नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१३
रूप में रख कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जावे तो चलने से चारी होगी
और पादों की समानरूपता से यह 'समपादा' भी कहलाएगी । यहाँ योग्यता
अर्थात् स्थान के संश्रय के कारण ऐसा व्यवहार एवं नामकरण हुआ है ऐसा
समझना चाहिए ।
१५. स्थितावर्ता-चारी :—पैर के अगले भाग से संचार करने में भूमि
पर पैर को घिसट या घिस कर रखते हुए चलना होता है ऐसी चलने की
स्थिति अग्रतल संचर पाद की रखकर अभ्यन्तर मंडल बनावे अर्थात् द्वितीय
बाजू की जानु को स्वस्तिक आकार में रखे तथा जब स्वस्तिक रूप में जानु
संश्लिष्ट हो जाए तब दूसरी का उत्सारण किया जाए । एक के स्थान को
ऊपर खींच कर ले जाये या ऊपर अपनी ओर खींचें । यही उत्सारण है ।
१६. शकटास्या-चारी :—निषण्णाङ्ग अर्थात् शरीर के पूर्वीयाभाग को
प्रयत्न से धारण किये हुए । जिस प्रकार शकट असनीय अर्थात् क्षेप्य हो उसी
रूप में शरीर को लाना शकटास्या है ।
१७. अध्यर्धिकाचारी :—दाहिने पैर को एडी की ओर पीछे रखा
जाए तब उस दाहिने पैर की स्थिति उपसर्पण के समय आधी तिरछी
होती है जो आधे ताल से अधिक अन्तर पर रखी जाती है । यह करणों
की प्रधानता के कारण है तथा इस प्रक्रिया में वामचरण की स्थिति भी पृष्ठ
या पीछे लगी हुई रहती है ।
१८. चाषगति-चारी :—वैसे प्रायः सभी चारियों में दाहिने पैर का
अपसर्पण होता है । यहाँ एक ताल के परिमाण से दाहिने पैर को आगे
फैला कर उसी को दो ताल मात्रा में पीछे रखा जाता है । यहाँ बायें पैर
का दाहिने के साथ अपसर्पण होता है । थोड़ा उछालने पर दाहिना पैर बायें
से दूर हट कर फिर मिल जाता है । इस प्रकार भययुक्त अपसर्पण एवं
श्लिष्टतायुक्त गति रखने से इसका नाम चाष ( नीलकण्ठ पक्षी ) गति हो
गया है ।
१९. विच्च्यवा-चारी :—यहाँ एकवचन में प्रयुक्त पाद शब्द का अर्थ
दोनों पैरों के लिये समझना चाहिए ।
२०. एलकाक्रीड़िता-चारी :—इसमें एक बार उछलकर पुनः एक बार
उछाल लेना पड़ता है । जिसमें पाद, जंघा, सक्थि ( जानु का ऊपरी भाग )
तथा गुल्फ ( घुटने ) को साथ-साथ गतिशील बनाना होता है तथा यह पारी
पारी से उत्पलवन होता है । इसमें एलका ( बकरी ) की गति के समान
उछाल लेने के कारण इस चारी का 'एलकाक्रीडिता' नाम भी है ।