नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 516, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०५
१८३. आविद्धवक्रहस्त :- इस हस्त की योजना भय से कम्पित होने
तथा तिरछे होकर खिसकने में की जाती है ।
१८४. सूचीमुखहस्त :- चतुरस्र स्थान स्थित दोनों सर्पशीर्ष हस्तों को
जब तर्जनी के अग्र से तिरछा कर बगल में ले जाकर फैलाते हुए रखे और
बाहर फैला कर क्रमशः प्रस्तुत करते रहें ( पर्यायशः ) तो बाहर की ओर
फैलाने से इसका सूची सदृश आकार होने से 'सूचीमुख' है । अन्य पाठ के
अनुसार—सूचीमुखहस्त वे होते हैं जिनके अंगूठे हथेली के मध्य में फैलाते हुए
रहें अतः वे स्वस्तिक आकार में होने वाले सर्पशीर्ष होते हैं तो ।
१८५. रेचितहस्त :- तेजी से घूमने वाले बिना कुछ बदले हुए हंसपक्ष
ही 'रेचित' होगें तथा हथेलियों को ऊपर फैला देने से विकृत हुए भी 'रेचित'
कहलाएँगे । इसकी योजना नृसिंहावतार में दैत्य के वक्षःस्थल के फाड़ने जैसे
कार्य में रखी जाती है ।
१८६. अर्धरेचितहस्त :- रेचित हस्तों में एक को 'चतुरस्र' स्थिति
में रखना 'अर्धरेचित' हो जाता है । इसे पर्यायशः भी प्रस्तुत करना होता है ।
१८७. उत्तानवञ्चितहस्त :- त्रिपताकहस्तों को अंस, कपोल तथा
ललाट में से किसी एक स्थान में अंचन क्रिया से युक्त करते हुए परस्पर
सामने और तिरछे करें तथा अंसों और कूर्परों में किञ्चित् चलन हो तो इस
अंचन के समय उत्तानता की प्राप्ति होने पर पुनः अञ्चन में उद्गमन क्रिया
का योग होता है अतः ये मृदु रूप में उत्तान तथा अञ्चित होने से 'उत्तान-
वञ्चित' हैं ।
१८८. पल्लव तथा नितम्बहस्त :- इसमें दो पताक हस्तों को ऊपर
बाहुओं को फैलाकर व्यावर्तित तथा परिवर्तित क्रिया से स्वस्तिक आकार में
रखे जाते हैं । ये पल्लव के आकार में होने से 'पल्लव' कहलाते हैं । अन्य
आचार्य शिथिल त्रिपताक हस्त को यदि कलाई में घूमते हुए रखे जाए तो
'पल्लव' बतलाते हैं ।
यदि दो पताक हस्त प्रथम कन्धों के बराबर रखते हुए तथा दोनों तलों
को एक दूसरे के सामने रखते हुए अधोमुख किये जाए तथा नितम्ब प्रदेश
तक ले जाए जाएँ जहाँ वे पर्यायशः अर्थात् क्रमशः रेचक को करते हों तो वे
'नितम्ब हस्त' हैं ।
१८६. केशबन्धहस्त :- पहिले एक बाजू से दूसरी बाजू में दो पताक
हस्त परिवर्तन करते हुए ऊपर उठे हुए अर्थात् मस्तक के क्षेत्र को प्राप्त करने