नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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२००. अलपल्लव या अलपद्महस्त :- जब अलपल्लव हस्तों को वक्षः
प्रदेश से उद्वेष्टित क्रिया में रख कर कन्धे के पास तक ऊपर ले जाकर फैला
दिया जाए तो 'अलपल्लव' हस्त होता है । इसका अन्य नाम है 'अलपद्म' ।
उल्बणहस्त :- इसमें दो अलपल्लव हस्तों को वक्षः क्षेत्र से उद्वेष्टित
कर स्कन्ध के पास ऊपर फैलाए हुए एक हस्त से आबिद्ध तथा दूसरे से
पल्लव रूप को प्रदर्शित करे तो 'उल्बण' हस्त होता है । इसकी हर्षभरित
मनोवस्था में योजना रखी जाती है ।
२०१. ललितहस्त :- इसमें दो अलपल्लवहस्तों को मस्तक पर ले जाते
हैं । इसमें चतुरस्र से अङ्गों का लालित्य दिखलाया जाता है । अतः इसका
नाम भी 'ललित' है ।
वलितहस्त :- इसमें कलाई प्रदेश पर लताहस्त स्वस्तिकाकार में
वलित या घुमाव लेते हैं । इसमें बाहुओं का वलन होता है अतः इसका नाम
'वलित' है जो भिन्न-भिन्न वर्तनाओं का संकेत देता है । अन्य आचार्य मुष्टिक
स्वस्तिकहस्त को मस्तक पर फैलाने को ( घुमाने को ) 'वलित' मानते हैं
तथा कुछ अन्य दो कटकमुख हस्तों को एक दूसरे के साथ अग्र भाग लगाते
हुए मिला कर ऊपर उठाते हैं जब तक कि वे पृष्ठ तक पहुँच कर कलाई पर
झुकाये न जाएँ तो 'वलित' होता है ।
नृत्तहस्तों की संख्या भरतमुनि ने तीस बतलाई है जो केवल उपलक्षण-
मात्र हैं । इन नृत्तहस्तों के अतिरिक्त कुछ अन्य नृत्तहस्त भी प्राप्त हैं जिनके
नाम इस प्रकार हैं—१. निकुञ्चकहस्त, २. द्विशिखरहस्त, ३. वरदाभयहस्त,
४. सूचीविद्धहस्त, ५. ज्ञानहस्त, ६. मुद्रहस्त तथा ७. प्रकीर्णहस्त । इनके
लक्षण तथा योजना नाट्यशास्त्रसंग्रह में कारिका संख्या २८६ से २६५ तक
देखना चाहिए । विस्तारभय से यहाँ नृत्तहस्तों के शेष विवरण भी नहीं दिये
जा रहे हैं ।
२०२-२०३. पताकहस्त सब हस्तों की प्रकृति या कारण माना जाता है
अतः सभी वर्तनाओं में कार्य करने से 'पताक' सर्वसाधारण होता है तथा
शब्द से भी रखता है । यहाँ नाट्यशब्द से अभिनयोपयोगी हस्त और नृत्त
प्रमुखता नृत्त के उपयोगी हस्तों की सूचना दी गयी है ।
२०४-२०६. जिस अंगुलितुलन रूप क्रिया से अभिनय विशेष का
सम्पादन किया जाये उसे 'करण' कहते हैं । किन्तु जहाँ अभिनय की समाप्ति
नहीं होती हो वहाँ 'वर्तना' की आंकाक्षा रहती है जिसका 'अंगत्रोटन' के
नाम से बुधजन व्यवहार करते हैं ।