभिनय प्रयोग के सभी निषेध स्थल बतलाये गये हैं।
जैसे सारथि के द्वारा घोड़ों की रस्सी सम्हालने के कारण दोनों हाथों के
व्यस्त रहने की स्थिति में हस्ताभिनय संभव नहीं होता । विलोकनं पद से
चित्तवृत्ति के मालूम हो जाने पर कि यह कैसा है इसे देखने से मुखराग आदि
के द्वारा स्फुटरूप से अभिनय करे ।
१७५. अब दिशाओं के भेद से हस्तप्रचार को कहते हैं—उत्तान इत्यादि
के द्वारा । जैसे 'पृथ्वी पर निर्माण किया' के अभिनय में किया जाने वाला
पताकहस्त उत्तान रहता है या आगे की ओर जाने वाला त्रिपताक भी ।
पार्श्व में—जैसे धनुष चलाने के अभिनय में मुष्टि हस्त का प्रयोग । अधो-
मुख—जैसे समुद्र के अभिनय में स्वस्तिक पताक हस्त का ललाटक्षेत्र गत
प्रयोग करना ।

४०४ नाट्यशास्त्र

१७६-१७७. हस्तों को व्यवस्थित रूप में निष्पादित कर (लक्षणानु-
सारी) प्रस्तुत करना ही अभिनय की 'वस्तु' है। इनमें अनुभावात्मक
'करण' होते हैं तथा इनका सञ्चय अङ्गहार हो जाता है जिनका विवरण ना०
शा० ४ अध्याय में दिया जा चुका है। स्थान, चारी तथा नृत्तहस्तों में अब
नृत्तहस्तों का निरूपण प्रसङ्ग प्राप्त हैं। इसके बाद क्रमशः स्थान एवं चारी
का विवरण कहा जायगा।
नृत्तहस्त—
१७८. चतुरस्र नृत्तहस्त :—वक्षःस्थल से हटकर जो अष्टाङ्गुल प्रदेश
हो उस पर रहने वाले दो हाथ। आशय यही है कि एक हाथ जब वक्षः पर
हो और दूसरा हाथ आठ अंगुल से हटे हुए स्थान पर हो तो दोनों हाथों में
आठ अंगुल का अन्तर रहेगा। इस प्रकार के अन्तर रहने से हाथों में चतुरस्र
रहता है। प्राङ्मुख से आशय है कि प्रयोक्ता जिसके सम्मुख होगा उसी के
सम्मुख चतुरस्र हस्त हों। कूर्पर तथा अंसों में तराजू की डंडी की तरह
समता रखी जाए। इसका अभिनय आकर्षण विशेष में किया जाता है।
१७६. उद्वृत्तहस्त :—(आशय यही कि) 'हस्त पहिले चतुरस्र होकर
बाद में उद्वेष्टित (व्यावृत्त) वर्त्तना प्रचार से हंसपक्ष कर दिये जाते हैं।
आवर्त्तन के समय ऊपर की ओर आवर्त्तन करने से 'उद्वृत्त' हैं। इसी की अन्य
संज्ञा 'तालवृन्तक' भी है।
१८०. तलमुख हस्त :—यहाँ 'तथा' पद का अर्थ है कि व्यावृत्त तथा
उद्वृत्त पूर्व में कर लिये जाएँ फिर इसको प्रस्तुत करे। इसमें समाप्ति के
समय हंसपक्ष हस्त रखे जाए। इसके तलमुख नाम का हेतु है दोनों हथेलियों
का एक दूसरे के सम्मुख हो जाना। मर्दल आदि अवनद्ध वाद्य वादन में इसकी
योजना रखी जाती है।
१८१. स्वस्तिक तथा विप्रकीर्णहस्त :—तावेव = अर्थात् 'तलमुख'
हस्त ही। 'स्वस्तिक' = स्वस्तिकाकार में। विप्रकीर्णहस्त पूर्व में कहे गये
चारों नृत्तहस्तों का आधार लेकर प्रवृत्त होता है यही यहाँ समझना चाहिए।
१८२. अरालकटकामुखहस्त :—अराल के प्रचार द्वारा एक हस्त को
अराल तथा द्वितीय को कटकामुख चतुरस्र के संस्थान के साथ प्रस्तुत
किया जाता है। अन्य लक्षण से स्वस्तिक संस्थान से अराल एवं कटकामुख
हस्तों को रखा जाए। इसका अभिनय वणिक् या सचिव पात्र के वितर्क में
किया जाता है।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०५
१८३. आविद्धवक्रहस्त :- इस हस्त की योजना भय से कम्पित होने
तथा तिरछे होकर खिसकने में की जाती है ।
१८४. सूचीमुखहस्त :- चतुरस्र स्थान स्थित दोनों सर्पशीर्ष हस्तों को
जब तर्जनी के अग्र से तिरछा कर बगल में ले जाकर फैलाते हुए रखे और
बाहर फैला कर क्रमशः प्रस्तुत करते रहें ( पर्यायशः ) तो बाहर की ओर
फैलाने से इसका सूची सदृश आकार होने से 'सूचीमुख' है । अन्य पाठ के
अनुसार—सूचीमुखहस्त वे होते हैं जिनके अंगूठे हथेली के मध्य में फैलाते हुए
रहें अतः वे स्वस्तिक आकार में होने वाले सर्पशीर्ष होते हैं तो ।
१८५. रेचितहस्त :- तेजी से घूमने वाले बिना कुछ बदले हुए हंसपक्ष
ही 'रेचित' होगें तथा हथेलियों को ऊपर फैला देने से विकृत हुए भी 'रेचित'
कहलाएँगे । इसकी योजना नृसिंहावतार में दैत्य के वक्षःस्थल के फाड़ने जैसे
कार्य में रखी जाती है ।
१८६. अर्धरेचितहस्त :- रेचित हस्तों में एक को 'चतुरस्र' स्थिति
में रखना 'अर्धरेचित' हो जाता है । इसे पर्यायशः भी प्रस्तुत करना होता है ।
१८७. उत्तानवञ्चितहस्त :- त्रिपताकहस्तों को अंस, कपोल तथा
ललाट में से किसी एक स्थान में अंचन क्रिया से युक्त करते हुए परस्पर
सामने और तिरछे करें तथा अंसों और कूर्परों में किञ्चित् चलन हो तो इस
अंचन के समय उत्तानता की प्राप्ति होने पर पुनः अञ्चन में उद्गमन क्रिया
का योग होता है अतः ये मृदु रूप में उत्तान तथा अञ्चित होने से 'उत्तान-
वञ्चित' हैं ।
१८८. पल्लव तथा नितम्बहस्त :- इसमें दो पताक हस्तों को ऊपर
बाहुओं को फैलाकर व्यावर्तित तथा परिवर्तित क्रिया से स्वस्तिक आकार में
