नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश अध्याय
( चारीविधान )
१-२. दशम अध्याय की समाप्ति पर 'चारी व्यायाम लक्षण' पद कहा
गया था। यहाँ 'चारी' शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार कर इस शब्द की
व्याख्या उचित होगी। चर् धातु से औणादिक इन प्रत्यय से भिन्न 'इ' को
ङीप् कर चारी शब्द निष्पन्न होता है। चारी द्वारा आकाश तथा पृथ्वी पर
चलने का अभिनय किया जाता है अतः आकाश एवं भूमि की चारियाँ होती
हैं। 'व्यायाम' शब्द का अर्थ है 'व्यायच्छते' इति अर्थात् अनुगत होना।
इसमें परस्पर एक दूसरे से मिलती हैं। विधान शब्द का अर्थ है योजना।
अतः परस्पर योजना से होने वाली चारियाँ व्यायाम शब्द का अर्थ होने
से चारी ही व्यायाम है। ये चारियाँ किस से मिलती हैं? इस प्रश्न के
उत्तर में यही व्यवस्था है कि पूर्व चारी पर में मिलती है किन्तु पर-चारी
पूर्व में नहीं मिलती यह नियम हैं। यहाँ नियत स्थिति अर्थात् विधान या
प्रक्रिया के कारण हस्त या पाद में से कोई अङ्ग प्रधान तथा अन्य अप्रधान
हो जाता है अतः यहाँ प्रधानभूत अङ्ग के अनुरोध से अन्य अङ्ग प्रवर्तित
होते हैं। जैसे जब किसी अभिनय में हस्त प्रधान हो या किन्हीं गतियों के
अभिनय में पाद प्रधान हों तो उनके उपयोग में आनेवाली चारी प्रधानता
को प्राप्त करती है। ऐसी स्थिति में प्रधान चारी के सम्पन्न होने पर
पूर्वाचारी का आश्रयण परा चारी से किया जाता है। इस प्रकार परस्पर
नियत रहनेवाली चारियाँ व्यायाम हो जाती हैं। यह व्यायाम संक्षिप्त,
मध्यम तथा विस्तीर्ण भेद से तीन प्रकार का माना जाता है।
३. एक का अर्थ है एकाकी जिससे श्रोणीप्रदेश (कटि के पीछे का भाग)
के प्रचार का भी संकेत समझना चाहिये तथा आदि शब्द से कटि को लिया
जाता है। तब श्रोणी का स्पन्दन तथा जंघा का चलन प्रदर्शित किया जाता
है। द्विपाद शब्द में पाद शब्द से उसका प्रचार या गति समझना चाहिए।
यह करण दो पैरों के प्रचार से होता है तथा संक्षिप्त व्यायाम भी कहलाता
है जिसका अभिनयों में प्रयोग किया जाता है।
४. कारिका के 'करणानां' इस बहुवचन पद से तीन करण ग्राह्य समझन
चाहिए् क्योंकि तीन में बहुत्व अपेक्षित है। यदि यहाँ चार या पांच कारण