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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 668 में से

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पृष्ठ 517

वाले हो पुनः नितम्ब हस्त से क्रमशः आवर्तन प्रत्यावर्तनकारी होतें हों वे
हस्त केशों के सम्बन्ध से 'केशबन्ध' कहलाते हैं। ये शोभाधायक होते हैं तथा
आचार्य गण को अतिइष्ट होते हैं।
१६०. लताबन्धहस्त :- यदि दो पताक हस्त तिरछे फैलाते हुए नीचे
बाजुओं में अर्थात् नितम्ब से लताहस्त पर्यन्त त्रिपताकों के रूप में अनुगमन
करते हैं तो 'लताबन्ध' हस्त होता है।
१६१. करिहस्त-हस्त :- समुन्नत = अर्थात् जिस क्रम से संश्लेष किया
उसी क्रम से ऊँचा उठाते हुए । विलोलित पद से दोला की तरह झुलाते
रहने का संकेत मिलता है। यहाँ 'हस्त' पद का एकवचन में उपन्यास इसलिये
किया है कि करी को एक ही हस्त ( सूं ड ) होता है। अतः इसका चतुरस्र
की तरह न तो सजातीय होकर आरम्भ होता है और न खटकामुख की तरह
नृत्त के अभ्यास के व्यपदेश से विजातीय आरम्भ ही होता है। अतएव
द्विवचन का यहाँ उपन्यास नहीं किया गया है। इसका आकार 'करिहस्त'
का होने से यथार्थ नाम है।
१६२. पक्षवञ्चितकहस्त :- यदि कटि के शीर्ष या नोक के आसपास
बाजू में दो त्रिपताक हस्त रखे जाए तो इससे बाजू अञ्चित हो जाती है।
१६३. पक्षप्रद्योतक-हस्त :- इसमें बाजू में एक के सम्मुख दूसरा होकर
अपने स्वरूप को द्योतित करते हैं। लक्षण में 'एव' पद से प्रतीत होता है कि
इनके व्यामिश्रण या मिलान से प्रयोग में शोभा होती है।
गरुडपक्षहस्त :- यदि दो पताक हस्त नितम्ब क्षेत्र में अधोमुख होकर
हथेली के झटके से ऊपर जाने वाले गरुडपक्ष के आकार को प्राप्त करें तो
'गरुडपक्ष' हस्त होते हैं। यहाँ दोनों पताकहस्त ही इष्ट हैं क्योंकि त्रिपताक से
बाधा मानी गयी है।
१६४. दण्डपक्ष-हस्त :- इसमें एक हंसपक्षहस्त वक्षःस्थल की एक बाजू
से वर्तन या चालू हो तथा उसी समय द्वितीय हंसपक्ष का भुज के प्रसारण
पर्यन्त वर्तन होता हो। फिर दूसरे अंग से दोनो ही भुजाएँ प्रसारित, व्या-
वर्तित तथा परिवर्तित होती हों। इसमें एक बाजू में बगल से या दूसरी बाजू
से भुजाएँ दण्ड के आकार में रहती है अतः इसका नाम 'दण्डपक्ष' है।
इसमें दोनों हाथों का एक साथ प्रसारण रहता है किन्तु व्यावर्तन एवं परि-
वर्तन क्रमशः रहते हैं।
१६५. ऊर्ध्वमण्डल-हस्त :- वक्षःस्थल से व्यावर्तित कर ललाट क्षेत्र
के जरिये से उन्हें पाश्र्वों में ले जाकर पुनः वहाँ से मण्डलाकार घुमाव देकर