रखे जाते हैं । ये पल्लव के आकार में होने से 'पल्लव' कहलाते हैं । अन्य
आचार्य शिथिल त्रिपताक हस्त को यदि कलाई में घूमते हुए रखे जाए तो
'पल्लव' बतलाते हैं ।
यदि दो पताक हस्त प्रथम कन्धों के बराबर रखते हुए तथा दोनों तलों
को एक दूसरे के सामने रखते हुए अधोमुख किये जाए तथा नितम्ब प्रदेश
तक ले जाए जाएँ जहाँ वे पर्यायशः अर्थात् क्रमशः रेचक को करते हों तो वे
'नितम्ब हस्त' हैं ।
१८६. केशबन्धहस्त :- पहिले एक बाजू से दूसरी बाजू में दो पताक
हस्त परिवर्तन करते हुए ऊपर उठे हुए अर्थात् मस्तक के क्षेत्र को प्राप्त करने

वाले हो पुनः नितम्ब हस्त से क्रमशः आवर्तन प्रत्यावर्तनकारी होतें हों वे
हस्त केशों के सम्बन्ध से 'केशबन्ध' कहलाते हैं। ये शोभाधायक होते हैं तथा
आचार्य गण को अतिइष्ट होते हैं।
१६०. लताबन्धहस्त :- यदि दो पताक हस्त तिरछे फैलाते हुए नीचे
बाजुओं में अर्थात् नितम्ब से लताहस्त पर्यन्त त्रिपताकों के रूप में अनुगमन
करते हैं तो 'लताबन्ध' हस्त होता है।
१६१. करिहस्त-हस्त :- समुन्नत = अर्थात् जिस क्रम से संश्लेष किया
उसी क्रम से ऊँचा उठाते हुए । विलोलित पद से दोला की तरह झुलाते
रहने का संकेत मिलता है। यहाँ 'हस्त' पद का एकवचन में उपन्यास इसलिये
किया है कि करी को एक ही हस्त ( सूं ड ) होता है। अतः इसका चतुरस्र
की तरह न तो सजातीय होकर आरम्भ होता है और न खटकामुख की तरह
नृत्त के अभ्यास के व्यपदेश से विजातीय आरम्भ ही होता है। अतएव
द्विवचन का यहाँ उपन्यास नहीं किया गया है। इसका आकार 'करिहस्त'
का होने से यथार्थ नाम है।
१६२. पक्षवञ्चितकहस्त :- यदि कटि के शीर्ष या नोक के आसपास
बाजू में दो त्रिपताक हस्त रखे जाए तो इससे बाजू अञ्चित हो जाती है।
१६३. पक्षप्रद्योतक-हस्त :- इसमें बाजू में एक के सम्मुख दूसरा होकर
अपने स्वरूप को द्योतित करते हैं। लक्षण में 'एव' पद से प्रतीत होता है कि
इनके व्यामिश्रण या मिलान से प्रयोग में शोभा होती है।
गरुडपक्षहस्त :- यदि दो पताक हस्त नितम्ब क्षेत्र में अधोमुख होकर
हथेली के झटके से ऊपर जाने वाले गरुडपक्ष के आकार को प्राप्त करें तो
'गरुडपक्ष' हस्त होते हैं। यहाँ दोनों पताकहस्त ही इष्ट हैं क्योंकि त्रिपताक से
बाधा मानी गयी है।
१६४. दण्डपक्ष-हस्त :- इसमें एक हंसपक्षहस्त वक्षःस्थल की एक बाजू
से वर्तन या चालू हो तथा उसी समय द्वितीय हंसपक्ष का भुज के प्रसारण
पर्यन्त वर्तन होता हो। फिर दूसरे अंग से दोनो ही भुजाएँ प्रसारित, व्या-
वर्तित तथा परिवर्तित होती हों। इसमें एक बाजू में बगल से या दूसरी बाजू
से भुजाएँ दण्ड के आकार में रहती है अतः इसका नाम 'दण्डपक्ष' है।
इसमें दोनों हाथों का एक साथ प्रसारण रहता है किन्तु व्यावर्तन एवं परि-
वर्तन क्रमशः रहते हैं।
१६५. ऊर्ध्वमण्डल-हस्त :- वक्षःस्थल से व्यावर्तित कर ललाट क्षेत्र
के जरिये से उन्हें पाश्र्वों में ले जाकर पुनः वहाँ से मण्डलाकार घुमाव देकर

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०७
फैला देने पर 'ऊर्ध्वमण्डल' हस्त हो जाते हैं। ललाट प्रदेश तक ऊपर ले जाना
ही इसका मुख्यतः 'लक्षण' है।
पार्श्वमण्डल-हस्त :- ऊर्ध्वमण्डल हस्त ही जब पताका के आकार में
(गोल घूमते हुए) परस्पर सम्मुख एक पार्श्वगत हो जाते हैं तो 'पार्श्वमण्डल'
कहलाते हैं। अन्य आचार्यों का कहना है कि वक्षःस्थल के बराबर अपने ही
बाजू या पक्ष में परस्पर आहत भुजों का ताल देकर घुमाते हुए वर्तना क्रम
से प्रचार करना ही इस हस्त का स्वरूप है।
१६६. उरोमण्डलीहस्त :- इसमें उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित हस्तों का
एक साथ योग रखा जाता है तथा ये वक्षःस्थल के समीप या सामने से
रहनेवाले होते हैं। इसमें हस्तक्रम ऐसा रखा जाता है कि एक के आगमन
से दूसरे का गमन या गोल घुमाना बना रहे (ऐसी वर्तना रहती है)
उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित क्रिया 'पताक' हस्तों की होती है। अन्य आचार्यों
के मत में यह 'हंसपक्ष' हस्त में रखे जाने की बात कहीं गयी है।
१६७. उरःपार्श्वार्धमण्डलहस्त :- इसमें वक्षःप्रदेश में उत्तान हस्त को
ठहरा कर फिर अलपल्लव हस्त को व्यावर्तित करण से निकाले तथा बाजू
में भुजा को फैला दे। यह एक हस्त की प्रक्रिया हुई। तब दूसरे हाथ की
अंगुलियों को अराल हस्त में उद्वेष्टित कर लावे। इसके नाम का भी यहाँ यही
कारण है कि इसमें एक हाथ से वक्षःस्थल के आधे भाग को और दूसरा हाथ
पार्श्व (बाजू) में मण्डल की तरह क्रमशः गतागत करते हैं।
१६८. मुष्टिकस्वस्तिकहस्त :- इसमें कलाई के समीप में दोनों हाथों में
से एक हस्त को अराल वर्तना से कुञ्चित रूप से तथा दूसरे हस्त को अलपल्लव
