नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०९
२०७-२१०. अभ्यन्तरेण इत्यादि । अभ्यन्तर अर्थात् हथेली के सम्मुख
बाह्यप्रदेश से लेकर वक्षःस्थल के क्षेत्र तक पहुँचना । इसकी अपेक्षा विपरीत
वक्षःस्थल के क्षेत्र विरुद्ध दिशा में कनिष्ठादि का आवर्तन या घुमाव ।
बहिर्मुखत्व पद से वक्षःक्षेत्र से बहिर्गमन तथा अभ्यन्तरत्व से तलसम्मुखत्व
समझना चाहिए । अभ्यन्तरत्व के विपर्यास से बाह्यता यहाँ समझना चाहिए ।
२११. नृत्त तथा अभिनय में करणों का प्रयोग अधिक मात्रा में किया
जाना इष्ट है जो हाथों से होता है । क्योंकि उनसे ही वर्तना उत्पन्न की जाती
है । नृत्त तथा नाट्य में उपयोगी हस्त-पाणि हैं । इन्हें मुख, नेत्र, भ्रुकुटि से युक्त
या अनुगत ही रखा जाये इसका आशय यही कि जिधर वर्तना चले उधर ही
मुखादि रहें । प्रश्न—जब नेत्र, मुखादि का राग वर्तना से व्यक्त होता हो
तो उन्हें मुख, भ्रूनेत्र से युक्त कैसे रखें । उत्तर—अभिनय की पूर्ति के लिये
यह वर्तना में रहने वाली प्रक्रिया है अतः इसमें पुनरुक्ति नहीं आती ।
२१२-२१४. क्योंकि अंगुलियाँ बाहु से संलग्न हैं अतः उनकी क्रियाएँ
भी बाहु से संलग्न होगी ही जिनके प्रभेद का ज्ञान अपेक्षित होने से उन्हें
बतलाते हैं । ये दस प्रभेद हैं । तिर्यक् का आशय है कि उसकी गति पार्श्व
में रहती है । ऊर्ध्व = मस्तक के ऊपर जाता है । अधोमुख = पृथ्वी को छूने
वाला । अञ्चित = वक्षःस्थल से निकल कर ऊपर शिरःप्रदेश से लौटना ।
अपविद्ध = चक्राकार गति में चारों ओर घूमना । पृष्ठानुसारी = शरीर के
पृष्ठभाग का अनुगमन करने वाला । उद्वेष्टित = जो मणिबन्ध ( कलाई )
से सम्बद्ध वर्तना से निष्क्रामण करे । प्रसारित = जो कलाई के अग्रदेश का
अनुधावन करे । इस प्रकार के करणों में द्रुत, मध्य तथा विलम्बित के
वैचित्र्य से तथा बाहुओं के पर्याय से उक्त करणों की जब योजना हो तो उसमें
अनेक वर्तनाएँ अन्तर्निहित होती हैं । अतः करणों में होने वाली विशेषताओं
को अवश्य जान लेना चाहिए । नित्य कहने से यही बात यहाँ संकेतित की
गयी हैं क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य कोई इसका प्रयोजन यहाँ नहीं है ।