सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१९
६५-६७. मण्डलस्थान :--घोड़ों तथा हाथियों के संचालन के समय
वैशाखस्थानक का उपयोग होता है उनसे भी स्थूल वाहन गरुड़ पक्षी आदि है
उसके निरूपण में मण्डलस्थान की योजना होती है ।
६७-७०. आलीढ़ स्थान :--आलीढ़ कहते हैं जिसमें चारों ओर से भूमि
का स्पर्श होता हो । सम्फेट का अर्थ है संघर्षपूर्ण दशा ।
७०-७२. प्रत्यालीढ़ स्थान :--इस स्थान में उत्तान तथा आकुञ्चित
पाद रहता है जो प्रसारण के विपरीत है । स्थानों से शस्त्र विमोक्षण का
विधान पूर्व में बतलाया गया है तथा इसी में सहायक होते हैं न्याय । अतः
न्यायों के अनुसार वृत्तियों के विभाग में स्थान अंगभूत हो जाते हैं यही यहाँ
समझाया है ।
७२-७६. हन्तव्य के कटि, पाद, वक्षःस्थल एवं शिर स्थानों पर अति-
क्रमण के लिये नाट्यशास्त्र में चार न्याय बतलाये गये हैं । अङ्गों के औचित्य
से न्याय का आश्रय लिया जाता है । न्यायों से प्रवृत्त होकर ही अंगों के स्वरूप
स्वाभाविक एवं उत्कृष्ट नियमन दर्शा सकते हैं । क्योंकि उन्हीं से क्रियायें
होती भी है अतः इसकी 'न्याय' आख्या इसी कारण सार्थक है ।
७६-८०. भारतन्याय :--परिवेष्टन करते हुए ले जाना यहाँ 'परिगम'
है । उद्वेष्टित = चारों ओर से उद्वेलित किया हुआ । अतः कलाई में उद्वेष्टन
करके शस्त्र का उद्बन्धन किया जाता है ।
८१-८२. सात्वतन्याय :--पृष्ठतः = शरीर के पिछले भाग या पीछे से ।
८२-८४. वार्षगण्यन्याय :--इसमें शस्त्र का घुमाना ऊपर ही से मस्तक
का एक चक्कर लगाते हुए कराते हैं ।
८४-८८. कैशिकन्याय :--इसमें शस्त्र को अन्त में मस्तक पर ले जाया
जाता है । समग्र युद्ध का अभिनय सौष्ठवपूर्ण आंगिक व्यापारों के द्वारा
सम्पन्न किया जाना चाहिए । युद्ध के प्रसंग में ( ऐसे युद्ध के समय ) छेदन
भेदन भी पात्रों के अङ्ग का हो सकता है । अतः इस विषय में यह बात ध्यान
में रखने की है कि रंगमञ्च या अभिनय के स्थल पर भेदन आदि नहीं होना
चाहिए । यहाँ ऐसी चेष्टाएँ रखी जाये कि प्रेक्षक गण को केवल युद्ध का भान
हो सके । ऐसे विषय या प्रसंग नाटक या प्रकरण में यदि रखे जायें तो युद्ध
को केवल संज्ञा ( इङ्गित या चेष्टाओं ) के द्वारा दिखलाया जाए । यही
यहां उचित माना गया है । यहाँ 'अथवा' पद के द्वारा व्यवस्थितविकल्प की
सूचना दी गयी है ।
८८-६०. सौष्ठव :--अङ्गों के प्रसंग में पूर्व में जिस सौष्ठव को कहा