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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 668 में से

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४१४ नाट्यशास्त्र
२१. बद्धा-चारी :-यहाँ ऊरुओं का वलन करना ही 'जंघास्वस्तिक' पद
का आशय है । जंघाओं के सम्यक् बन्धन हो जाने के कारण इसका 'बद्धा'
नामकरण किया गया है ।
२२. ऊरुद्वृत्ताचारी :-इसमें अग्रतलसंचर पाद की एडी जब दूसरे
पैर के पृष्ठभाग की ओर उन्मुख हो और जानुओं के झुकने से जंघा
आकुञ्चित होकर दूसरी जंघा के सम्मुख वलन से उद्वृत्ता की स्थिति लेले
तो 'ऊरुद्वृत्ता' होती है। क्योंकि इसमें ऊरुओं के ऊपर विवर्तन या वलनक्रिया
रखी जाती है। इसकी लज्जा या ईर्ष्या के भाव प्रकाशन में योजना रखी
जाती है । अन्य आचार्यों के मत में एडी को द्वितीय अग्रतलसंचर पाद के
बाहर की ओर रख कर इस चारी को प्रस्तुत किया जाता है ।
२३. अड्डिता-चारी :-अड्डधातु अतिक्रमण तथा हिंसा अर्थ में पठित
है इसमें इतच् प्रत्यय से अड्डिता शब्द निष्पन्न है। इसमें एक पाद सम-
स्थित और दूसरा तलसञ्चर की स्थिति में आगे और पीछे क्रमशः श्लिष्ट होता
है । इसमें पाद अपने स्थान से अतिक्रमण करता है अतः इसे 'अड्डिता'
कहते हैं ।
२४. उत्स्पन्दिता-चारी :-इसमें एक पैर की कनिष्ठिका अंगुली के
बाहरी भाग और दूसरे पैर के भीतरी भाग से निवर्तन होता है । वह पैर
का अपसारण रेचितपाद को अवधि कर करके रखा जाता है । चारी में
शोभाबृद्धि के लिये यह अपसारण रखा जाता है । यह क्रिया नदी के प्रत्यावर्तन
रूप स्पन्दित के तुल्य रहने से इसका उत्स्पन्दिता नाम है। जिसमें रेचक नृत्त-
हस्त रहता है ऐसा अन्य आचार्यों का मत है ।
२५. जनिता-चारी :-इसमें तलसञ्चरपाद से गमन किया जाता है ।
यह समस्त गतियों की जननी अर्थात् उत्पादिका होती है तथा इसी से गतियों
का आरम्भ किया जाता है । यही इसकी व्युत्पत्ति भी है। इसमें मुष्टिका-
कार हस्त का वक्षःस्थल पर विन्यास तथा अन्य हस्त का प्रसारण केवल इति-
कर्तव्यता को दिखलाने के लिये रखा गया है ।
२६. स्यन्दिता तथा अपस्यन्दिता-चारी :-इन दोनों चारियों का एक
साथ विवरण दिया गया है। इसमें समस्थित एवं निषण्ण ऊरू वाले दाहिने
पैर को पञ्च तालों के अन्तर से फैला दिया जाता है । इस फैलाने रूप धर्म के
कारण इसका नाम भी 'स्यन्दिता' हो गया है। इसी के विपर्यय या विपरीत
स्थिति से 'अपस्यन्दिता' चारी निर्मित हो जाती है। यहाँ प्रश्न होता है