वर्तना से अञ्चित रूप से बार बार आवागमन करवाने के पश्चात् खटकामुख
हस्तों से स्वस्तिक करते हैं। इस प्रकार खटकामुखों की मुष्टि (हस्त) से
उत्पत्ति होने के कारण इसका 'मुष्टिकस्वस्तिक' नामकरण सार्थक है।
१६६. नलिनीपद्मकोशहस्त :- इस हस्त का विभिन्न आचार्यों ने
पृथक् २ वर्णन तथा स्वरूप बतलाया है। इसमें मुष्टिक युक्त स्वस्तिक के क्षेत्र
में जब दोनों कलाइयों को व्यावर्तित करण से कनिष्ठिका अंगुली एवं अंगूठों
का परितंन कर देते हैं तब दोनों कलाइयाँ परस्पर पराङ्मुख हो जाती हैं
जिससे दो पद्मकोश बन जाते हैं। इस प्रकार इसके नाम के अनुरूप ही
एक कमलिनी में अनेक कमलों की उत्पत्ति हो जाने से इसका 'नलिनीपद्म-
कोश' नाम हो जाता है।

४०८ नाट्यशास्त्र
२००. अलपल्लव या अलपद्महस्त :- जब अलपल्लव हस्तों को वक्षः
प्रदेश से उद्वेष्टित क्रिया में रख कर कन्धे के पास तक ऊपर ले जाकर फैला
दिया जाए तो 'अलपल्लव' हस्त होता है । इसका अन्य नाम है 'अलपद्म' ।
उल्बणहस्त :- इसमें दो अलपल्लव हस्तों को वक्षः क्षेत्र से उद्वेष्टित
कर स्कन्ध के पास ऊपर फैलाए हुए एक हस्त से आबिद्ध तथा दूसरे से
पल्लव रूप को प्रदर्शित करे तो 'उल्बण' हस्त होता है । इसकी हर्षभरित
मनोवस्था में योजना रखी जाती है ।
२०१. ललितहस्त :- इसमें दो अलपल्लवहस्तों को मस्तक पर ले जाते
हैं । इसमें चतुरस्र से अङ्गों का लालित्य दिखलाया जाता है । अतः इसका
नाम भी 'ललित' है ।
वलितहस्त :- इसमें कलाई प्रदेश पर लताहस्त स्वस्तिकाकार में
वलित या घुमाव लेते हैं । इसमें बाहुओं का वलन होता है अतः इसका नाम
'वलित' है जो भिन्न-भिन्न वर्तनाओं का संकेत देता है । अन्य आचार्य मुष्टिक
स्वस्तिकहस्त को मस्तक पर फैलाने को ( घुमाने को ) 'वलित' मानते हैं
तथा कुछ अन्य दो कटकमुख हस्तों को एक दूसरे के साथ अग्र भाग लगाते
हुए मिला कर ऊपर उठाते हैं जब तक कि वे पृष्ठ तक पहुँच कर कलाई पर
झुकाये न जाएँ तो 'वलित' होता है ।
नृत्तहस्तों की संख्या भरतमुनि ने तीस बतलाई है जो केवल उपलक्षण-
मात्र हैं । इन नृत्तहस्तों के अतिरिक्त कुछ अन्य नृत्तहस्त भी प्राप्त हैं जिनके
नाम इस प्रकार हैं—१. निकुञ्चकहस्त, २. द्विशिखरहस्त, ३. वरदाभयहस्त,
४. सूचीविद्धहस्त, ५. ज्ञानहस्त, ६. मुद्रहस्त तथा ७. प्रकीर्णहस्त । इनके
लक्षण तथा योजना नाट्यशास्त्रसंग्रह में कारिका संख्या २८६ से २६५ तक
देखना चाहिए । विस्तारभय से यहाँ नृत्तहस्तों के शेष विवरण भी नहीं दिये
जा रहे हैं ।
२०२-२०३. पताकहस्त सब हस्तों की प्रकृति या कारण माना जाता है
अतः सभी वर्तनाओं में कार्य करने से 'पताक' सर्वसाधारण होता है तथा
शब्द से भी रखता है । यहाँ नाट्यशब्द से अभिनयोपयोगी हस्त और नृत्त
प्रमुखता नृत्त के उपयोगी हस्तों की सूचना दी गयी है ।
२०४-२०६. जिस अंगुलितुलन रूप क्रिया से अभिनय विशेष का
सम्पादन किया जाये उसे 'करण' कहते हैं । किन्तु जहाँ अभिनय की समाप्ति
नहीं होती हो वहाँ 'वर्तना' की आंकाक्षा रहती है जिसका 'अंगत्रोटन' के
नाम से बुधजन व्यवहार करते हैं ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०९
२०७-२१०. अभ्यन्तरेण इत्यादि । अभ्यन्तर अर्थात् हथेली के सम्मुख
बाह्यप्रदेश से लेकर वक्षःस्थल के क्षेत्र तक पहुँचना । इसकी अपेक्षा विपरीत
वक्षःस्थल के क्षेत्र विरुद्ध दिशा में कनिष्ठादि का आवर्तन या घुमाव ।
बहिर्मुखत्व पद से वक्षःक्षेत्र से बहिर्गमन तथा अभ्यन्तरत्व से तलसम्मुखत्व
समझना चाहिए । अभ्यन्तरत्व के विपर्यास से बाह्यता यहाँ समझना चाहिए ।
२११. नृत्त तथा अभिनय में करणों का प्रयोग अधिक मात्रा में किया
जाना इष्ट है जो हाथों से होता है । क्योंकि उनसे ही वर्तना उत्पन्न की जाती
है । नृत्त तथा नाट्य में उपयोगी हस्त-पाणि हैं । इन्हें मुख, नेत्र, भ्रुकुटि से युक्त
या अनुगत ही रखा जाये इसका आशय यही कि जिधर वर्तना चले उधर ही
मुखादि रहें । प्रश्न—जब नेत्र, मुखादि का राग वर्तना से व्यक्त होता हो
तो उन्हें मुख, भ्रूनेत्र से युक्त कैसे रखें । उत्तर—अभिनय की पूर्ति के लिये
यह वर्तना में रहने वाली प्रक्रिया है अतः इसमें पुनरुक्ति नहीं आती ।
२१२-२१४. क्योंकि अंगुलियाँ बाहु से संलग्न हैं अतः उनकी क्रियाएँ
भी बाहु से संलग्न होगी ही जिनके प्रभेद का ज्ञान अपेक्षित होने से उन्हें
बतलाते हैं । ये दस प्रभेद हैं । तिर्यक् का आशय है कि उसकी गति पार्श्व
में रहती है । ऊर्ध्व = मस्तक के ऊपर जाता है । अधोमुख = पृथ्वी को छूने
वाला । अञ्चित = वक्षःस्थल से निकल कर ऊपर शिरःप्रदेश से लौटना ।
अपविद्ध = चक्राकार गति में चारों ओर घूमना । पृष्ठानुसारी = शरीर के
