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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 668 में से

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४१६ नाट्यशास्त्र
३४. सूचीचारी :-जानु से ऊपर ऊरु तक जंघा को पूरी फैला कर
अग्रभाग से भूमि पर गिरावे । इस प्रकार यह 'सूची' के आकार की होने से
'सूची' कहलाती है।
३५. नूपुरपादिका-चारी :-यहाँ 'पृष्ठतः' पद का भाव है कि 'अंचित'-
पाद को पीछे की ओर एड़ी को छूते हुए अन्त तक ले जावे । बाजू में उस
'अग्रतल-संचर' पैर को पृथ्वी पर पटका जाए । ऐसा करने पर नूपुरों की
झनझन आवाज निकलेगी जिससे शीघ्रता प्रकट होगी तथा नूपुरों की योजना
भी । इसी आधार पर इसका नामकरण भी हुआ है ।
३६. दोलपादाचारी :-यहाँ 'उत्क्षिप्य' पद से आशय है कि कुञ्चित-
पाद को दक्षिणपाद के क्षेत्र तक बगल में ले जाए और फिर वहाँ दोला के
आकार में स्पन्दित कर बाद में उसे एड़ी की बाजू में पृथ्वी पर पटके । यह
'दोलपादा' का स्वरूपानुसारी नाम है ।
३७. आक्षिप्ताचारी :-यहाँ 'आक्षिप्त' पद से आशय है कि कुञ्चितपाद
को आगे तीन ताल के अन्तर में ऊपर उछाल कर अंचित के अर्धमण्डल आकार
में दूसरी बाजू में ले जावे और स्वस्तिक कर पृथ्वी पर पटके ।
३८. आविद्धा-चारी :-विश्लिष्ट जंघावाले स्वस्तिक बने कुञ्चितपाद
को फैलाया जाए और उसी 'आविद्ध' अर्थात् संश्लिष्ट उसी पाद को बाजू में
द्वितीय पार्ष्णि (एड़ी) के क्षेत्र में तदनुसार पटके ।
३६. उद्वृत्ताचारी :-यह चारी आविद्धा की शेषभूता मानी जाती
है । इसमें आवेष्टन अर्थात् दूसरे ऊरु के क्षेत्र की पार्ष्णि तक उछाल लेकर
'भ्रमरक' की तरह एक पाद को पृथ्वी पर पटकना होता है; और फिर दूसरे
पाद का इसी प्रकार ऊपर उद्वर्तन करना रहने से इसे 'उद्वृत्ता' (यथार्थ
नामा) कहते हैं ।
४०. विद्युद्भ्रान्ता-चारी :-'पृष्ठतः' अर्थात् पीछे की ओर ऊरु के मूल
में घुमावे किन्तु इसका आशय सही यह है कि बाजू के पीछे वलन कर मस्तक
को छू ले फिर इसी के अनुसार उस पैर को अगल बगल सभी ओर गोल
चक्कर में घुमा कर फैला दिया जाए ।
४१. अलाता-चारी :-इसमें पहिले पाद को को पीछे की ओर फैलाकर
फिर घुमा कर भीतर लिया जाए, इसके बाद द्वितीय ऊरु पर अभिमुख तल
कर उसे रखे तथा इस प्रकार करते हुए अपने पास वाली एड़ी के पास
उसे पटके । यह अलातचक्र की आकृति में आने से 'अलाता' है ।