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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 668 में से

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पृष्ठ 528

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ११ ४१७
४२. भुजङ्गत्रासिता-चारी :-कुञ्चितपाद को दूसरे ऊरु के क्षेत्र तक
ऊपर उठा कटि के बराबर ले जाकर जानु की ओर लौटा ले तथा नितम्ब
के सम्मुख तिकौनी या टेढ़ी एड़ी को उसी पर विवर्तित करे । इसके पश्चात्
बगल की जानु पर एक पैर को उत्तानतल में स्थापित करे । पैर के समीप
सर्प के आने पर भय से इधर उधर भागने वाले की तुलना से निर्मित यह
'चारी' नामानुरूप अपनी क्रिया के प्रदर्शन के कारण सार्थकनामा है ।
४३. हरिणप्लुताचारी :-अतिक्रान्ता चारी के प्रकरण में कथित
कुञ्चितपाद को उत्क्षिप्त कर (उछाल कर) उसे पृथिवी पर पटके । फिर दूसरी
जँघा के पृष्ठ भाग पर अञ्चित पैर रखे। इस प्रकार मृग की प्लुति (उछाल) के
तुल्य यह चारी रहती है। इसकी विदूषक की गति में योजना रखी जाती है ।
४४. दण्डपादा-चारी :-('नूपुरपाद' में कथित ) अञ्चितपाद को
दूसरे पैर की एड़ी पर ले जाकर शीघ्रता से फैलावे । इस प्रकार ऊरु, जानु
एवं जंघा की स्तब्धता से पैर के दण्डाकार स्थिति में आने के कारण इसे
'दण्डपादा' चारी कहा गया ।
४५. भ्रमरी-चारी :-अतिक्रान्ता चारी में कथित कुञ्चितपाद को ऊपर
कर सांप से डरे हुए की तरह तिरछी ऊरु को विवर्तित करे और फिर द्वितीय
पाद तल के घूमाने में त्रिक का भी एक घुमाव ले ले । इस प्रकार समग्र शरीर
के घुमाव से नेमि की तरह चक्कर लगाने के सदृश स्थिति रखने के कारण
इसका नाम 'भ्रमरी' है ।
४६. अब इनकी योजना को दिखलाते हैं कि इन चारियों में अङ्गों की
क्रिया का अभिनय सुन्दरतापूर्ण होना चाहिए और धनुष, वज्र आदि शस्त्रों के
छोड़ने में इनका विनियोग रखना होता है ।
४७. इन्हीं चारियों के विनियोग की व्यापक सीमा को दिखलाकर
शरीर की शोभा में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान बतलाते हैं—'अथंगौ' इत्यादि
के द्वारा । इसका आशय यही है कि इनमें कभी गति की प्रधानता रखी
जाती है तथा कभी हस्तों के व्यापार रूप अभिनय की और कभी दोनों की
भी । इनमें प्रथमपक्ष में हस्तों को पादविक्षेप के अनुसार रहने वाले तथा
पादविक्षेप के बाद व्यापृत रखना होता है । द्वितीय में हस्ताभिनय के अनुगत
एवं उनके पीछे पैरों की गति रखी जाती है तथा तृतीयपक्ष में दोनों की
प्रवृत्ति एवं व्यापार एक ही समय में विनियोग की अपेक्षा से रहेंगे । यहाँ
कारिकास्थ योग शब्द भी इसी तथ्य को प्रकट करता है ।
४८. उपाङ्ग = भ्रू, नेत्र आदि अवयव !
२७ ना० शा० द्वि०