पृष्ठभाग का अनुगमन करने वाला । उद्वेष्टित = जो मणिबन्ध ( कलाई )
से सम्बद्ध वर्तना से निष्क्रामण करे । प्रसारित = जो कलाई के अग्रदेश का
अनुधावन करे । इस प्रकार के करणों में द्रुत, मध्य तथा विलम्बित के
वैचित्र्य से तथा बाहुओं के पर्याय से उक्त करणों की जब योजना हो तो उसमें
अनेक वर्तनाएँ अन्तर्निहित होती हैं । अतः करणों में होने वाली विशेषताओं
को अवश्य जान लेना चाहिए । नित्य कहने से यही बात यहाँ संकेतित की
गयी हैं क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य कोई इसका प्रयोजन यहाँ नहीं है ।

दशम अध्याय
( शारीराभिनय )
१. शारीराभिनय के क्रम में उरःकर्म बतलाये हैं जो पाँच हैं ।
२-३. आभुग्नउर :— इसमें वक्षः उन्नत या तान कर निष्क्रान्त, शुद्ध या
भुग्न अंस जिसमें रहें ऐसा रखा जाता है ।
४-५. इस वक्षःस्थल की योजना अतिशय हर्ष में भावण करने में भी
होती है [ द्र० ना० शा० संग्रह-४५६ ]
६-७. हिक्का = हिचकी लेना ।
११-१५. पार्श्व ( बाजू ) के पाँच कर्म तथा उनकी योजना दी गई है ।
१८. उदर के चौथे प्रभेद का प्रक्षिप्त पाठ के अनुसार ‘सम’ नाम है
तथा अन्य मत के अनुसार ‘रिक्त-पूर्ण’ भी एक प्रभेद है जिसकी योजना श्वास-
योग में की जाती है ।
२१-२६. कटि-कर्म के पाँचप्रभेद स्वरूप तथा उनकी योजना को मुनि
ने दिखलाया है जिसका है सभी पश्चाद् भावी नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों के द्वारा
अनुसरण किया गया ।
२७-३२. कटिकर्म के निरूपण के पश्चात् मुनि ने ऊरु की पांच स्थितियाँ
वर्णित की तथा उनकी योजना भी ।
३३-३६. जंघा के विवरण के बाद मुनि ने जंघा के पाँच कर्म, स्वरूप
तथा उनकी योजना को बतलाया ।
४०-५४. पादकर्म का विवरण देते हुए मुनि ने इसके पांच प्रभेद
बतलाकर उनका स्वरूप तथा योजना भी दिखलाई तथा अन्त में ‘सूचीपाद’
का स्वरूप बतला कर उसकी योजना का निरूपण किया ।
५५-५७. नाभि, जंघा, उरु के करण रूप में दिखलाये गये कर्मों से
भिन्न पादकर्म होते हैं । कटि आदि की गतियाँ मण्डल भेद से निष्पन्न होती
है, अतः कटि आदि से पाद पर्यन्त कर्म को ही मिलाकर ‘चारी’ कही
जाएगी क्योंकि वह समान करण से निष्पन्न होती है । इस प्रकार अङ्ग के
विभिन्न प्रदेशों का विवरण इस अध्याय में देकर अभिनय के तत्त्वों को प्रस्तुत
कर अगले अध्याय में चारी रूप व्यायाम को देने के सूत्रपात के द्वारा अध्याय
समाप्ति को भी दिखलाया गया है ।

एकादश अध्याय
( चारीविधान )
१-२. दशम अध्याय की समाप्ति पर 'चारी व्यायाम लक्षण' पद कहा
गया था। यहाँ 'चारी' शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार कर इस शब्द की
व्याख्या उचित होगी। चर् धातु से औणादिक इन प्रत्यय से भिन्न 'इ' को
ङीप् कर चारी शब्द निष्पन्न होता है। चारी द्वारा आकाश तथा पृथ्वी पर
चलने का अभिनय किया जाता है अतः आकाश एवं भूमि की चारियाँ होती
हैं। 'व्यायाम' शब्द का अर्थ है 'व्यायच्छते' इति अर्थात् अनुगत होना।
इसमें परस्पर एक दूसरे से मिलती हैं। विधान शब्द का अर्थ है योजना।
अतः परस्पर योजना से होने वाली चारियाँ व्यायाम शब्द का अर्थ होने
से चारी ही व्यायाम है। ये चारियाँ किस से मिलती हैं? इस प्रश्न के
उत्तर में यही व्यवस्था है कि पूर्व चारी पर में मिलती है किन्तु पर-चारी
पूर्व में नहीं मिलती यह नियम हैं। यहाँ नियत स्थिति अर्थात् विधान या
प्रक्रिया के कारण हस्त या पाद में से कोई अङ्ग प्रधान तथा अन्य अप्रधान
हो जाता है अतः यहाँ प्रधानभूत अङ्ग के अनुरोध से अन्य अङ्ग प्रवर्तित
होते हैं। जैसे जब किसी अभिनय में हस्त प्रधान हो या किन्हीं गतियों के
अभिनय में पाद प्रधान हों तो उनके उपयोग में आनेवाली चारी प्रधानता
को प्राप्त करती है। ऐसी स्थिति में प्रधान चारी के सम्पन्न होने पर
पूर्वाचारी का आश्रयण परा चारी से किया जाता है। इस प्रकार परस्पर
नियत रहनेवाली चारियाँ व्यायाम हो जाती हैं। यह व्यायाम संक्षिप्त,
मध्यम तथा विस्तीर्ण भेद से तीन प्रकार का माना जाता है।
३. एक का अर्थ है एकाकी जिससे श्रोणीप्रदेश (कटि के पीछे का भाग)
के प्रचार का भी संकेत समझना चाहिये तथा आदि शब्द से कटि को लिया
जाता है। तब श्रोणी का स्पन्दन तथा जंघा का चलन प्रदर्शित किया जाता
है। द्विपाद शब्द में पाद शब्द से उसका प्रचार या गति समझना चाहिए।
यह करण दो पैरों के प्रचार से होता है तथा संक्षिप्त व्यायाम भी कहलाता
है जिसका अभिनयों में प्रयोग किया जाता है।
४. कारिका के 'करणानां' इस बहुवचन पद से तीन करण ग्राह्य समझन
चाहिए् क्योंकि तीन में बहुत्व अपेक्षित है। यदि यहाँ चार या पांच कारण

४१२ नाट्यशास्त्र
का सहयोग रखें तो फिर नियमन नहीं हो पाएगा तथा खण्डों से मण्डलों
का प्रविभाग भी नहीं बन पाएगा । आशय यही है कि चारी में एक पाद का,
करण में दो पादों का, खण्ड में छः पादों का इस प्रकार पादवृत्तियों से एक
के बाद बढ़नेवाले अभिनय बनते हैं, जिन्हें मध्यम व्यायाम समझना चाहिए ।
तीन या चार खण्डों से 'मण्डल' का आशय है कि केवल तीन या चार
खण्डों से ही मण्डल बनता हो ऐसा नहीं समझना चाहिए; क्योंकि पाँच, 'छः
या सात खण्डों से भी मण्डल बनाता है जिन्हें आगे कहा भी गया है ।
५. चारी से अनेक कार्य साधे जाते हैं। यथा—शस्त्र का फेंकना,
सुदर्शनादि चक्र का प्रक्षेप, कुन्त (भाले) का फेंकना, युद्ध में हनन तथा
प्रतिहनन के अभिनय आदि जिनमें चारी का ही उपयोग होता है ।
६. यहाँ 'यत्' शब्द से चारियों का परामर्श किया गया है जो नाट्य-
प्रदेश की विस्तीर्णता का संकेत करता है। जो अभिनय मस्तक तथा हस्त
जैसे अंगों द्वारा स्वतन्त्ररूप में प्रस्तुत किया जाता है पर इन सभी अङ्गों का
पूर्वापरभाव के साथ चारी के साथ भी प्रयोग किया जाता है तथा चारी
का भी इसी कारण पूर्वापरभाव से उपयुक्तता में ध्यान में रख कर (इनके
साथ) प्रयोग रखा जाता है ।
७. इस कारिका में चारी की योजना के प्रदेश दिखलाये गये हैं ।
इनमें नृत्त में करण तथा अङ्गहारों के अभिनयप्रदर्शन आदि में इनका योग
रहता है । जिसे कहा जा चुका है तथा आगे भी विषयानुसार बतलाया
जाएगा । युद्ध के विषय में इनकी योजना को न्याय के प्रसंग में आगे कहा
जाएगा तथा गति के विषय में इनके प्रयोगादि का विवरण गतिप्रचार
नामक १३ वे अध्याय में आगे दिया जाएगा । इस प्रकार तीन अध्यायों में
प्रतिपाद्य अर्थ को यहाँ तीन शब्दों (नृत्ते, युद्धे, गतौ) के द्वारा सूचित किया
गया है ।
८-१३. भूमि में या उस पर सम्पन्न होने से इन्हें 'भौमीचारी' कहते हैं ।
इसी प्रकार ऊपर या आकाश में चलने वालों की आकाशिकी चारी होगी ।
प्रभेद चारियाँ सोलह हैं । इसी प्रकार आकाशिकी चारी के भी सोलह
भौमी होते हैं । (क्रमशः विवरण आगे से आरम्भ होता है ।)
१४. समपादाचारी :—क्योंकि पादादि के समानकरण होने पर चलना
तो होगा ही, जो आगे या पीछे ऊपर या नीचे रहेगा तो ऐसी स्थिति में चारी
भी और समपादा भी समता के कारण कैसे होगी ? इसके उत्तर में यही
कहा जा सकता हैं कि जब अभिनेता किसी स्थान विशेष में पैरों को समान

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१३
रूप में रख कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जावे तो चलने से चारी होगी
और पादों की समानरूपता से यह 'समपादा' भी कहलाएगी । यहाँ योग्यता
अर्थात् स्थान के संश्रय के कारण ऐसा व्यवहार एवं नामकरण हुआ है ऐसा
समझना चाहिए ।
१५. स्थितावर्ता-चारी :—पैर के अगले भाग से संचार करने में भूमि
पर पैर को घिसट या घिस कर रखते हुए चलना होता है ऐसी चलने की
स्थिति अग्रतल संचर पाद की रखकर अभ्यन्तर मंडल बनावे अर्थात् द्वितीय
बाजू की जानु को स्वस्तिक आकार में रखे तथा जब स्वस्तिक रूप में जानु
संश्लिष्ट हो जाए तब दूसरी का उत्सारण किया जाए । एक के स्थान को
ऊपर खींच कर ले जाये या ऊपर अपनी ओर खींचें । यही उत्सारण है ।
१६. शकटास्या-चारी :—निषण्णाङ्ग अर्थात् शरीर के पूर्वीयाभाग को
प्रयत्न से धारण किये हुए । जिस प्रकार शकट असनीय अर्थात् क्षेप्य हो उसी
रूप में शरीर को लाना शकटास्या है ।
१७. अध्यर्धिकाचारी :—दाहिने पैर को एडी की ओर पीछे रखा
जाए तब उस दाहिने पैर की स्थिति उपसर्पण के समय आधी तिरछी
होती है जो आधे ताल से अधिक अन्तर पर रखी जाती है । यह करणों
की प्रधानता के कारण है तथा इस प्रक्रिया में वामचरण की स्थिति भी पृष्ठ
या पीछे लगी हुई रहती है ।
१८. चाषगति-चारी :—वैसे प्रायः सभी चारियों में दाहिने पैर का
अपसर्पण होता है । यहाँ एक ताल के परिमाण से दाहिने पैर को आगे
फैला कर उसी को दो ताल मात्रा में पीछे रखा जाता है । यहाँ बायें पैर
का दाहिने के साथ अपसर्पण होता है । थोड़ा उछालने पर दाहिना पैर बायें
से दूर हट कर फिर मिल जाता है । इस प्रकार भययुक्त अपसर्पण एवं
श्लिष्टतायुक्त गति रखने से इसका नाम चाष ( नीलकण्ठ पक्षी ) गति हो
गया है ।
१९. विच्च्यवा-चारी :—यहाँ एकवचन में प्रयुक्त पाद शब्द का अर्थ
दोनों पैरों के लिये समझना चाहिए ।
२०. एलकाक्रीड़िता-चारी :—इसमें एक बार उछलकर पुनः एक बार
उछाल लेना पड़ता है । जिसमें पाद, जंघा, सक्थि ( जानु का ऊपरी भाग )
तथा गुल्फ ( घुटने ) को साथ-साथ गतिशील बनाना होता है तथा यह पारी
पारी से उत्पलवन होता है । इसमें एलका ( बकरी ) की गति के समान
उछाल लेने के कारण इस चारी का 'एलकाक्रीडिता' नाम भी है ।

४१४ नाट्यशास्त्र
२१. बद्धा-चारी :-यहाँ ऊरुओं का वलन करना ही 'जंघास्वस्तिक' पद
का आशय है । जंघाओं के सम्यक् बन्धन हो जाने के कारण इसका 'बद्धा'
नामकरण किया गया है ।
२२. ऊरुद्वृत्ताचारी :-इसमें अग्रतलसंचर पाद की एडी जब दूसरे
पैर के पृष्ठभाग की ओर उन्मुख हो और जानुओं के झुकने से जंघा
आकुञ्चित होकर दूसरी जंघा के सम्मुख वलन से उद्वृत्ता की स्थिति लेले
तो 'ऊरुद्वृत्ता' होती है। क्योंकि इसमें ऊरुओं के ऊपर विवर्तन या वलनक्रिया
रखी जाती है। इसकी लज्जा या ईर्ष्या के भाव प्रकाशन में योजना रखी
जाती है । अन्य आचार्यों के मत में एडी को द्वितीय अग्रतलसंचर पाद के
बाहर की ओर रख कर इस चारी को प्रस्तुत किया जाता है ।
२३. अड्डिता-चारी :-अड्डधातु अतिक्रमण तथा हिंसा अर्थ में पठित
है इसमें इतच् प्रत्यय से अड्डिता शब्द निष्पन्न है। इसमें एक पाद सम-
स्थित और दूसरा तलसञ्चर की स्थिति में आगे और पीछे क्रमशः श्लिष्ट होता
है । इसमें पाद अपने स्थान से अतिक्रमण करता है अतः इसे 'अड्डिता'
कहते हैं ।
२४. उत्स्पन्दिता-चारी :-इसमें एक पैर की कनिष्ठिका अंगुली के
बाहरी भाग और दूसरे पैर के भीतरी भाग से निवर्तन होता है । वह पैर
का अपसारण रेचितपाद को अवधि कर करके रखा जाता है । चारी में
शोभाबृद्धि के लिये यह अपसारण रखा जाता है । यह क्रिया नदी के प्रत्यावर्तन
रूप स्पन्दित के तुल्य रहने से इसका उत्स्पन्दिता नाम है। जिसमें रेचक नृत्त-
हस्त रहता है ऐसा अन्य आचार्यों का मत है ।
२५. जनिता-चारी :-इसमें तलसञ्चरपाद से गमन किया जाता है ।
यह समस्त गतियों की जननी अर्थात् उत्पादिका होती है तथा इसी से गतियों
का आरम्भ किया जाता है । यही इसकी व्युत्पत्ति भी है। इसमें मुष्टिका-
कार हस्त का वक्षःस्थल पर विन्यास तथा अन्य हस्त का प्रसारण केवल इति-
कर्तव्यता को दिखलाने के लिये रखा गया है ।
२६. स्यन्दिता तथा अपस्यन्दिता-चारी :-इन दोनों चारियों का एक
साथ विवरण दिया गया है। इसमें समस्थित एवं निषण्ण ऊरू वाले दाहिने
पैर को पञ्च तालों के अन्तर से फैला दिया जाता है । इस फैलाने रूप धर्म के
कारण इसका नाम भी 'स्यन्दिता' हो गया है। इसी के विपर्यय या विपरीत
स्थिति से 'अपस्यन्दिता' चारी निर्मित हो जाती है। यहाँ प्रश्न होता है

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१५
कि स्यन्दिता का ही विपर्यय अपस्यन्दिता क्यों माना जाए, अपस्यन्दिता
विपर्यय स्यन्दिता क्यों नहीं है ? इसके उत्तर में यही समझना चाहिए कि
'अपस्यन्दिता' शब्द में लगाया गया 'अप उपसर्ग' ही इस को विपर्यय में
ला बैठाता है ।
२७. समोत्सारित-मत्तल्लीचारी :—इसमें परस्पर जंघाओं के वेध से
किये जाने वाले स्वस्तिक के बीच या जब एक तलसंचरपाद हो तब
दूसरा तलसंचर उसी समय होता है और दोनों ऐसे घूर्णमान या घूमते हुए
पादों का जो उपसर्पण है वही इस चारी को बनाता है । इस चारी में—
एक सम या अविकल रूप में उत्सारित तथा दूसरी मत्तल्ली अर्थात् मद से
विकल न होना या रक्षार्थ अन्यत्र पलायन करना—इस प्रकार की दो गतियां
रहती हैं । इसकी मध्यममद के अभिनय में योजना की जाती है ।
२८. मत्तल्लीचारी :—इसमें अग्रतलपाद भूमि में लगता या श्लिष्ट
रहता है । यहाँ पैर जंघा स्वस्तिक के योग से अर्ध त्र्यश्र ( आधा तिरछा )
होने से तथा पैरों के घूर्णन और अपसर्पण करने के कारण यह 'मत्तल्ली'
चारी होती है । इसकी प्रगाढ़मद में योजना रखी जाती है ।
२६. इन चारियों का प्रयोग नियुद्ध या बाहुयुद्ध या मल्लयुद्ध में तथा
इससे भी अधिक रूप में क्रमशः करण, अङ्गहार और नाट्य के प्रस्तुतीकरण
में रखा जाता है । आगे आकांशिकी चारी के क्रमशः लक्षण वर्णित हैं ।
३०. अतिक्रान्ताचारी :—इसमें कुञ्चितपाद ( १०।५३ ) को दूसरे
पैर के घुटने के क्षेत्र में रख आगे की ओर फैलाया जावे और चतुस्ताल की
दूरी तक ( पैर को ) ऊपर उठाकर भूमि पर गिराते हैं । गन्तव्य के अति-
क्रमण करने के कारण इसका 'अतिक्रान्ता' नामकरण है ।
३१. अपक्रान्ताचारी :—इसमें वद्धाचारी को पहिले सम्पादित कर फिर
पैर को ऊपर उठाकर बाजू में क्षिप्त या अपक्रमणदशा में रखते हैं । अपक्रमण
करने से इसे 'अपक्रान्ता' कहा गया है ।
३२. पार्श्वक्रान्ताचारी :—इसमें कुञ्चित पाद को अपनी बगल से ऊपर
की ओर ले जाकर भूमि पर एडी को गिराया जाता है । इसलिये कुञ्चितपाद
के बल से एडी का उद्घट्टित होना यहाँ सूचित होता है । अन्य आचार्य कहते
हैं कि द्वितीय पाद को उसके क्षेत्र तक उत्क्षिप्त रख कर उद्घट्टित कर भूमि
पर पटका जाता है यही 'पार्श्वक्रान्ता' है ।
३३. ऊर्ध्वजानुचारी :—यहाँ 'क्रमस्तब्ध' पद से पाद के उत्क्षेपण के
बाद उसे निश्चल करना ही 'स्तब्धता' होती है ।

४१६ नाट्यशास्त्र
३४. सूचीचारी :-जानु से ऊपर ऊरु तक जंघा को पूरी फैला कर
अग्रभाग से भूमि पर गिरावे । इस प्रकार यह 'सूची' के आकार की होने से
'सूची' कहलाती है।
३५. नूपुरपादिका-चारी :-यहाँ 'पृष्ठतः' पद का भाव है कि 'अंचित'-
पाद को पीछे की ओर एड़ी को छूते हुए अन्त तक ले जावे । बाजू में उस
'अग्रतल-संचर' पैर को पृथ्वी पर पटका जाए । ऐसा करने पर नूपुरों की
झनझन आवाज निकलेगी जिससे शीघ्रता प्रकट होगी तथा नूपुरों की योजना
भी । इसी आधार पर इसका नामकरण भी हुआ है ।
३६. दोलपादाचारी :-यहाँ 'उत्क्षिप्य' पद से आशय है कि कुञ्चित-
पाद को दक्षिणपाद के क्षेत्र तक बगल में ले जाए और फिर वहाँ दोला के
आकार में स्पन्दित कर बाद में उसे एड़ी की बाजू में पृथ्वी पर पटके । यह
'दोलपादा' का स्वरूपानुसारी नाम है ।
३७. आक्षिप्ताचारी :-यहाँ 'आक्षिप्त' पद से आशय है कि कुञ्चितपाद
को आगे तीन ताल के अन्तर में ऊपर उछाल कर अंचित के अर्धमण्डल आकार
में दूसरी बाजू में ले जावे और स्वस्तिक कर पृथ्वी पर पटके ।
३८. आविद्धा-चारी :-विश्लिष्ट जंघावाले स्वस्तिक बने कुञ्चितपाद
को फैलाया जाए और उसी 'आविद्ध' अर्थात् संश्लिष्ट उसी पाद को बाजू में
द्वितीय पार्ष्णि (एड़ी) के क्षेत्र में तदनुसार पटके ।
३६. उद्वृत्ताचारी :-यह चारी आविद्धा की शेषभूता मानी जाती
है । इसमें आवेष्टन अर्थात् दूसरे ऊरु के क्षेत्र की पार्ष्णि तक उछाल लेकर
'भ्रमरक' की तरह एक पाद को पृथ्वी पर पटकना होता है; और फिर दूसरे
पाद का इसी प्रकार ऊपर उद्वर्तन करना रहने से इसे 'उद्वृत्ता' (यथार्थ
नामा) कहते हैं ।
४०. विद्युद्भ्रान्ता-चारी :-'पृष्ठतः' अर्थात् पीछे की ओर ऊरु के मूल
में घुमावे किन्तु इसका आशय सही यह है कि बाजू के पीछे वलन कर मस्तक
को छू ले फिर इसी के अनुसार उस पैर को अगल बगल सभी ओर गोल
चक्कर में घुमा कर फैला दिया जाए ।
४१. अलाता-चारी :-इसमें पहिले पाद को को पीछे की ओर फैलाकर
फिर घुमा कर भीतर लिया जाए, इसके बाद द्वितीय ऊरु पर अभिमुख तल
कर उसे रखे तथा इस प्रकार करते हुए अपने पास वाली एड़ी के पास
उसे पटके । यह अलातचक्र की आकृति में आने से 'अलाता' है ।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१७
४२. भुजङ्गत्रासिता-चारी :-कुञ्चितपाद को दूसरे ऊरु के क्षेत्र तक
ऊपर उठा कटि के बराबर ले जाकर जानु की ओर लौटा ले तथा नितम्ब
के सम्मुख तिकौनी या टेढ़ी एड़ी को उसी पर विवर्तित करे । इसके पश्चात्
बगल की जानु पर एक पैर को उत्तानतल में स्थापित करे । पैर के समीप
सर्प के आने पर भय से इधर उधर भागने वाले की तुलना से निर्मित यह
'चारी' नामानुरूप अपनी क्रिया के प्रदर्शन के कारण सार्थकनामा है ।
४३. हरिणप्लुताचारी :-अतिक्रान्ता चारी के प्रकरण में कथित
कुञ्चितपाद को उत्क्षिप्त कर (उछाल कर) उसे पृथिवी पर पटके । फिर दूसरी
जँघा के पृष्ठ भाग पर अञ्चित पैर रखे। इस प्रकार मृग की प्लुति (उछाल) के
तुल्य यह चारी रहती है। इसकी विदूषक की गति में योजना रखी जाती है ।
४४. दण्डपादा-चारी :-('नूपुरपाद' में कथित ) अञ्चितपाद को
दूसरे पैर की एड़ी पर ले जाकर शीघ्रता से फैलावे । इस प्रकार ऊरु, जानु
एवं जंघा की स्तब्धता से पैर के दण्डाकार स्थिति में आने के कारण इसे
'दण्डपादा' चारी कहा गया ।
४५. भ्रमरी-चारी :-अतिक्रान्ता चारी में कथित कुञ्चितपाद को ऊपर
कर सांप से डरे हुए की तरह तिरछी ऊरु को विवर्तित करे और फिर द्वितीय
पाद तल के घूमाने में त्रिक का भी एक घुमाव ले ले । इस प्रकार समग्र शरीर
के घुमाव से नेमि की तरह चक्कर लगाने के सदृश स्थिति रखने के कारण
इसका नाम 'भ्रमरी' है ।
४६. अब इनकी योजना को दिखलाते हैं कि इन चारियों में अङ्गों की
क्रिया का अभिनय सुन्दरतापूर्ण होना चाहिए और धनुष, वज्र आदि शस्त्रों के
छोड़ने में इनका विनियोग रखना होता है ।
४७. इन्हीं चारियों के विनियोग की व्यापक सीमा को दिखलाकर
शरीर की शोभा में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान बतलाते हैं—'अथंगौ' इत्यादि
के द्वारा । इसका आशय यही है कि इनमें कभी गति की प्रधानता रखी
जाती है तथा कभी हस्तों के व्यापार रूप अभिनय की और कभी दोनों की
भी । इनमें प्रथमपक्ष में हस्तों को पादविक्षेप के अनुसार रहने वाले तथा
पादविक्षेप के बाद व्यापृत रखना होता है । द्वितीय में हस्ताभिनय के अनुगत
एवं उनके पीछे पैरों की गति रखी जाती है तथा तृतीयपक्ष में दोनों की
प्रवृत्ति एवं व्यापार एक ही समय में विनियोग की अपेक्षा से रहेंगे । यहाँ
कारिकास्थ योग शब्द भी इसी तथ्य को प्रकट करता है ।
४८. उपाङ्ग = भ्रू, नेत्र आदि अवयव !
२७ ना० शा० द्वि०

४१८ नाट्यशास्त्र
४६. पाद क्रिया के समय यदि हस्ताभिनय भी हो तो पाद की गति
विश्रान्त हो जाती है अतः ऐसे समय हस्त की क्या दशा हो इस आशंका
के उत्तर में कहते हैं कि पादचारी की समाप्ति पर हस्त को कटिप्रदेश में
रखा जाता है ।
५०. पैरों को पृथ्वी पर रखने पर पादचारी के समान होने पर काय
का सन्निवेश बतलाने के लिये स्थानकों को बतलाना क्रम प्राप्त हो जाता है ।
‘स्थान’ शब्द भाव, अधिकरण या करण अर्थ में व्युत्पन्न है ( स्थीयन्ते इति
स्थानाति, तिष्ठन्त्येषु इति स्थानानि, तिष्ठन्त्येभिरिति स्थानानि ) । अतः
इसके अनुसार चारी के द्वारा कायसन्निवेश भी होता है अर्थात् चारियाँ प्रथम
गतिरूप होती हैं तथा बाद में जब स्थितिरूपा हो जाती हैं तो उन्हें स्थानक
या स्थान कहा जाता है ।
५१. छः स्थानकों के नाम दिखलाकर सर्व प्रथम वैष्णवस्थान का स्वरूप
दिखलाते हैं ।
५२-५४. वैष्णवस्थानः- पक्षः स्थित पद से अंगुलियों की बाजू में
[L

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१९
६५-६७. मण्डलस्थान :--घोड़ों तथा हाथियों के संचालन के समय
वैशाखस्थानक का उपयोग होता है उनसे भी स्थूल वाहन गरुड़ पक्षी आदि है
उसके निरूपण में मण्डलस्थान की योजना होती है ।
६७-७०. आलीढ़ स्थान :--आलीढ़ कहते हैं जिसमें चारों ओर से भूमि
का स्पर्श होता हो । सम्फेट का अर्थ है संघर्षपूर्ण दशा ।
७०-७२. प्रत्यालीढ़ स्थान :--इस स्थान में उत्तान तथा आकुञ्चित
पाद रहता है जो प्रसारण के विपरीत है । स्थानों से शस्त्र विमोक्षण का
विधान पूर्व में बतलाया गया है तथा इसी में सहायक होते हैं न्याय । अतः
न्यायों के अनुसार वृत्तियों के विभाग में स्थान अंगभूत हो जाते हैं यही यहाँ
समझाया है ।
७२-७६. हन्तव्य के कटि, पाद, वक्षःस्थल एवं शिर स्थानों पर अति-
क्रमण के लिये नाट्यशास्त्र में चार न्याय बतलाये गये हैं । अङ्गों के औचित्य
से न्याय का आश्रय लिया जाता है । न्यायों से प्रवृत्त होकर ही अंगों के स्वरूप
स्वाभाविक एवं उत्कृष्ट नियमन दर्शा सकते हैं । क्योंकि उन्हीं से क्रियायें
होती भी है अतः इसकी 'न्याय' आख्या इसी कारण सार्थक है ।
७६-८०. भारतन्याय :--परिवेष्टन करते हुए ले जाना यहाँ 'परिगम'
है । उद्वेष्टित = चारों ओर से उद्वेलित किया हुआ । अतः कलाई में उद्वेष्टन
करके शस्त्र का उद्बन्धन किया जाता है ।
८१-८२. सात्वतन्याय :--पृष्ठतः = शरीर के पिछले भाग या पीछे से ।
८२-८४. वार्षगण्यन्याय :--इसमें शस्त्र का घुमाना ऊपर ही से मस्तक
का एक चक्कर लगाते हुए कराते हैं ।
८४-८८. कैशिकन्याय :--इसमें शस्त्र को अन्त में मस्तक पर ले जाया
जाता है । समग्र युद्ध का अभिनय सौष्ठवपूर्ण आंगिक व्यापारों के द्वारा
सम्पन्न किया जाना चाहिए । युद्ध के प्रसंग में ( ऐसे युद्ध के समय ) छेदन
भेदन भी पात्रों के अङ्ग का हो सकता है । अतः इस विषय में यह बात ध्यान
में रखने की है कि रंगमञ्च या अभिनय के स्थल पर भेदन आदि नहीं होना
चाहिए । यहाँ ऐसी चेष्टाएँ रखी जाये कि प्रेक्षक गण को केवल युद्ध का भान
हो सके । ऐसे विषय या प्रसंग नाटक या प्रकरण में यदि रखे जायें तो युद्ध
को केवल संज्ञा ( इङ्गित या चेष्टाओं ) के द्वारा दिखलाया जाए । यही
यहां उचित माना गया है । यहाँ 'अथवा' पद के द्वारा व्यवस्थितविकल्प की
सूचना दी गयी है ।
८८-६०. सौष्ठव :--अङ्गों के प्रसंग में पूर्व में जिस सौष्ठव को कहा